मध्य प्रदेश
एक घंटा पहले
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विचारों
मानसून की सक्रियता शुरू होते ही किसान खरीफ सीजन की तैयारियों में जुट गए हैं। पिछले कुछ सालों से देखा जा रहा है कि किसान पारंपरिक खेती से हटकर कुछ नया करने को लेकर उत्साहित हैं। खासकर जब आसपास या जान-पहचान के किसान कमर्शियल फसलें लगाकर अच्छा मुनाफा कमाते हैं, तो दूसरे किसान भी उनसे प्रेरणा लेते हैं। बुंदेलखंड के सागर की बात करें तो यहां रबी सीजन में अश्वगंधा का रकबा अचानक बढ़ा है, और इसी तरह खरीफ सीजन में किसान अब काली हल्दी पर ज्यादा भरोसा दिखा रहे हैं। यह रुझान सिर्फ सागर ही नहीं, बल्कि पूरे बुंदेलखंड में देखने को मिल रहा है।
क्यों बढ़ रहा काली हल्दी की ओर रुझान
काली हल्दी की खेती की ओर किसानों के बढ़ते झुकाव की बड़ी वजह यह है कि इसमें सामान्य हल्दी जितनी ही मेहनत लगती है। उत्पादन भले ही कम मिले, लेकिन दाम 4 गुना से लेकर 6 गुना तक अधिक मिल जाते हैं। यही कारण है कि किसानों को सामान्य फसल की तुलना में चार गुना अधिक मुनाफा हो रहा है।
दाम में इतना बड़ा अंतर क्यों
सागर कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी और मुख्य वैज्ञानिक डॉक्टर के.एस. यादव बताते हैं कि सामान्य हल्दी का इस्तेमाल आमतौर पर सब्जियों में मसाले के रूप में होता है, इसलिए इसकी कीमत ₹100 से लेकर अधिकतम ₹500 तक रहती है। वहीं काली हल्दी का उपयोग औषधीय महत्व के चलते आयुर्वेद में किया जाता है। इसमें कई गुण होने की वजह से इसकी कीमत 500 रुपये से शुरू होकर 2500 रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाती है।
कैसे करें काली हल्दी की पहचान
काली हल्दी को पहचानना आसान है। जब इसकी गांठ को काटा जाता है तो उसके अंदर नीला या हल्का काला रंग दिखाई देता है, जबकि सामान्य हल्दी की गांठ पीले रंग की होती है। खेती के लिए जून के महीने में खेत तैयार करके इसे लगाना चाहिए। एक एकड़ खेत में लगभग 10 क्विंटल बीज की जरूरत होती है।
उत्पादन और कमाई का गणित
उत्पादन की बात करें तो जहां पीली हल्दी में 400 क्विंटल तक उपज मिल सकती है, वहीं काली हल्दी में यह घटकर ढाई सौ क्विंटल तक रह जाती है। हालांकि इसके दाम अच्छे होने से यह कमी पूरी हो जाती है। अगर किसान इसका पाउडर बनाते हैं या किसी अन्य तरीके से वैल्यू एडिशन करते हैं, तो इसकी कीमत और भी बढ़ जाती है।
किसानों के लिए जरूरी सलाह
डॉ. के.एस. यादव कहते हैं कि किसान काली हल्दी की खेती तो करते हैं, लेकिन अगर कम जगह में इसका उत्पादन ले रहे हैं तो मार्केटिंग में दिक्कत आती है। ऐसे में या तो किसानों को छोटी-छोटी जगहों पर समूह बनाकर खेती करनी चाहिए, या फिर पहले अपना बाजार सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि इसे कौन खरीदेगा और कहां बेचा जा सकता है, ताकि उत्पादन के बाद किसी तरह की परेशानी न हो।
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