साउथ चाइना सी में भारत की ब्रह्मोस तैनाती से तिलमिलाया ड्रैगन, स्कारबोरो शोल पर बनाया रहस्यमयी 'भूतिया ढांचा', सैटेलाइट में हुआ कैद विश्व एक घंटा पहले 2
फिलीपींस को भारत द्वारा सौंपी गई ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों से बौखलाए चीन ने स्कारबोरो शोल के मुहाने पर एक संदिग्ध ढांचा खड़ा किया, जो कुछ ही दिनों में सैटेलाइट तस्वीरों से गायब मिला। रॉयटर्स की रिपोर्ट में इस 'भूतिया' निर्माण को लेकर बड़े खुलासे हुए हैं।

दक्षिण चीन सागर इस समय एशिया का सबसे बड़ा सामरिक अखाड़ा बन चुका है, जहां युद्ध जैसी तनातनी का माहौल पैदा हो गया है। लंबे समय तक चीन इस समुद्री इलाके को अपनी निजी संपत्ति मानता रहा है, लेकिन अब उसकी मनमानी पर लगाम लगाने के लिए भारत ने वहां अपनी घातक ब्रह्मोस मिसाइलें तैनात कर दी हैं। भारत के इस मजबूत सहयोग के दम पर फिलीपींस जैसा छोटा देश भी अब चीन के सामने आत्मविश्वास से खड़ा हो रहा है। हाथ से बाजी फिसलती देख चीन बुरी तरह बौखला उठा है और उसने एक नई चाल चल दी है—समुद्र के बीचों-बीच चुपचाप एक ऐसा 'भूतिया ढांचा' खड़ा कर दिया, जो रातों-रात गायब हो गया।

आखिर चीन ने समुद्र में क्या किया?

रॉयटर्स की एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में सैटेलाइट तस्वीरों के हवाले से दावा किया गया है कि फिलीपींस के नजदीक मौजूद बेहद संवेदनशील और विवादित 'स्कारबोरो शोल' के मुहाने पर चीन ने कुछ संदिग्ध निर्माण किया था। हालांकि कुछ ही दिनों बाद जब उसी जगह की दोबारा तस्वीरें ली गईं, तो वह ढांचा वहां से नदारद मिला। इस अजीबोगरीब घटना ने यह संकेत दे दिया है कि चीन इस इलाके में कोई बड़ी सोची-समझी रणनीति तैयार कर रहा है।

कैसे खुली चीन की पोल

इस पूरे रहस्य की शुरुआत मई के आखिरी हफ्ते में हुई। कमर्शियल सैटेलाइट तस्वीरें मुहैया कराने वाली कंपनी 'वेंटोर' (Vantor) ने 27, 29 और 30 मई को स्कारबोरो शोल की साफ तस्वीरें ली थीं। जब इन तस्वीरों का बारीकी से विश्लेषण किया गया, तो पता चला कि इस एटॉल (Atoll) के एंट्री पॉइंट पर एक तैरता हुआ बड़ा राफ्ट या बोय (Buoy) जैसी कोई चीज मौजूद थी। इसके साथ ही समुद्र के उस हिस्से में एक लंबा बैरियर भी फैला हुआ नजर आ रहा था।

इसी दावे को पुख्ता करते हुए अमेरिका की मरीन मॉनिटरिंग संस्था 'सीलाइट' ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर 28 मई की एक तस्वीर साझा की। संस्था ने बताया कि रिलीफ फ्लैट और लैगून के एंट्री पॉइंट के पास एक चमकदार चीज स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। सीलाइट का दावा था कि यह न तो कैमरे की कोई खराबी थी और न ही कोई परछाई, बल्कि एक ठोस ढांचा था जिसे वहां जानबूझकर रखा गया था।

लेकिन असली मोड़ तब आया जब 1 जून को वेंटोर ने उसी स्थान की दोबारा तस्वीरें लीं। इस नई तस्वीर में वह संदिग्ध ढांचा पूरी तरह गायब हो चुका था—मानो किसी ने रातों-रात उसे वहां से हटा दिया हो या समुद्र में छिपा दिया हो।

फिलीपींस सरकार के उड़े होश

यह खबर सामने आते ही फिलीपींस सरकार सकते में आ गई। फिलीपींस के रक्षा मंत्री गिल्बर्ट टियोडोरो ने सिंगापुर में आयोजित बड़े सुरक्षा मंच 'शांगरी-ला डायलॉग' के दौरान पत्रकारों से बातचीत में स्वीकार किया कि उन्हें इस संदिग्ध ढांचे के बारे में कच्ची खुफिया जानकारियां मिली थीं। फिलीपींस सरकार अब आधिकारिक तौर पर इस बात की जांच कर रही है कि चीन ने वहां आखिर क्या चाल चली थी।

दरअसल, स्कारबोरो शोल फिलीपींस के बेहद करीब है, लेकिन साल 2012 से चीन ने इस पर जबरन कब्जा जमा रखा है। चीन अक्सर यहां फिलीपींस के मछुआरों को आने से रोकता है और उनकी नावों पर वॉटर कैनन से हमला करता रहता है।

ड्रैगन के घर में भारत की एंट्री: तानी ब्रह्मोस मिसाइलें

एक तरफ जहां चीन समुद्र में यह 'भूतिया' खेल खेल रहा है, वहीं दूसरी ओर उसे टक्कर देने के लिए भारत ने भी इस इलाके में बड़ा दांव चल दिया है। भारत ने अपनी 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' के तहत फिलीपींस को अपनी सबसे खतरनाक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल 'ब्रह्मोस' सौंपी है। फिलीपींस ने इन मिसाइलों को दक्षिण चीन सागर के तटीय इलाकों में तैनात करना शुरू कर दिया है।

इसका सीधा मतलब यह है कि अगर चीन ने स्कारबोरो शोल या फिलीपींस की सीमा के पास कोई हिमाकत की, तो भारत की यह मिसाइल तकनीक चीनी नौसेना के युद्धपोतों को मिनटों में समुद्र में डुबाने की ताकत रखती है। जिस तरह चीन म्यांमार और श्रीलंका के जरिए हिंद महासागर में भारत को घेरने की कोशिश करता है, उसी की भाषा में जवाब देते हुए भारत ने सीधे दक्षिण चीन सागर में ही ड्रैगन के सामने ब्रह्मोस तान दी है।

चीन की हेकड़ी: 'हम जो करें, वह हमारा अधिकार'

जब इस रहस्यमयी ढांचे को लेकर बीजिंग में चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग से तीखे सवाल पूछे गए, तो उन्होंने हमेशा की तरह गोलमोल और रौबदार जवाब दिया। चीन ने यह साफ तौर पर स्वीकार नहीं किया कि वह ढांचा उसका था, लेकिन इतना जरूर कहा कि हुआंगयान द्वीप (चीन स्कारबोरो शोल को इसी नाम से पुकारता है) और उसके आसपास के पानी पर चीन की संप्रभुता को कोई चुनौती नहीं दे सकता।

चीन का कहना है कि इस द्वीप पर वह जो भी काम करता है—चाहे वह वैज्ञानिक रिसर्च ही क्यों न हो—वह एक संप्रभु देश का कानूनी अधिकार है। यह बयान साफ इशारा करता है कि समुद्र में जो 'चोरी-छिपे' निर्माण वह कर रहा है, उसे चीन अपना हक मानता है और दुनिया की परवाह नहीं करता।

क्यों इतनी अहम है यह जगह?

नक्शे पर देखें तो स्कारबोरो शोल कोई बहुत बड़ा टापू नहीं है, बल्कि समुद्र के बीच त्रिकोण आकार की एक चट्टान जैसी जगह है, जिसके बीचोंबीच नीले पानी का एक खूबसूरत लैगून है। लेकिन कूटनीति की भाषा में यह बेहद कीमती है।

  • मछलियों का खजाना: इस इलाके में मछलियों का विशाल भंडार है, जिससे फिलीपींस के हजारों मछुआरों की रोजी-रोटी चलती है।
  • तूफान से सुरक्षा: समुद्र में भारी तूफान आने पर जहाजों को छिपाने के लिए इसका लैगून एक सुरक्षित ठिकाने की तरह काम करता है।
  • रणनीतिक लोकेशन: यह इलाका दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापारिक मार्गों के एकदम पास है। अगर चीन ने यहां अपनी मिलिट्री पोस्ट पक्की कर ली, तो वह पूरे अंतरराष्ट्रीय व्यापार को अपने इशारे पर नियंत्रित कर सकता है। भारत का भी 55% से ज्यादा व्यापार इसी रास्ते से होता है, इसलिए यहां भारत का सक्रिय होना जरूरी है।

अंतरराष्ट्रीय अदालत का फैसला रद्दी की टोकरी में

साल 2016 में अंतरराष्ट्रीय अदालत ने दक्षिण चीन सागर को लेकर फिलीपींस के पक्ष में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। अदालत ने साफ कहा था कि स्कारबोरो शोल पर चीन की नाकेबंदी अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है, क्योंकि यह इलाका कई देशों के मछुआरों का पारंपरिक ठिकाना रहा है। लेकिन चीन ने इस फैसले को मानने से साफ इनकार कर दिया।

पिछले साल तो हद ही हो गई, जब चीन ने पूरे शोल को एक 'नेशनल नेचर रिजर्व' घोषित कर दिया, जिसे फिलीपींस ने कब्जे का एक बहाना बताया था।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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