झारखंड में सेब की खेती की नई उम्मीद, पलामू के चियांकी केंद्र में चल रहा है सफल परीक्षण झारखंड एक महीने पहले 65
झारखंड के सुखाड़ प्रभावित जिले पलामू में पहली बार सेब की खेती पर वैज्ञानिक शोध किया जा रहा है, जिससे भविष्य में किसानों के लिए आय के नए रास्ते खुल सकते हैं।

पलामू में सेब की खेती पर बड़ा प्रयोग

झारखंड का पलामू जिला, जो अक्सर अपनी शुष्क जलवायु और सुखाड़ की समस्या के लिए जाना जाता है, अब एक नई कृषि क्रांति का गवाह बन सकता है। यहाँ के मेदिनीनगर स्थित क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र, चियांकी में वैज्ञानिकों ने पहली बार सेब की खेती को लेकर एक व्यापक वैज्ञानिक परीक्षण शुरू किया है। इस शोध का प्राथमिक उद्देश्य यह पता लगाना है कि क्या पलामू जैसी गर्म जलवायु में भी सेब का सफल उत्पादन किया जा सकता है। वर्तमान में चियांकी केंद्र में सेब के पौधों पर शोध जारी है और इन पौधों में फल भी लगने शुरू हो गए हैं, जिसने वैज्ञानिकों और स्थानीय लोगों में काफी उम्मीदें जगा दी हैं।

हरमन-99 किस्म पर वैज्ञानिकों की नजर

इस शोध परियोजना से जुड़े कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रमोद कुमार ने जानकारी दी कि अनुसंधान केंद्र में मुख्य रूप से हरमन-99 किस्म के सेब के पौधों का परीक्षण किया जा रहा है। शोध दल अलग-अलग प्रभेदों पर निरंतर काम कर रहा है और यह बारीकी से देख रहा है कि ये पौधे पलामू के वातावरण में कैसे ढल रहे हैं। वैज्ञानिक इन फलों के आकार, उनके स्वाद, गुणवत्ता और कुल उत्पादन क्षमता का गहराई से अध्ययन कर रहे हैं। यह डेटा बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी के आधार पर यह तय किया जाएगा कि पलामू की चुनौतीपूर्ण जलवायु में कौन सी विशेष किस्म किसानों के लिए सबसे अधिक लाभदायक साबित हो सकती है।

ड्रिप फर्टिगेशन तकनीक का महत्व

इस पूरी शोध प्रक्रिया में ड्रिप फर्टिगेशन या टपक सिंचाई प्रणाली का उपयोग एक मुख्य केंद्र बिंदु है। डॉ. प्रमोद कुमार के अनुसार, इस तकनीक का उद्देश्य उर्वरक प्रबंधन को बेहतर बनाना है। टपक सिंचाई के माध्यम से उर्वरक और पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाए जाते हैं। इस विधि का सबसे बड़ा लाभ यह है कि पौधों को आवश्यक पोषक तत्व बहुत ही प्रभावी ढंग से प्राप्त होते हैं, जिससे पानी की बर्बादी भी रुकती है और खाद का सही उपयोग सुनिश्चित होता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तकनीक को अपनाने से पौधों के विकास में गति आएगी और भविष्य में फलों की गुणवत्ता और संख्या में उल्लेखनीय सुधार देखा जा सकेगा।

बरसात और नमी की चुनौतियों पर शोध

हालाँकि, इस प्रयोग के दौरान वैज्ञानिकों के सामने कुछ चुनौतियां भी सामने आई हैं। शोध में यह देखा गया है कि पलामू की विशिष्ट जलवायु में बारिश का सीधा असर सेब की गुणवत्ता पर पड़ता है। प्रारंभिक परिणामों से संकेत मिले हैं कि अत्यधिक बरसात के मौसम में फलों का आकार छोटा रह जाता है। इसके अलावा, नमी की मात्रा अधिक होने के कारण कई बार फल सड़ने की समस्या भी उत्पन्न हो जाती है। इन तकनीकी बाधाओं को दूर करने के लिए कृषि वैज्ञानिक लगातार समाधान तलाश रहे हैं ताकि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी सेब की फसल को सुरक्षित रखा जा सके।

किसानों के लिए नई आर्थिक संभावना

यदि चियांकी अनुसंधान केंद्र का यह परीक्षण पूरी तरह सफल साबित होता है, तो पलामू के किसानों के जीवन में एक बड़ा बदलाव आ सकता है। अभी तक यहां के किसान मुख्य रूप से पारंपरिक फसलों पर निर्भर हैं, लेकिन सेब की व्यावसायिक खेती शुरू होने से उनकी आय में भारी वृद्धि होने की संभावना है। सेब की बागवानी से न केवल किसानों को नई तकनीकें सीखने को मिलेंगी, बल्कि यह क्षेत्र बागवानी के क्षेत्र में एक नए हब के रूप में विकसित हो सकता है। यह कदम कम लागत और आधुनिक कृषि तकनीकों के मेल से बेहतर उत्पादन प्राप्त करने का एक सफल उदाहरण बन सकता है।

बागवानी के क्षेत्र में नई दिशा

क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र, चियांकी का यह प्रयास सिर्फ सेब उगाने तक ही सीमित नहीं है। इसका व्यापक उद्देश्य राज्य में आधुनिक बागवानी तकनीकों के प्रति एक नई सोच को बढ़ावा देना है। जल संरक्षण और उर्वरक की बचत के माध्यम से बेहतर उत्पादन लेने की यह कोशिश झारखंड के कृषि परिदृश्य के लिए एक नई दिशा प्रदान कर रही है। यदि सेब के पौधों का यह प्रयोग सफल रहा, तो यह न केवल पलामू बल्कि पूरे राज्य के उन किसानों के लिए एक मॉडल बनेगा जो नई फसलों और आधुनिक तकनीकों को अपनाकर अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत करना चाहते हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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