मध्य प्रदेश
14 घंटे पहले
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विचारों
बालाघाट का प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यटन
मध्य प्रदेश का बालाघाट जिला न केवल अपनी वन संपदा के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि इको टूरिज्म के केंद्र के रूप में भी तेजी से उभर रहा है। जिले का लगभग 53 प्रतिशत हिस्सा घने जंगलों और ऊंचे पहाड़ों से घिरा हुआ है। प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर यह क्षेत्र कई ऐसे धार्मिक और पर्यटक स्थलों का घर है, जो पर्यटकों और श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। इन्हीं में से एक बेहद खास स्थान है गढ़दा गांव में स्थित मां अन्नपूर्णा धाम, जो ऊंची पहाड़ी की चोटी पर चट्टानों के बीच सुरक्षित है। इस पवित्र स्थान तक पहुंचने का रास्ता रोमांच और आस्था के अद्भुत मेल से भरा है।
गढ़दा धाम की दुर्गम यात्रा
बालाघाट शहर से करीब 20 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद गढ़दा गांव का मार्ग शुरू होता है। इस यात्रा को पूरा करने के लिए स्थानीय मार्गदर्शकों की मदद ली जाती है। अन्नपूर्णा धाम के प्रमुख सहदेव अड़मे के मार्गदर्शन में यात्रा की शुरुआत की जाती है। सबसे पहले दो किलोमीटर का सफर कच्चे रास्तों से बाइक के माध्यम से माता बंजारी के धाम तक तय करना पड़ता है। बंजारी माता के मंदिर पर बाइक खड़ी करने के बाद असल चढ़ाई का सफर शुरू होता है। बंजारी माता धाम से मां अन्नपूर्णा तक पहुंचने के लिए लगभग साढ़े तीन किलोमीटर की बेहद कठिन और रोमांचक चढ़ाई पार करनी पड़ती है।
प्रकृति की गोद में कठिन रास्ता
यात्रा के शुरुआती हिस्से में मार्ग काफी सरल प्रतीत होता है, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता है, पहाड़ की ढलानें और रास्ता कठिन होता चला जाता है। हालांकि, रास्ते में मिलने वाले प्राकृतिक झरने, घने बादल और पहाड़ों के विहंगम दृश्य इस थकावट को मिटा देते हैं। सफर के दौरान सबसे चुनौतीपूर्ण हिस्सा 'लाल घाटी' की चढ़ाई है। यह इतनी कठिन है कि कई श्रद्धालु यहां से वापस लौट जाते हैं। लेकिन जो भक्त अटूट आस्था के साथ आगे बढ़ते हैं, वे करीब ढाई घंटे की कड़ी मेहनत के बाद मां के दरबार तक पहुंच ही जाते हैं। मंदिर तक पहुंचने के लिए अंतिम पड़ाव में पत्थरों और चट्टानों के बीच बनी गुफाओं से होकर गुजरना पड़ता है, जो अपने आप में एक अलग अनुभव है।
वर्ष 2006 में मां का प्राकट्य
मंदिर के पुजारी आमा डारे के अनुसार, मां अन्नपूर्णा 10 सितंबर 2006 को गढ़दा की इन पहाड़ियों पर स्वयं प्रकट हुई थीं। वे बताते हैं कि सबसे पहले गुरुदेव अड़में जी को माता के दर्शन प्राप्त हुए थे। उसी समय से इस स्थान पर मां अन्नपूर्णा की विधि-विधान से आराधना की जा रही है। प्रत्येक वर्ष 10 सितंबर को मां का प्रकटोत्सव बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस आयोजन में बालाघाट के अलावा आसपास के अन्य जिलों और अन्य राज्यों से भी हजारों की संख्या में भक्तगण शामिल होते हैं। इस अवसर पर भक्तों के लिए नि:शुल्क भंडारे और भोजन की विशेष व्यवस्था भी की जाती है।
चमत्कार और मां की महिमा
पुजारी आमा डारे ने मां अन्नपूर्णा की शक्ति से जुड़ा एक चमत्कार साझा किया। कुछ साल पहले भारी बारिश के दौरान जब पूरे इलाके में जलभराव हुआ और आसपास की पहाड़ियों में भूस्खलन होने से पर्वतों को काफी नुकसान पहुंचा था, उस दौरान भी माता का दरबार पूरी तरह सुरक्षित रहा। इसके अलावा, एक और अनोखी बात जो भक्तों के बीच चर्चा का विषय रहती है, वह है शाम के समय मंदिर परिसर में बाघ का आना। माना जाता है कि माता के दरबार में शाम के समय एक बाघ विश्राम करने आता है, जिसके कारण सुरक्षा के मद्देनजर शाम पांच बजे के बाद गर्भगृह में श्रद्धालुओं का प्रवेश पूरी तरह बंद कर दिया जाता है।
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