बिहार
3 महीने पहले
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विचारों
छपरा की सब्जी खेती की खास पहचान
बिहार के छपरा जिले के कुछ इलाके अपनी उन्नत किस्म की सब्जी खेती के लिए देशभर में पहचाने जाते हैं। यहाँ की उपजाऊ मिट्टी और किसानों की मेहनत का ही परिणाम है कि स्थानीय स्तर पर उगाई गई सब्जियां न केवल गुणवत्ता में बेहतर होती हैं, बल्कि बाजार में उनका आकर्षण भी बना रहता है। जिले के मांझी ब्लॉक में करेले की खेती बड़े स्तर पर की जाती है। यहाँ पैदा होने वाला करेला अपने आकार और स्वाद के लिए काफी मशहूर है। यही कारण है कि स्थानीय बाजारों के साथ-साथ गोपालगंज, सीवान और उत्तर प्रदेश तक के व्यापारी यहां से थोक में सब्जी खरीदने आते हैं।
नंदिता वैरायटी की धूम
छपरा के किसान मुख्य रूप से नंदिता किस्म के करेले की खेती को प्राथमिकता देते हैं। इस वैरायटी की सबसे बड़ी खूबी इसका बंपर उत्पादन है। स्थानीय लोगों का मानना है कि इस करेले से बनने वाला भरुवा बहुत स्वादिष्ट होता है। यहाँ के किसानों के पास खेती का वर्षों पुराना अनुभव है, जिससे वे ऐसी तकनीक अपनाते हैं कि सब्जियां जल्दी खराब नहीं होतीं और लंबे समय तक तरोताजा बनी रहती हैं। इस इलाके में ज्यादातर किसान जैविक खाद का उपयोग करते हैं, जिससे उत्पाद की गुणवत्ता और भी बढ़ जाती है।
मचान विधि से खेती का फायदा
छपरा के किसानों ने खेती का एक अनोखा और सफल तरीका विकसित किया है। इस क्षेत्र में लगभग 90% किसान मचान विधि का उपयोग करते हैं। इस तकनीक के पीछे एक ठोस वैज्ञानिक और व्यावहारिक कारण है। बरसात के दिनों में जब जमीन गीली होती है, तो मिट्टी में कीटों की समस्या बढ़ जाती है। यदि करेले की बेल जमीन पर फैली हो, तो फल सीधे मिट्टी के संपर्क में आकर खराब होने का खतरा रहता है।
मचान विधि से खेती करने पर बेलें जमीन से ऊपर रहती हैं, जिससे फल पूरी तरह सुरक्षित रहते हैं। इसके अलावा, बारिश के पानी में बेलों के गलने की समस्या भी खत्म हो जाती है। किसान केवल पौधे की जड़ को मिट्टी में रखते हैं और उसके चारों ओर मिट्टी चढ़ाकर उसे ऊँचा कर देते हैं, जिससे पानी का जमाव जड़ तक नहीं पहुँच पाता। इस स्मार्ट आईडिया ने किसानों के नुकसान को कम किया है और मुनाफे को कई गुना बढ़ा दिया है।
किसान महंत यादव का अनुभव
स्थानीय किसान महंत यादव ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्होंने अपने आठ कट्ठा खेत में नंदिता किस्म का करेला लगाया है। उन्होंने कहा कि फसल का फलन शुरू हो गया है और अब उन्हें प्रतिदिन फसल को तोड़कर बाजार में बेचना पड़ रहा है। उनके खेत से रोजाना 80 किलो से लेकर 1 क्विंटल से भी अधिक करेले का उत्पादन हो रहा है। इस किस्म की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसका फलन लगातार 2 से 3 महीने तक चलता रहता है।
महंत यादव पिछले 15 वर्षों से करेले की खेती कर रहे हैं। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि करेले की फसल को विशेष देखभाल की जरूरत होती है। यदि समय पर कीटनाशकों का छिड़काव और रोगों का सही उपचार न किया जाए, तो पूरी फसल बर्बाद हो सकती है। सही समय पर दवा न डालने से किसानों को भारी नुकसान भी उठाना पड़ सकता है। वह अपनी फसल को पास के ही स्थानीय बाजार में बेच देते हैं, जहां से व्यापारी उसे आगे के लिए खरीद ले जाते हैं। उनका मानना है कि अगर मचान विधि का सही तरीके से पालन किया जाए, तो नंदिता वैरायटी से उम्मीद से कहीं ज्यादा पैदावार मिलती है।
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