ईरान युद्ध पर ट्रंप को घर में झटका, अपनी ही पार्टी के चार सांसदों ने तोड़ी लाइन; प्रतिनिधि सभा ने सीमित किए युद्ध अधिकार विश्व 57 मिनट पहले 2
ईरान युद्ध के बीच अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की युद्ध से जुड़ी शक्तियों को सीमित करने वाला प्रस्ताव पास कर दिया, जिसमें रिपब्लिकन पार्टी के चार सांसदों ने भी डेमोक्रेट्स का साथ दिया। प्रस्ताव 215 के मुकाबले 208 मतों से पारित हुआ।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भले ही इजरायल और लेबनान के बीच सीजफायर कराने में सफल रहे हों, लेकिन ईरान युद्ध को लेकर वह अपने ही देश में चौतरफा घिरते नजर आ रहे हैं। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा यानी निम्न सदन ने एक ऐसा प्रस्ताव पारित कर दिया है, जो ईरान के संदर्भ में ट्रंप की युद्ध संबंधी ताकत पर लगाम लगाता है। इसे राष्ट्रपति के लिए एक बड़ा सियासी झटका माना जा रहा है।

सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि खुद ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के चार सांसदों ने पार्टी अनुशासन से अलग जाकर इस प्रस्ताव के समर्थन में मतदान किया। मतदान में पक्ष में 215 और विरोध में 208 वोट पड़े। थॉमस मैसी, ब्रायन फिट्जपैट्रिक, टॉम बैरेट और वॉरेन डेविडसन — इन चार रिपब्लिकन सांसदों ने डेमोक्रेट्स के साथ खड़े होकर वोट दिया।

आखिर पूरा मामला क्या है

यह प्रस्ताव विपक्षी डेमोक्रेट पार्टी के सांसद ग्रेगरी मीक्स की ओर से लाया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य ईरान के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई में राष्ट्रपति को मिली स्वतंत्र शक्तियों पर अंकुश लगाना है। बीते कई हफ्तों से डेमोक्रेट सांसद ट्रंप के युद्ध संबंधी अधिकारों पर लगातार सवाल उठा रहे थे और धीरे-धीरे कुछ रिपब्लिकन सांसद भी उनके पाले में आते गए।

हालांकि यह प्रस्ताव कानून का रूप नहीं लेगा। अमेरिकी संसदीय व्यवस्था के अनुसार यह एक 'कंकरेन्ट रिजॉल्यूशन' है, जिसके लिए राष्ट्रपति के हस्ताक्षर की आवश्यकता नहीं होती। इसके बावजूद इसे ट्रंप की नीतियों के प्रति कांग्रेस की नाराजगी के तौर पर देखा जा रहा है। इसकी ताकत को लेकर भी राय बंटी हुई है — कुछ इसे बाध्यकारी मानते हैं, तो कुछ का कहना है कि इसका महत्व ज्यादातर प्रतीकात्मक है।

ट्रंप के खिलाफ क्यों बढ़ रही बेचैनी

ईरान युद्ध अब अपने चौथे महीने में प्रवेश कर चुका है और अमेरिका के भीतर यह सवाल जोर पकड़ रहा है कि यह संघर्ष आखिर कब तक खिंचेगा। अमेरिकी संविधान और वॉर पावर एक्ट के प्रावधानों के तहत राष्ट्रपति कांग्रेस की स्वीकृति के बिना अमेरिकी सेना को 60 दिनों से अधिक समय तक किसी सक्रिय युद्ध में नहीं रख सकते।

इसी बीच पेंटागन, विदेश मंत्रालय और USAID के इंस्पेक्टर जनरल्स ने मिलकर एक संयुक्त जांच भी शुरू कर दी है। उनका कहना है कि कानूनी रूप से 60 दिन से अधिक चलने वाले विदेशी सैन्य अभियानों की समीक्षा करना अनिवार्य है। इस कदम को इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि यह संकेत देता है कि अमेरिकी निगरानी एजेंसियां यह मान रही हैं कि ईरान युद्ध 28 फरवरी से शुरू हुआ था और अब वह कानूनी सीमा को पार कर चुका है।

स्पीकर ने की ट्रंप की पैरवी

हाउस स्पीकर माइक जॉनसन ने इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए इसे बेहद खतरनाक कदम करार दिया। उनका तर्क था कि ट्रंप इस समय ईरान के साथ शांति समझौते को अंतिम रूप देने में जुटे हैं और ऐसे नाजुक मौके पर राष्ट्रपति के हाथ बांधना अमेरिका की सौदेबाजी की ताकत को कमजोर कर देगा।

जॉनसन ने कहा, 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी खत्म हो चुका है। अमेरिका अपने लक्ष्य हासिल कर चुका है। अब राष्ट्रपति शांति समझौते को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया में हैं।'

दूसरी ओर, प्रस्ताव पेश करने वाले ग्रेगरी मीक्स ने मतदान के बाद कहा कि राष्ट्रपति पर नजर रखना कांग्रेस की जिम्मेदारी है।

मीक्स ने कहा, 'हर डेमोक्रेट ने इस प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया। हम अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभाते रहेंगे। जब प्रशासन संविधान का पालन नहीं करेगा, तो कांग्रेस उसे जवाबदेह ठहराएगी।'
चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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