Coffee Par Kurukshetra: राज्यसभा में बहुमत के बाद किन मुद्दों पर होगी BJP की पहली नजर? जानें पूरी बहस के अहम बिंदु भारत एक घंटा पहले 3
कॉफी पर कुरुक्षेत्र में राज्यसभा चुनाव की रणनीति से लेकर कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन, बंगाल में टीएमसी की अंदरूनी खींचतान और इंडिया गठबंधन के भविष्य तक कई अहम राजनीतिक मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई।

राज्यसभा चुनाव और दोनों दलों की चाल

कार्यक्रम की शुरुआत राज्यसभा चुनाव से जुड़े कुछ रोचक पहलुओं के साथ हुई। झारखंड, तमिलनाडु और मध्य प्रदेश में प्रत्याशियों के चयन को लेकर कांग्रेस किस सोच के साथ आगे बढ़ रही है, इस पर पैनल में खुलकर बात हुई। दूसरी ओर, बीजेपी की तरफ से कुछ ऐसे चेहरों को मैदान में उतारे जाने को पार्टी की दूरगामी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना गया, जिनकी उम्मीद कम लोगों को थी। जानकारों का आकलन है कि अगर इन चुनावों में बीजेपी और उसके साथी दल मनचाही कामयाबी हासिल कर लेते हैं, तो ऊपरी सदन में उनकी पकड़ और मजबूत होगी।

राहुल गांधी और मुद्दों की तलाश

प्रधानमंत्री के हाल के सूरत दौरे और वहां दिए गए संबोधन ने देश की सियासत में एक ताजा बहस को हवा दे दी है। कार्यक्रम में मौजूद विश्लेषकों ने इस बयान को सीधे कांग्रेस और राहुल गांधी की राजनीति से जोड़कर देखा। उनकी दलील थी कि बीते कुछ बरसों से कांग्रेस लगातार ऐसे मुद्दे ढूंढ रही है जिनके सहारे वह बीजेपी को घेर सके, मगर मनचाहा नतीजा हाथ नहीं लग रहा। चर्चा के दौरान राहुल गांधी की उस टिप्पणी का भी हवाला दिया गया, जिसमें उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था पर आलोचनात्मक रुख अपनाया था। पैनल का कहना था कि जब भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है, विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत स्थिति में है और विकास दर कई विकसित देशों से आगे है, तब इस तरह की बातें आम लोगों के गले उतरने वाली नहीं लगतीं।

कर्नाटक में नेतृत्व बदलने की असल वजह

बहस का दूसरा बड़ा केंद्र कर्नाटक की सियासत रही। विशेषज्ञों की राय थी कि मुख्यमंत्री की कुर्सी बदलने के पीछे सिर्फ जनभावना नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतरी समीकरण और सत्ता में संतुलन साधने की मजबूरी भी काम कर रही थी। नए मंत्रिमंडल के गठन के बाद उभरा असंतोष, मंत्रियों की नाराजगी और संगठन के भीतर की रस्साकशी को भी पार्टी के लिए बड़ी चुनौती बताया गया।

टीएमसी को एकजुट रखने की चुनौती

इसी क्रम में पश्चिम बंगाल की राजनीति पर भी बात हुई, जहां चुनावी नतीजों के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर बढ़ती नाराजगी की खबरें सामने आ रही हैं। पैनल का दावा था कि पार्टी के कई सांसद और विधायक नेतृत्व से खफा नजर आ रहे हैं। ममता बनर्जी की ओर से बुलाई गई बैठकों में उम्मीद के मुताबिक नेताओं का न पहुंचना भी इसी असंतोष की झलक बताया गया। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी, लेकिन राजनीतिक हलकों में इन्हें लेकर चर्चा जरूर गरम है।

इंडिया गठबंधन किस ओर?

कार्यक्रम के अंतिम हिस्से में इंडिया गठबंधन के भविष्य पर भी मंथन हुआ। विशेषज्ञों का कहना था कि गठबंधन के अस्तित्व में आने के बाद से ही उसमें वैचारिक और राजनीतिक तालमेल की कमी साफ झलकती रही है। ऐसे में आने वाली बैठकों और राजनीतिक घटनाक्रमों पर सबकी निगाहें टिकी रहेंगी।

कुल मिलाकर इस चर्चा से यह संकेत मिला कि भारतीय राजनीति एक ऐसे मोड़ पर पहुंच रही है, जहां सिर्फ चुनावी हार-जीत ही नहीं, बल्कि दलों के भीतर की एकजुटता, नेतृत्व की क्षमता और दूरगामी रणनीति भी आगे की दिशा तय करेगी। आने वाले महीनों में राज्यसभा चुनाव, विपक्षी गठबंधन की हालत और अलग-अलग राज्यों की सियासी हलचलें राष्ट्रीय राजनीति का स्वरूप गढ़ने में अहम भूमिका निभा सकती हैं।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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