बिना केमिकल के हर्बल साबुन बना रहीं जावेश्वरी साहू, सिर्फ 10 रुपये में बिक रहा उत्पाद छत्तीसगढ़ एक महीने पहले 23
बालोद जिले के तरौद गांव की जावेश्वरी साहू बिना केमिकल वाले हर्बल साबुन तैयार कर रही हैं, जिनकी कीमत महज 10 से 20 रुपये है और मांग लगातार बढ़ रही है।

छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के तरौद गांव की रहने वाली जावेश्वरी साहू ने अपनी मेहनत और हुनर के बल पर एक छोटा कारोबार खड़ा कर लिया है, जो आज उनके लिए अतिरिक्त आमदनी का बेहतर जरिया बन चुका है। पिछले 2-3 माह से वे हर्बल साबुन बनाने का काम कर रही हैं। खास बात यह है कि उनके बनाए साबुन पूरी तरह बिना किसी केमिकल के तैयार किए जाते हैं, यही वजह है कि लोगों के बीच इनकी मांग लगातार बढ़ती जा रही है।

बुआ से सीखी थी साबुन बनाने की कला

जावेश्वरी बताती हैं कि हर्बल साबुन बनाने का हुनर उन्होंने अपनी बुआ से सीखा था। शुरुआत में यह उनके लिए महज एक घरेलू कौशल था, लेकिन शादी के बाद उन्होंने इस काम को गंभीरता से लिया और इसे कारोबार का रूप देने का फैसला किया। धीरे-धीरे उन्होंने तरह-तरह के हर्बल साबुन तैयार करना शुरू किया और स्थानीय बाजार में इनकी बिक्री शुरू कर दी।

हानिकारक रसायनों से दूरी

फिलहाल जावेश्वरी चारकोल, गुलाब, एलोवेरा और मुल्तानी मिट्टी जैसे प्राकृतिक तत्वों से साबुन बनाती हैं। इन उत्पादों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें किसी भी हानिकारक रसायन का इस्तेमाल नहीं होता। यही कारण है कि ग्राहक इन्हें पसंद कर रहे हैं और कई लोग बार-बार इन्हीं के साबुन खरीद रहे हैं। उनका मानना है कि अच्छी गुणवत्ता और उचित दाम ही उनके कारोबार की सबसे बड़ी ताकत हैं।

कितनी है साबुन की कीमत

कीमत की बात करें तो बड़ा साबुन सिर्फ 20 रुपये और छोटे आकार का साबुन 10 रुपये में उपलब्ध है। कम दाम और प्राकृतिक सामग्री के चलते ग्रामीण इलाकों के साथ-साथ विभिन्न सरकारी शिविरों और स्थानीय आयोजनों में भी इनके साबुन की अच्छी मांग बनी रहती है। कई ग्राहक सीधे संपर्क कर ऑर्डर भी देते हैं।

8 से 10 हजार रुपये में हुई शुरुआत

जावेश्वरी ने बताया कि इस कारोबार को शुरू करने में उन्हें करीब 8 से 10 हजार रुपये की लागत आई थी। शुरुआती निवेश के बाद बिक्री लगातार बढ़ती गई और आज वे अपनी लागत से कहीं अधिक आमदनी कमा चुकी हैं। उनका कहना है कि अगर महिलाएं अपने हुनर को पहचानकर छोटे स्तर पर भी कारोबार शुरू करें, तो आत्मनिर्भर बन सकती हैं।

महिला सशक्तिकरण की मिसाल

तरौद गांव खुद महिला सशक्तिकरण का एक अच्छा उदाहरण माना जाता है। यहां कई महिला समूह सक्रिय हैं और गांव की कई महिलाएं अलग-अलग आजीविका गतिविधियों से जुड़कर आर्थिक रूप से मजबूत बनी हैं। गांव की कुछ महिलाएं 'लखपति दीदी' का दर्जा भी हासिल कर चुकी हैं। ऐसे माहौल में जावेश्वरी साहू की सफलता दूसरी महिलाओं के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन रही है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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