स्ट्रॉबेरी की खेती: एक पौधे से 500 ग्राम तक उत्पादन, पलामू के किसानों के लिए मुनाफे का नया जरिया झारखंड एक घंटा पहले 6
पलामू में किसान अब पारंपरिक फसलों के बजाय स्ट्रॉबेरी की खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं, जहां सही तकनीकी ज्ञान के साथ प्रति पौधा 500 ग्राम तक की बंपर पैदावार ली जा सकती है।

पलामू में खेती का बदलता स्वरूप

आज के दौर में पलामू के किसान खेती में आधुनिक बदलाव अपना रहे हैं। पारंपरिक फसलों से हटकर वे अब नकदी फसलों की खेती को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिससे उनकी आय में इजाफा हो सके। इस बदलाव में स्ट्रॉबेरी की खेती एक प्रमुख विकल्प बनकर सामने आई है। यदि किसान सही किस्म का चुनाव करें और वैज्ञानिक तरीके से खेती करें, तो वे इस व्यवसाय से शानदार मुनाफा कमा सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रबंधन सही हो, तो एक स्ट्रॉबेरी के पौधे से 400 से 500 ग्राम तक फलों का उत्पादन आसानी से लिया जा सकता है।

पौधों की रोपाई और सही दूरी का महत्व

क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र चियांकी के कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रमोद कुमार के अनुसार, स्ट्रॉबेरी की अच्छी फसल के लिए रोपाई का तरीका सबसे महत्वपूर्ण होता है। उन्होंने बताया कि पौधों को लगाते समय 25 सेंटीमीटर की दूरी का ध्यान रखना अनिवार्य है। वहीं, एक लाइन से दूसरी लाइन के बीच की दूरी 40 सेंटीमीटर रखी जानी चाहिए। इस निश्चित दूरी को बनाए रखने से पौधों को फैलने के लिए पर्याप्त जगह मिलती है और किसान को उनकी देखरेख करने में काफी आसानी होती है।

कौन सी किस्म है सबसे बेहतर?

पलामू के किसान वर्तमान में मुख्य रूप से विंटर डॉन नामक किस्म की खेती कर रहे हैं, जो यहां के अनुकूल मानी जा रही है। इसके अलावा किसान चांडलर और पूसा अर्ली जैसी उन्नत किस्मों का भी उपयोग कर सकते हैं। खेती की समयसीमा के बारे में वैज्ञानिक ने बताया कि किसान 15 अक्टूबर के बाद से इसकी रोपाई शुरू कर सकते हैं। रोपाई के लगभग 40 से 45 दिनों के बाद पौधों में फल आना शुरू हो जाते हैं। स्थानीय मौसम और खेती के प्रबंधन के आधार पर फरवरी से मार्च महीने तक फलों की तुड़ाई की जा सकती है।

मल्चिंग तकनीक के फायदे

स्ट्रॉबेरी की खेती में मिट्टी की नमी को बरकरार रखना और खरपतवार पर नियंत्रण पाना सबसे बड़ी चुनौती होती है। इसके लिए मल्चिंग तकनीक का इस्तेमाल करना बेहद कारगर साबित होता है। मल्च बिछाने से फल सीधे मिट्टी के संपर्क में नहीं आते, जिससे उनके मिट्टी से गंदे होने या सड़ने का खतरा काफी कम हो जाता है। साथ ही, यह मिट्टी में नमी को लंबे समय तक बनाए रखने में मदद करता है और खरपतवार की अनचाही वृद्धि को नियंत्रित करता है, जिससे फसल की गुणवत्ता बेहतर बनी रहती है।

पौधों का चुनाव और रोगों से सुरक्षा

पलामू के किसान उच्च गुणवत्ता वाले पौधों के लिए अन्य राज्यों पर निर्भर हैं। कई किसान पुणे से स्ट्रॉबेरी के पौधे मंगवाते हैं ताकि बेहतर उत्पादन सुनिश्चित हो सके। रोपाई करने से पहले यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि पौधों की जड़ें पूरी तरह से स्वस्थ हों और किसी भी प्रकार के रोग से मुक्त हों। खेती के दौरान निरंतर निगरानी रखने और समय-समय पर पौधों की उचित देखभाल करने से ही बेहतर पैदावार प्राप्त की जा सकती है।

तुड़ाई, पैकिंग और बाजार की रणनीति

स्ट्रॉबेरी एक बेहद नाजुक फल है, इसलिए इसकी तुड़ाई और उसके बाद की प्रक्रिया में विशेष सावधानी बरतना आवश्यक है। जब फल लगभग 75 प्रतिशत तक पक जाएं, तब उन्हें बाजार की दूरी और मांग के अनुसार तोड़ लेना चाहिए। फलों को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें हवादार प्लास्टिक के कंटेनर में पैक करना सबसे अच्छा रहता है, ताकि परिवहन के दौरान फल आपस में दबकर खराब न हों। पलामू के किसान अपनी उपज को कोलकाता और बनारस जैसे बड़े बाजारों में आसानी से भेज सकते हैं। हालांकि, मुनाफा अधिकतम करने के लिए किसानों को बाजार की मांग, परिवहन खर्च और वहां मिल रहे विक्रय मूल्य का सटीक आकलन पहले ही कर लेना चाहिए।

सरकारी सहायता का लाभ कैसे उठाएं?

स्ट्रॉबेरी की खेती को बढ़ावा देने के उद्देश्य से सरकार भी किसानों की मदद कर रही है। किसान इस संबंध में अधिक जानकारी और सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए अपने नजदीकी जिला उद्यान विभाग से संपर्क कर सकते हैं। पात्रता और नियमों के प्रावधानों के अनुसार, किसानों को विभाग की ओर से सब्सिडी या अन्य वित्तीय सहायता प्राप्त हो सकती है। सरकारी मदद से खेती की लागत कम हो जाती है, जिससे किसानों का मुनाफा और अधिक बढ़ जाता है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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