चीन
5 घंटे पहले
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ईरान पर अमेरिका का नया प्रतिबंध और वैश्विक चिंता
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पिछले करीब छह महीनों से ईरान के साथ चल रही जंग की स्थिति से जूझ रहे हैं। यह संघर्ष उनके लिए लगातार नुकसानदेह साबित हो रहा है और अब तक की तमाम कूटनीतिक कोशिशें विफल रही हैं। इस कठिन दौर में डोनाल्ड ट्रंप ने फिर से पुराने और कठोर रुख को अपनाते हुए ईरान के खिलाफ अब तक के सबसे कड़े आर्थिक प्रतिबंधों की घोषणा की है। इस नए आदेश के अनुसार, जो भी देश ईरान के साथ व्यापारिक संबंध रखेगा, उसे आर्थिक दंड का सामना करना पड़ेगा। यह कदम सीधे तौर पर उन शक्तियों को लक्षित करता है जो ईरान की अर्थव्यवस्था को सहारा दे रही हैं, जिनमें सबसे प्रमुख नाम चीन और रूस का है।
चीन के लिए ईरान की अहमियत और अमेरिकी चुनौती
चीन वर्तमान में ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है। आंकड़ों पर नजर डालें तो 2025 में ईरान से निर्यात होने वाले कुल कच्चे तेल का लगभग 80 फीसदी हिस्सा चीन ने ही खरीदा था। अमेरिकी प्रतिबंधों का मुख्य निशाना यही तेल व्यापार है। अमेरिका चाहता है कि चीन इन प्रतिबंधों का पालन करे, लेकिन चीन ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि वह एकतरफा प्रतिबंधों को समस्या का हल नहीं मानता है। चीन के लिए यह एक बड़ा सवाल है कि क्या वह अमेरिकी दबाव में आकर अपने सबसे बड़े तेल आपूर्तिकर्ता से संबंध तोड़ लेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन अपने व्यापारिक हितों को अमेरिका के दबाव के आगे इतनी आसानी से कुर्बान नहीं करेगा।
चीनी अर्थव्यवस्था की मजबूती और अमेरिका की विवशता
अल जजीरा की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका के लिए चीन पर दबाव बनाना इसलिए भी मुश्किल है क्योंकि चीन की पूरी अर्थव्यवस्था अमेरिकी वित्तीय प्रणाली पर निर्भर नहीं है। चीन में ईरान से कच्चा तेल खरीदने वाली कई रिफाइनरियां ऐसी हैं जो स्वतंत्र रूप से काम करती हैं, जिससे उन पर सीधा दबाव डालना कठिन हो जाता है। यदि अमेरिका चीन के बड़े बैंकों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने का प्रयास करता है, तो चीन के पास भी पलटवार करने के कई आर्थिक विकल्प मौजूद हैं। अमेरिका और चीन पहले से ही तकनीक और व्यापार के मोर्चे पर एक अघोषित आर्थिक शीत युद्ध में उलझे हुए हैं। ईरान का मुद्दा इस तनाव को और अधिक गहरा बना सकता है, जिससे दोनों देशों के बीच टकराव की स्थिति पैदा होने का खतरा बना हुआ है।
रूस की स्थिति: प्रतिबंधों के बीच नई रणनीति
रूस के मामले में स्थिति चीन से काफी अलग है। रूस पहले से ही अमेरिका और पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए कड़े आर्थिक प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। इसी कारण से रूस की अर्थव्यवस्था पश्चिमी वित्तीय तंत्र से काफी हद तक अलग और स्वायत्त हो चुकी है। इसका अर्थ यह है कि अमेरिका द्वारा रूस पर ईरान के साथ व्यापार करने के लिए नए प्रतिबंध लगाने से उसे वैसी सफलता नहीं मिलेगी, जैसी वह उम्मीद कर रहा है। रूस और ईरान ने पिछले कुछ वर्षों में अपने सैन्य और आर्थिक संबंधों को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। जनवरी 2025 में दोनों देशों के बीच हस्ताक्षरित 20 साल की रणनीतिक साझेदारी संधि ने उनके संबंधों को और भी अधिक मजबूत कर दिया है।
सैन्य और रणनीतिक गठबंधन
ईरान और रूस के बीच केवल तेल और ऊर्जा का कारोबार ही नहीं होता, बल्कि दोनों देशों के बीच गहरा सैन्य सहयोग भी बना हुआ है। समय-समय पर दोनों देशों के बीच हथियारों और अत्याधुनिक सैन्य उपकरणों के लेनदेन की खबरें सामने आती रही हैं। दोनों देश पश्चिमी देशों के आर्थिक अलगाव के खिलाफ एक दूसरे के पूरक बनकर उभरे हैं। उन्होंने आपसी व्यापार और वित्तीय लेन-देन के ऐसे वैकल्पिक रास्ते बना लिए हैं, जिन पर अमेरिकी प्रभाव न के बराबर है। यह गठजोड़ न केवल ईरान को बचाए रखने में मदद कर रहा है, बल्कि अमेरिका की धौंस को भी चुनौती दे रहा है।
चीन और रूस की एकजुटता का कोहराम
अगर चीन और रूस ईरान का समर्थन करने के लिए पूरी तरह एकजुट हो जाते हैं, तो यह अमेरिका के लिए एक भयावह स्थिति होगी। अमेरिका इस मोर्चे से पूरी तरह बचना चाहता है। चीन के पास विशाल बाजार और पूंजी है, जबकि रूस के पास पहले से ही पश्चिमी प्रतिबंधों को नाकाम करने का लंबा अनुभव है। दोनों देश स्थानीय मुद्राओं में कारोबार बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं, जो सीधे तौर पर अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व को चुनौती देने का एक तरीका है। यदि यह त्रिकोणीय मोर्चा—चीन, रूस और ईरान—मजबूती से एक साथ खड़ा होता है, तो अमेरिकी प्रतिबंधों का प्रभाव लगभग खत्म हो जाएगा।
वैश्विक ऊर्जा बाजार पर संभावित असर
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा प्रभाव दुनिया के ऊर्जा बाजार पर पड़ेगा। यदि अमेरिका और चीन ईरान के तेल कारोबार को लेकर आमने-सामने आते हैं, तो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बुरी तरह बाधित हो सकती है। तेल की कीमतों में भारी अस्थिरता और तेजी आने की पूरी संभावना है। ऐसी स्थिति में भारत समेत दुनिया के कई तेल आयातक देशों के सामने महंगाई और आर्थिक संकट का खतरा बढ़ जाएगा। यह केवल अमेरिका और ईरान का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह एक बड़े वैश्विक आर्थिक मोर्चे का रूप लेता जा रहा है, जिसमें चीन और रूस की भूमिका आने वाले समय में बेहद निर्णायक साबित होगी।
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