28 साल की उम्र में पहुंचा जेल, जमानत के लिए 43 साल का इंतजार, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की रफ्तार पर जताई चिंता उत्तर प्रदेश एक महीने पहले 22
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में मुकदमों के निपटारे की धीमी गति पर गहरी चिंता जताते हुए इस समस्या के समाधान के सुझाव मांगे हैं। एक मामले में आरोपी को अपील पर फैसले के लिए चार दशक से अधिक इंतजार करना पड़ा।

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस मामले पर गहरी नाराजगी जाहिर की, जिसमें एक व्यक्ति को नवंबर 1983 में 28 वर्ष की उम्र में एक व्यक्ति की गोली मारकर हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। इस व्यक्ति को इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपनी अपील पर फैसले के लिए चार दशक से अधिक का इंतजार करना पड़ा। इस अपील में निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा और आजीवन कारावास को चुनौती दी गई थी।

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति ए.एस. चंदुरकर की पीठ इस मामले की सुनवाई के दौरान विचलित हो उठी।

43 वर्षों तक करता रहा इंतजार

पीठ ने हैरानी जताई कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में न्याय की धीमी रफ्तार को दूर करने के लिए आखिर कौन से नए कदम उठाए जा सकते हैं। यहां याचिकाओं के लंबे समय तक लंबित रहने के कारण सुप्रीम कोर्ट में शीघ्र सुनवाई का निर्देश देने की मांग करने वाली अपीलें लगातार दायर होती रहती हैं।

यह जानने पर कि वह व्यक्ति केवल तीन महीने हिरासत में रहा और करीब 43 वर्षों से जमानत पर है, पीठ ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ उसकी अपील के लंबित रहने तक उसकी जमानत बरकरार रखी। इस मामले की सुनवाई में 41 वर्ष का समय लग गया था।

हाईकोर्ट के कामकाज में तेजी के उपायों पर चर्चा

न्यायमूर्ति मिश्रा ने वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे और अधिवक्ता जोहेब हुसैन से पूछा कि न्याय व्यवस्था की इस बाधा को दूर करने और हाईकोर्ट में सुनवाई में तेजी लाने के लिए क्या किया जा सकता है।

दवे ने सुझाव दिया कि एक उपाय यह हो सकता है कि तीन दशकों से लंबित सभी अभियोजन अपीलों को खारिज कर दिया जाए। हालांकि पीठ ने इससे असहमति जताई।

न्यायनिर्णय के बुनियादी सिद्धांत केवल लंबे समय तक लंबित रहने के आधार पर किसी मामले को खारिज करने की अनुमति नहीं देते। यह कोई नहीं जानता कि अभियोजन पक्ष को अपना पक्ष रखने का अवसर दिए बिना उसकी अपीलें खारिज कर दी जाएं तो जनहित को कितना नुकसान होगा।

क्या है पूरा मामला और कौन है विजय सिंह

इस मामले में 28 वर्षीय विजय सिंह को दिसंबर 1985 में कानपुर की एक सत्र अदालत ने हत्या का दोषी ठहराया था। अपने भाई की गोली मारकर हत्या करने के दो साल बाद उन्होंने तुरंत निचली अदालत के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की थी। हाईकोर्ट ने इस वर्ष 9 फरवरी को 20 पृष्ठों के फैसले में उनकी यह अपील खारिज कर दी।

सिंह की अपील में कहा गया था कि वह अब 72 वर्ष के हो चुके हैं। चार दशकों से अधिक समय से, यानी युवावस्था, मध्य आयु और अब वृद्धावस्था में भी, वह उसी दोषसिद्धि की छाया में जी रहे हैं। उनकी आपराधिक अपील 40 वर्षों तक हाईकोर्ट में लंबित रही, फिर आखिरकार सुनवाई हुई और लगभग सरसरी तौर पर खारिज कर दी गई।

चेतन तिवारी पाबना के उत्तर प्रदेश संवाददाता हैं और राज्य की राजनीति, प्रशासन तथा जमीनी मुद्दों को कवर करते हैं। लखनऊ में रहते हुए वे जिलों से लेकर विधानसभा तक की खबरें संतुलित रिपोर्टिंग के साथ पाठकों तक पहुंचाते हैं। आम लोगों के मुद्दों और स्थानीय घटनाओं पर उनका खास फोकस रहता है।

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