मजदूरी से मैराथन तक: 7 साल की उम्र में अनाथ हुए मनीष की कहानी, अब स्पीति में 77 किमी की दौड़ के लिए तैयार बिहार एक महीने पहले 75
भोजपुर के रहने वाले मनीष कुमार ने बेहद कम उम्र में माता-पिता को खोने के बाद मजदूरी करके अपना जीवन गुजारा, लेकिन हार नहीं मानी। अब वह संघर्षों को पीछे छोड़ हिमाचल प्रदेश की कठिन 77 किलोमीटर लंबी अल्ट्रा मैराथन में हिस्सा लेने जा रहे हैं।

संघर्षों के बीच पली-बढ़ी उम्मीद

बिहार के भोजपुर जिले के मथुरापुर गांव के रहने वाले मनीष कुमार की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। जिंदगी ने मनीष की परीक्षा तब लेना शुरू कर दिया जब वह महज 7 साल के थे। कम उम्र में ही अपने माता-पिता का साया सिर से उठ जाने के कारण मनीष के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया। बचपन का वह दौर अभाव और अकेलेपन से भरा था, लेकिन मनीष ने इन परिस्थितियों के आगे घुटने टेकने के बजाय अपनी किस्मत खुद लिखने की ठानी। उन्होंने अपने परिवार की जिम्मेदारियों को उठाने के लिए छोटी उम्र में ही मजदूरी का रुख किया।

मेहनत और दौड़ का तालमेल

अपनी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए मनीष ने पाइप फिटिंग और प्लम्बिंग का हुनर सीखा। वह दिनभर कड़ी मेहनत करके अपना पेट भरते थे, लेकिन दौड़ने के प्रति उनका जुनून कभी कम नहीं हुआ। मनीष बताते हैं कि दिनभर काम की थकान के बावजूद उन्होंने दौड़ने का अभ्यास कभी नहीं छोड़ा। सुबह और शाम का समय उन्होंने हमेशा अपने प्रशिक्षण के लिए सुरक्षित रखा। गांव की धूल भरी पगडंडियों से शुरू हुआ उनका सफर आज पहाड़ों की चुनौतीपूर्ण ऊंचाइयों तक पहुंच गया है। उन्होंने कई स्थानीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेकर अपनी क्षमता साबित की है।

आर्थिक तंगी से खेल छोड़ने की नौबत

पाइप फिटर के काम से लेकर एक अल्ट्रा रनर बनने का सफर बेहद कष्टदायक रहा। आर्थिक तंगी के कारण एक समय ऐसा भी आया जब उन्हें लगा कि अब खेल को जारी रखना मुश्किल होगा और खेल छोड़ने की नौबत आ गई। सीमित संसाधनों के बीच फिटनेस बनाए रखना और किसी प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए यात्रा का खर्च जुटाना उनके लिए रोज का संघर्ष था। इसके बावजूद मनीष ने अपने लक्ष्य से कभी नजर नहीं हटाई। वह कहते हैं कि हर चुनौती ने उन्हें पहले से अधिक मजबूत बनाया है।

स्पीति की कठिन राहों पर दौड़

अब मनीष का अगला लक्ष्य हिमाचल प्रदेश का स्पीति इलाका है। वहां होने वाली 77 किलोमीटर की अल्ट्रा मैराथन उनकी अब तक की सबसे बड़ी चुनौती है। स्पीति की भीषण ठंड, कम ऑक्सीजन और कठिन रास्तों पर दौड़ना किसी भी एथलीट के लिए एक बड़ी परीक्षा है। मनीष का कहना है कि यह दौड़ केवल एक खेल नहीं है, बल्कि यह उनके संघर्ष और सहनशक्ति की परीक्षा है। वह चाहते हैं कि बिहार के युवा और उनके गांव के लोग यह जान सकें कि गरीबी और अभाव सफलता की राह में कभी बाधा नहीं बन सकते।

बिहार का नाम रोशन करने का जज्बा

मनीष का सपना सिर्फ एक मैराथन जीतना नहीं है। वह देश और दुनिया के मंच पर बिहार का मान बढ़ाना चाहते हैं। उनका दृढ़ विश्वास है कि यदि उन्हें भविष्य में उचित मार्गदर्शन और खेल संसाधनों का सहयोग प्राप्त होता है, तो वह अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भी अपने राज्य का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। मथुरापुर का यह साधारण युवक आज अपनी मेहनत के दम पर असाधारण मिसाल बन गया है। बचपन में अपनों को खोने के बाद मजदूरी कर जिंदगी संभालने वाले मनीष आज उन सभी युवाओं के लिए एक बड़ी प्रेरणा हैं जो विपरीत परिस्थितियों में खुद को असहाय महसूस करते हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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