अमेरिका
3 घंटे पहले
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विचारों
ब्रिक्स की बदलती रणनीति और वैश्विक वित्त
क्या उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह ब्रिक्स आने वाले समय में एक ऐसी नई भुगतान व्यवस्था खड़ा करने जा रहा है, जो विश्व स्तर पर स्विफ्ट यानी SWIFT की निर्भरता को पूरी तरह बदल देगी? वर्ष 2026 में भारत की मेजबानी में होने वाला ब्रिक्स शिखर सम्मेलन इस सवाल को और अधिक प्रासंगिक बनाता है। हालांकि, यह स्पष्ट कर देना अत्यंत आवश्यक है कि अभी तक ऐसा कोई आधिकारिक निर्णय नहीं लिया गया है कि ब्रिक्स वर्ष 2026 में सीधे तौर पर स्विफ्ट का कोई समानांतर विकल्प लॉन्च कर ही देगा। फिर भी, भारत, रूस और चीन जैसे देश मिलकर सीमा पार भुगतान, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा यानी CBDC के माध्यम से एक सुरक्षित और वैकल्पिक व्यवस्था बनाने की दिशा में सक्रिय हैं।
स्विफ्ट और अमेरिकी डॉलर का वर्चस्व
स्विफ्ट एक वैश्विक संदेश भेजने वाला नेटवर्क है, जो वित्तीय संस्थानों के बीच भुगतान से जुड़े निर्देश साझा करता है। यह खुद पैसा स्थानांतरित नहीं करता, लेकिन अंतरराष्ट्रीय लेनदेन के लिए यह रीढ़ की हड्डी जैसा है। चूंकि वैश्विक लेनदेन का एक बड़ा हिस्सा अमेरिकी डॉलर में होता है, इसलिए अमेरिकी वित्तीय संस्थान इस प्रणाली में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। स्विफ्ट के माध्यम से होने वाले कुल अंतरराष्ट्रीय लेनदेन में डॉलर की हिस्सेदारी लगभग 50 प्रतिशत के आसपास बनी रहती है। यही कारण है कि डॉलर आधारित व्यवस्था पर अमेरिका का गहरा प्रभाव है और इसे एक प्रकार की भू-राजनीतिक शक्ति के रूप में देखा जाता है।
ब्रिक्स का भविष्य का रोडमैप
ब्रिक्स देशों के बीच सीमा पार भुगतान को सरल बनाने की चर्चा कोई नई बात नहीं है। पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के बाद इस मुद्दे ने और अधिक जोर पकड़ा है। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने 11 अगस्त 2026 को स्पष्ट किया था कि ब्रिक्स देश फास्ट पेमेंट सिस्टम को आपस में जोड़ने और डिजिटल मुद्राओं के बीच तालमेल बिठाने पर विचार कर रहे हैं। यानी मुख्य जोर किसी एक दिन अचानक नया सिस्टम लाने के बजाय मौजूदा भुगतान क्षमताओं को एकीकृत करने पर है।
भुगतान प्रणाली कैसे काम करती है
स्विफ्ट के काम करने का तरीका जटिल है। जब आप एक देश से दूसरे देश में पैसा भेजते हैं, तो बैंकों के बीच एक सुरक्षित मैसेजिंग प्रक्रिया होती है। इसमें प्रत्येक बैंक को एक यूनिक 8 से 11 अंकों का स्विफ्ट कोड या बीआईसी दिया जाता है। यदि बैंकों के बीच सीधा संबंध नहीं है, तो मध्यस्थ यानी कॉरेस्पोंडेंट बैंक इस प्रक्रिया को पूरा करते हैं। यही वह जगह है जहाँ प्रतिबंध लगने पर किसी देश को वैश्विक वित्तीय प्रणाली से अलग किया जा सकता है। इसीलिए ब्रिक्स के सदस्य अब वैकल्पिक रास्तों की तलाश कर रहे हैं।
ब्रिक्स पे और तकनीकी चुनौतियां
ब्रिक्स पे नामक अवधारणा चर्चा में तो है, लेकिन इसे स्विफ्ट का पूर्ण विकल्प मानना अभी जल्दबाजी होगी। स्विफ्ट का नेटवर्क दशकों की मेहनत का परिणाम है। ब्रिक्स देशों की अपनी डिजिटल प्रणालियां जैसे भारत का यूपीआई, चीन की डिजिटल व्यवस्था और रूस का अपना सिस्टम पूरी तरह अलग तकनीकी आधार पर काम करते हैं। इन सबको जोड़ना, नियमों में एकरूपता लाना और साइबर सुरक्षा सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती है। अतः यह कहना कि ब्रिक्स स्विफ्ट को पूरी तरह खत्म करने जा रहा है, अभी वास्तविकता से दूर है।
भारत का यूपीआई और वैश्विक प्रभाव
इस पूरी प्रक्रिया में भारत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। जुलाई 2026 में भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम के आंकड़ों के अनुसार, यूपीआई नेटवर्क पर लगभग 741 बैंक लाइव थे। उस महीने कुल 23,658.35 मिलियन यानी 2,365.84 करोड़ लेनदेन दर्ज किए गए, जिनकी कुल वैल्यू ₹29.88 लाख करोड़ रही। भारत सरकार ने डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए 23 देशों के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। आज यूपीआई सिंगापुर, फ्रांस, संयुक्त अरब अमीरात और श्रीलंका जैसे नौ देशों में मौजूद है। डिजिलॉकर को लेकर भी केन्या और क्यूबा जैसे देशों के साथ समझौते किए गए हैं।
डिजिटल मुद्रा और भविष्य की राह
केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा यानी सीबीडीसी इस पूरे परिदृश्य का दूसरा महत्वपूर्ण स्तंभ है। भारत में डिजिटल रुपया प्रयोग के तौर पर जारी है। यदि ब्रिक्स देश अपनी डिजिटल मुद्राओं को आपस में जोड़ने में सफल हो जाते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय लेनदेन में लगने वाला समय और शुल्क काफी कम हो सकता है। यह डॉलर की मध्यस्थता वाली भूमिका को कम करने की दिशा में एक बड़ा कदम होगा।
अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर संभावित प्रभाव
यदि ब्रिक्स की यह वैकल्पिक व्यवस्था सफल होती है, तो इसका सबसे बड़ा प्रभाव रणनीतिक होगा। अमेरिका का दबदबा सिर्फ स्विफ्ट पर निर्भर नहीं है, बल्कि उसके वित्तीय बाजारों और बैंकिंग संस्थानों की गहराई पर भी टिका है। हालांकि, यदि विकासशील देश स्थानीय मुद्राओं में व्यापार करना शुरू करते हैं, तो डॉलर की मांग में कमी आएगी। इससे अमेरिका को एक झटका जरूर लग सकता है, लेकिन यह एक क्रमिक प्रक्रिया होगी, न कि अचानक होने वाला कोई वित्तीय बदलाव।
व्यापार में ब्रिक्स का बढ़ता कद
आंकड़ों पर गौर करें तो ब्रिक्स की ताकत का अंदाजा लगाया जा सकता है। वर्ष 2003 में ब्रिक्स देशों के बीच आपसी वस्तु व्यापार 8420 करोड़ डॉलर था, जो 2024 में बढ़कर 1.17 ट्रिलियन डॉलर हो गया। दुनिया के कुल निर्यात में ब्रिक्स की हिस्सेदारी 2003 में 12 फीसदी थी, जो 2024 तक बढ़कर 24 फीसदी तक पहुंच गई है। यह स्पष्ट करता है कि ब्रिक्स अब महज एक राजनीतिक समूह नहीं बल्कि वैश्विक व्यापार का एक बड़ा केंद्र बन चुका है। अंततः, ब्रिक्स की यह रणनीति डॉलर को पूरी तरह हटाने के बजाय दुनिया को एक बहुध्रुवीय वित्तीय विकल्प देने की ओर अग्रसर है।
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