यूएसएस अब्राहम लिंकन पर तैनात अमेरिकी सैनिकों का दर्द, डिप्रेशन में जवान कह रहे- काश कल सुबह मेरी आंख न खुले विश्व एक घंटा पहले 3
ईरान के साथ जारी तनाव के बीच अमेरिकी युद्धपोत यूएसएस अब्राहम लिंकन पर तैनात 5,000 सैनिक गंभीर मानसिक और शारीरिक संकट से जूझ रहे हैं। लंबे समय तक समुद्र में तैनाती और बुनियादी सुविधाओं के अभाव ने स्थिति को इतना खराब कर दिया है कि सैनिक खुदकुशी तक की बातें कर रहे हैं।

समंदर के बीच सैनिकों का दम घुट रहा है

ईरान के साथ चल रही भारी तनातनी के बीच अमेरिकी युद्धपोत यूएसएस अब्राहम लिंकन के लगभग 5,000 सैनिक एक भीषण मानसिक और शारीरिक संकट के दौर से गुजर रहे हैं। पिछले 250 दिनों से यह एयरक्राफ्ट कैरियर लगातार समंदर में तैर रहा है, जिससे सैनिकों के धैर्य का बांध अब पूरी तरह टूट चुका है। स्थिति इतनी भयावह है कि सैनिकों के भीतर गहरा डिप्रेशन पनप रहा है। हताशा में डूबे जवान अब अपनी जान देने या समंदर में कूदकर आत्महत्या करने जैसे कदम उठाने के लिए मजबूर हो रहे हैं। जहाज पर न सिर्फ मानसिक तनाव बढ़ा है, बल्कि बुनियादी सुविधाओं का भी घोर अभाव हो गया है। वहां सैनिकों को सड़ा हुआ खाना मिल रहा है, शौचालय पूरी तरह बंद पड़े हैं, गरम पानी की भारी किल्लत है और स्थिति इतनी बदतर है कि साबुन और टूथपेस्ट जैसी जरूरी चीजें भी खत्म हो गई हैं। इसके बावजूद अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने इन गंभीर शिकायतों को सिरे से नकारते हुए इसे 'फेक न्यूज' करार दिया है।

लगातार 9 महीनों से समंदर की लहरों के बीच

अमेरिकी नौसेना के प्रमुख समाचार पत्रों, जैसे नेवी टाइम्स और स्टार्स एंड स्ट्राइप्स में छपी रिपोर्टों के अनुसार, लिंकन युद्धपोत पर तैनात कर्मियों का संयम अब जवाब दे चुका है। पिछले 9 महीनों से यह युद्धपोत निरंतर समंदर में ही भटक रहा है। बिना किसी जमीन पर कदम रखे, इन जवानों ने समंदर में 250 दिन पूरे कर लिए हैं। आधुनिक सैन्य इतिहास में किसी भी अमेरिकी विमानवाहक पोत के लिए इतनी लंबी अवधि तक समंदर में तैनात रहना एक डरावना कीर्तिमान है। लगातार ड्यूटी और घर से लंबी दूरी के कारण इन जवानों की मानसिक स्थिति बेहद चिंताजनक स्तर पर पहुंच गई है।

परिजनों की आंखों में आंसू और सैनिकों की हताशा

सैन डिएगो में जब अमेरिकी नौसेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने परेशान परिजनों के साथ एक 'टाउन हॉल' बैठक आयोजित की, तो वहां का मंजर बेहद दर्दनाक था। करीब 200 परिजनों ने अधिकारियों के सामने अपना रोष व्यक्त करते हुए अपनों को बचाने की मार्मिक गुहार लगाई। बैठक के दौरान एक सैनिक की पत्नी ने सिसकते हुए बताया कि उसके पति ने उसे संदेश भेजा है कि वह अब और बर्दाश्त नहीं कर सकता, और उसने अपनी पत्नी से दुआ करने को कहा है कि अगले दिन सुबह उसकी आंख न खुले। एक अन्य महिला ने एक्टिंग नेवी सेक्रेटरी हंग काओ के सामने सीधे तौर पर आरोप लगाया कि नौसेना ने सैनिकों और उनके परिवारों का विश्वास पूरी तरह से चकनाचूर कर दिया है। एनाबेले लोमा नाम की एक महिला ने बताया कि लंबे समय तक तैनाती के कारण उनका पति पूरी तरह टूट चुका है। इसी अवसाद के चलते उसने समंदर में कूदकर जान देने की कोशिश भी की थी। एनाबेले के अनुसार, उनका पति इस बात से भी भयभीत है कि कहीं मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं के चलते उसके 13 साल के करियर पर पूर्णविराम न लग जाए। एक और सैनिक की पत्नी ने साझा किया कि उनके पति ने एक साथी को समंदर में छलांग लगाने से ठीक पहले पकड़कर किसी तरह बचाया था।

बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव

इस विशालकाय युद्धपोत पर केवल मानसिक स्वास्थ्य ही नहीं, बल्कि शारीरिक और बुनियादी स्तर पर भी शर्मनाक हालात पैदा हो गए हैं। कैलिफोर्निया से अमेरिकी कांग्रेस के सदस्य माइक लेविन ने इस युद्धपोत की दयनीय स्थिति का खुलासा करते हुए सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने बताया कि ईरान के खिलाफ मिशन पर तैनात इस जहाज की स्थिति किसी नर्क से कम नहीं है। लेविन के मुताबिक, जहाज के शौचालय पूरी तरह से टूट चुके हैं और इस्तेमाल के लायक नहीं बचे हैं। बाथरूम में गंदगी और काई जमी हुई है, जबकि हफ्तों से गरम पानी की आपूर्ति भी ठप है। कपड़े धोने वाली मशीनें कई महीनों से बेकार पड़ी हैं। खाने की हालत इतनी दयनीय है कि सैनिकों को भोजन के नाम पर केवल आधा कप चावल और दो रोटियां परोसी जा रही हैं। साबुन, पेस्ट और डिओड्रेंट जैसी छोटी-छोटी रोजमर्रा की चीजें भी अब वहां उपलब्ध नहीं हैं। पूर्व सैनिक और अमेरिकी सांसद जेसन क्रो ने भी चेतावनी दी है कि जहाज पर मौजूद सैनिकों और उनके परिवारों पर पड़ने वाला मानसिक दबाव हर हफ्ते और अधिक जानलेवा होता जा रहा है।

ईरान मिशन और वापसी की अनिश्चितता

यूएसएस अब्राहम लिंकन 21 नवंबर को सैन डिएगो से अपने मिशन के लिए निकला था। शुरुआत में इसे प्रशांत महासागर में तैनात करने की योजना थी, लेकिन अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव को देखते हुए इसे अचानक पश्चिम एशिया की ओर मोड़ दिया गया। इन 9 महीनों में, जहाज पर सवार 5,000 से अधिक सैनिकों को जमीन पर उतरने का मौका केवल दो बार मिला, जिसमें दिसंबर में गुआम और जुलाई में ओमान का दौरा शामिल था। इस मिशन को आधिकारिक तौर पर मई में ही समाप्त हो जाना चाहिए था, लेकिन ईरान के साथ बढ़ते संघर्ष और वाशिंगटन की नीतियों के कारण सैनिकों की वापसी को बार-बार टाला जा रहा है।

रक्षा मंत्री का रुख और बढ़ता आक्रोश

जहाज पर व्याप्त बदहाली की तस्वीरें जब सोशल मीडिया के माध्यम से सार्वजनिक हुईं, तो अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ से इस पर स्पष्टीकरण मांगा गया। हालांकि, रक्षा मंत्री ने इन गंभीर आरोपों को गंभीरता से लेने के बजाय इन्हें खारिज करते हुए 'फेक न्यूज' का नाम दे दिया। उनके इस असंवेदनशील रवैये पर सांसद माइक लेविन ने कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि इन जवानों ने देश की सेवा के लिए शपथ ली है, और बदले में देश का कर्तव्य बनता है कि उन्हें कम से कम साफ पानी, कार्यात्मक शौचालय और पौष्टिक भोजन तो प्रदान करे। उन्होंने रक्षा मंत्री पर कटाक्ष करते हुए कहा कि वे न केवल बुनियादी व्यवस्था संभालने में विफल रहे हैं, बल्कि अब वे पीड़ित सैनिकों के परिवारों की आंखों में आंखें डालकर उन्हें झूठा भी करार दे रहे हैं।

अमेरिकी नौसेना के सामने बढ़ती चुनौती

समंदर में चल रहे इस युद्ध के बीच सैनिकों में बढ़ता डिप्रेशन और आत्महत्या की घटनाएं एक गंभीर संकेत हैं। पिछले साल हुए एक वैज्ञानिक अध्ययन में यह बात सामने आई थी कि जहाजों पर लगातार शोर, नींद का अभाव, पर्याप्त धूप न मिलना और मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी सैनिकों को आत्मघाती विचारों की ओर धकेलती है। सर्वे में शामिल लगभग 50 प्रतिशत सैनिकों ने स्वीकार किया था कि गहरे तनाव के क्षणों में उन्हें कोई भी पेशेवर मदद नहीं मिल पाती। यूएसएस अब्राहम लिंकन का यह मामला अब केवल एक युद्धपोत की विफलता नहीं है, बल्कि यह इस बात का सबूत बन चुका है कि कैसे सुपरपावर बनने की होड़ और युद्ध जीतने का लालच अपने ही सैनिकों के जीवन को निगल रहा है।

करण मल्होत्रा पाबना के अंतरराष्ट्रीय संवाददाता हैं, जो अमेरिका, यूरोप और एशिया की खबरें रिपोर्ट करते हैं। वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और बड़े अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर वे नजर रखते हैं। उनकी रिपोर्ट्स दुनिया की हलचल को पाठकों तक तेजी से पहुंचाती हैं।

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