आगरा में किसान बिना केमिकल के उगा रहे जैविक देशी लौकी, नौ राज्यों तक पहुंचती है फसल उत्तर प्रदेश एक महीने पहले 15
आगरा के किसान बिना किसी केमिकल और इंजेक्शन के जैविक खाद से देशी लौकी की खेती कर रहे हैं, जिसकी सप्लाई नौ राज्यों तक होती है। कम लागत और भारी मांग के चलते यह फसल किसानों को अच्छा मुनाफा दे रही है।

आगरा सिर्फ ताजमहल के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी खेती-किसानी और फसलों के लिए भी पहचाना जाता है। यहां कई तरह की फसलें उगाई जाती हैं, जिनकी सप्लाई नौ अन्य राज्यों और जिलों तक होती है। लौकी की खेती भी यहां बड़े पैमाने पर की जाती है। खास बात यह है कि किसान बिना किसी केमिकल और इंजेक्शन के लौकी तैयार करते हैं, जो सेहत के लिहाज से फायदेमंद मानी जाती है। जैविक खाद के इस्तेमाल से फसल की बढ़वार भी बेहतर होती है और किसानों के मुताबिक कम लागत में अच्छा मुनाफा मिल जाता है।

एक से डेढ़ हाथ की दूरी पर होता है बीज रोपण

आगरा में लौकी की खेती कर रहे किसान तुलाराम कई वर्षों से इस फसल को उगा रहे हैं। उन्होंने बताया कि लौकी के लिए बीज एक से डेढ़ हाथ की दूरी पर रोपा जाता है, क्योंकि बेलें आपस में बहुत पास होने पर पैदावार उतनी अच्छी नहीं हो पाती। बीज रोपते समय ही खाद और डीएपी आदि डाली जाती है, जिससे लौकी की पैदावार बेहतर होती है।

तुलाराम के अनुसार बीज रोपने के बाद पानी देना बेहद जरूरी होता है। गर्मी के मौसम में होने वाली इस फसल के लिए पानी सबसे अहम है, वरना बेल सूख सकती है और फसल आने से पहले ही खराब हो सकती है। उन्होंने बताया कि बीज रोपण के करीब 55-60 दिनों में अच्छी और बड़ी लौकी तैयार हो जाती है, जिसे समय-समय पर तोड़कर इकट्ठा किया जाता है और मंडी में बेच दिया जाता है। एक बार बीज रोपने के बाद करीब तीन से चार महीने तक बेल पर अच्छी पैदावार मिलती रहती है, जिससे किसानों को लगातार मुनाफा होता है।

कम लागत में अच्छा मुनाफा देती है लौकी की खेती

किसान तुलाराम का कहना है कि लौकी की खेती से उन्हें काफी अच्छा मुनाफा मिलता है। इस फसल में लागत बेहद कम आती है, जबकि लाभकारी मूल्य ज्यादा मिल जाता है। उन्होंने बताया कि अगर एक बीघा में लौकी की फसल लगाई जाए तो उसमें सिर्फ दो मजदूर ही लगते हैं, जो आसानी से पूरी फसल को उगा लेते हैं।

तुलाराम ने बताया कि आगरा की लौकी आसपास के इलाकों में भी काफी मशहूर है। वह बिना केमिकल और इंजेक्शन वाली लौकी उगाते हैं, जिसके चलते बाजार में इसकी अच्छी कीमत मिलती है और मांग भी जबरदस्त रहती है। उन्होंने बताया कि पूरी फसल देशी खाद और डीएपी की मदद से तैयार की जाती है, जिससे फसल अच्छी और भारी मात्रा में बढ़वार करती है और उन्हें बेहतर मुनाफा देती है।

चेतन तिवारी पाबना के उत्तर प्रदेश संवाददाता हैं और राज्य की राजनीति, प्रशासन तथा जमीनी मुद्दों को कवर करते हैं। लखनऊ में रहते हुए वे जिलों से लेकर विधानसभा तक की खबरें संतुलित रिपोर्टिंग के साथ पाठकों तक पहुंचाते हैं। आम लोगों के मुद्दों और स्थानीय घटनाओं पर उनका खास फोकस रहता है।

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