उत्तर प्रदेश
एक घंटा पहले
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विचारों
खुशियों के बीच पसरा मातम
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अलीगंज में हुए भीषण अग्निकांड ने कई परिवारों की खुशियां छीन ली हैं। इस हादसे में 27 वर्षीय नीलेश कुमार और 30 वर्षीय अनामिका सामंत की जान चली गई। इन दोनों की हाल ही में सगाई हुई थी और परिवार में उनकी आगामी शादी को लेकर जोरदार तैयारियां चल रही थीं। अचानक हुई इस घटना ने घर के माहौल को पूरी तरह बदल दिया है, जहां कुछ समय पहले शादी के गीत बजने वाले थे, वहां अब सिर्फ मातम और चीखें सुनाई दे रही हैं।
काम के दौरान परवान चढ़ा था प्यार
नीलेश और अनामिका की मुलाकात काम के सिलसिले में ही हुई थी। लखनऊ के रहने वाले नीलेश एक 3D कैरेक्टर आर्टिस्ट थे, जबकि कोलकाता निवासी अनामिका उसी बिल्डिंग की दूसरी मंजिल पर स्थित हेड हॉपर्स नाम के गेमिंग और एनीमेशन स्टूडियो में 3D मॉडलिंग ट्रेनर के पद पर कार्यरत थीं। दोस्ती से शुरू हुआ उनका सफर प्यार में बदला और फिर दोनों ने शादी करने का फैसला किया, जिसे दोनों परिवारों की रजामंदी भी मिल गई थी। शादी से कुछ दिन पहले ही अनामिका के माता-पिता कोलकाता से लखनऊ आए थे और दोनों परिवारों के बीच सगाई की रस्म पूरी हुई थी।
परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़
इस अग्निकांड का असर अनामिका के परिवार पर और भी ज्यादा गहरा हुआ है। अनामिका के 24 वर्षीय चचेरे भाई सौमल्य बेरा की भी इस भीषण आग में मौत हो गई। सौमल्य भी उसी स्टूडियो में 3D आर्टिस्ट हेड के तौर पर काम करते थे। सौमल्य 2022 में गुजरात से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद जून महीने में ही इस स्टूडियो से जुड़े थे। एक ही परिवार के दो सदस्यों के खोने से अनामिका के परिजन गहरे सदमे में हैं।
आखिरी बार लिया था माता-पिता का आशीर्वाद
नीलेश के भाई अभिषेक ने बताया कि परिवार ने अगले हफ्ते शादी की चर्चा को आगे बढ़ाने के लिए पश्चिम बंगाल जाने की ट्रेन टिकटें भी बुक कर ली थीं। घर में यात्रा और शादी की रस्मों को लेकर चर्चाएं चल रही थीं। नीलेश के पिता शत्रुघ्न लाल को वह सोमवार की सुबह आज भी याद है जब नीलेश ने रोज की तरह घर से निकलने से पहले अपने माता-पिता के पैर छूकर आशीर्वाद लिया था। किसी को इस बात का आभास नहीं था कि यह उनका आखिरी प्रणाम था। तीन भाई-बहनों में दूसरे नंबर पर रहे नीलेश को इस साल प्रमोशन और सैलरी में बढ़ोतरी की उम्मीद थी, ताकि वह शादी से पहले अपनी आर्थिक स्थिति को और मजबूत कर सकें, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
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