NEET के जरिए MBBS में बुजुर्गों के लिए 1% आरक्षण की मांग को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने किया खारिज भारत एक घंटा पहले 7
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET के माध्यम से वरिष्ठ नागरिकों को 1% आरक्षण देने संबंधी याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यह नीतिगत मामला है और इस पर निर्णय लेना विधायिका या सरकार का अधिकार क्षेत्र है।

अदालत का स्पष्ट रुख

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मेडिकल पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए वरिष्ठ नागरिकों (सीनियर सिटीजन्स) को 1% आरक्षण प्रदान करने की मांग वाली एक महत्वपूर्ण याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने एकल न्यायाधीश (सिंगल जज) के उस पिछले फैसले को पूरी तरह बरकरार रखा है, जिसमें इसी तरह की मांग को ठुकरा दिया गया था। जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने अशोक बहार द्वारा दाखिल की गई एक विशेष अपील का निपटारा करते हुए यह स्पष्ट किया कि इस प्रकार का आरक्षण लागू करना पूरी तरह से संबंधित विधायिका या सरकार का विशेषाधिकार है। न्यायालय ने कहा कि इस तरह के नीतिगत विषयों पर कोई भी निर्णय लेने का दायित्व सरकार का है, न कि न्यायालय का।

प्रस्तावित आरक्षण के लिए वैधानिक आधार का अभाव

खंडपीठ ने अपने अवलोकन में कहा कि वर्तमान नियमों में बुजुर्गों के लिए आरक्षण का कोई भी प्रावधान मौजूद नहीं है। याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत किए गए प्रतिनिधित्व (रिप्रेजेंटेशन) में ऐसा कोई भी कानूनी अधिकार नहीं दिखाई दिया, जिसके लिए न्यायालय को रिट ऑफ मैंडेमस (Mandamus) जारी करने की आवश्यकता महसूस हो। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि MBBS और अन्य चिकित्सा पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए बुजुर्गों के विशेष कोटे की मांग किसी भी ठोस कानूनी अधिकार पर आधारित नहीं है। ऐसी स्थिति में, अदालत के हस्तक्षेप की कोई कानूनी गुंजाइश नहीं बचती है।

याचिकाकर्ता की मांग और कानूनी पृष्ठभूमि

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अशोक बहार ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर मांग की थी कि अधिकारियों को उनके द्वारा दिए गए सुझावों और प्रतिनिधित्व पर विचार करने का निर्देश दिया जाए। उनकी मुख्य मांग यह थी कि संबंधित अधिकारी NEET परीक्षा के माध्यम से होने वाले प्रवेश में वरिष्ठ नागरिकों के लिए 1% विशेष कोटा या आरक्षण लागू करने की दिशा में एक ठोस नीतिगत निर्णय लें। इसके साथ ही, याचिका में अधिकारियों को 23 जून, 2026 की पेंडिंग रिप्रेजेंटेशन पर एक निश्चित समय सीमा के भीतर तर्कपूर्ण आदेश पारित करने का निर्देश देने की गुहार लगाई गई थी। इससे पहले, सिंगल जज ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि यह मामला पूर्णतः नीतिगत है और इसमें रिट जारी नहीं की जा सकती। इसी फैसले को चुनौती देते हुए यह अपील दायर की गई थी।

NTA की भूमिका और अदालत की नसीहत

नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) के वकील ने अदालत के समक्ष स्पष्ट किया कि NTA केवल एक परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था है। यह एजेंसी MBBS प्रवेश के लिए निर्धारित मौजूदा कानूनों और सरकारी नीतियों का पालन करने के लिए बाध्य है। बेंच को जानकारी दी गई कि वर्तमान नियमों के तहत अपीलकर्ता की मांग के अनुरूप कोई भी प्रावधान मौजूद नहीं है। न्यायालय ने अपने आदेश में कहा, 'अपीलकर्ता इस मामले को सरकार या विधायिका के समक्ष रख सकते हैं, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में न्यायालय द्वारा मैंडेमस जारी करने का कोई आधार नहीं बनता है।' अंत में, कोर्ट ने दोहराया कि चिकित्सा शिक्षा के लिए प्रवेश नियमों और आयु सीमा जैसे मामलों को निर्धारित करना कार्यपालिका का कार्य है। हाई कोर्ट ने सिंगल जज के आदेश में किसी भी प्रकार की त्रुटि न पाते हुए अपील को पूरी तरह से खारिज कर दिया है।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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