15 अगस्त 1947: माउंटबेटन की चाल, नेहरू की एक बड़ी चूक और गांधी की खामोश दूरी राष्ट्रीय राजनीति एक घंटा पहले 3
15 अगस्त 1947 को भारत को आजादी मिली, लेकिन इस ऐतिहासिक दिन के पीछे लॉर्ड माउंटबेटन की एक खास रणनीति, जवाहरलाल नेहरू से हुई एक चूक और महात्मा गांधी की जश्न से दूरी की अनकही कहानियां छिपी हैं।

आजादी का वह ऐतिहासिक दिन

15 अगस्त 1947 का दिन भारतीय इतिहास का वह स्वर्णिम अध्याय है, जिसकी प्रतीक्षा सदियों से की जा रही थी। ब्रिटिश शासन की बेड़ियाँ टूट चुकी थीं और भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में विश्व मानचित्र पर उभर रहा था। संसद भवन से शुरू हुए आजादी के इस महाउत्सव की औपचारिक शुरुआत देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा की गई घोषणा के साथ हुई थी। लेकिन इस भव्य उत्सव के समानांतर देश के एक हिस्से में महात्मा गांधी सांप्रदायिक हिंसा से उपजे घावों को भरने में व्यस्त थे। भारत को मिली यह आजादी अचानक हुई कोई घटना नहीं थी, बल्कि यह सत्ता के हस्तांतरण की एक अत्यंत जटिल और लंबी प्रक्रिया का अंतिम परिणाम थी।

सत्ता हस्तांतरण की जटिल प्रक्रिया

20 फरवरी 1947 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की थी कि ब्रिटेन अब भारत से अपना शासन पूरी तरह समाप्त कर देगा। इसके बाद, 3 जून को वायसराय लॉर्ड लुइस माउंटबेटन ने सत्ता हस्तांतरण की विस्तृत रूपरेखा देश के सामने रखी। माउंटबेटन को विशेष रूप से भारत भेजा गया था ताकि वे इस पूरे उपमहाद्वीप के विभाजन और सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को अंजाम दे सकें। उनका कार्य केवल भारतीयों को सत्ता सौंपना नहीं था, बल्कि एक पूरे महाद्वीप को दो राष्ट्रों में विभाजित करना भी था। इसमें सेना, रेलवे, पुलिस, डाक प्रणाली, सिविल सेवा और यहां तक कि दफ्तरों के उपकरणों तक का बंटवारा शामिल था। माउंटबेटन की मेज पर रखे कैलेंडर में उन तीन महीनों का पूरा हिसाब था, जिसके तहत बंटवारे की इस कठिन प्रक्रिया को पूरा किया जाना था।

आजादी की दहलीज पर नेहरू से हुई चूक

14 और 15 अगस्त की मध्यरात्रि का क्षण भारतीय संसद के लिए अत्यंत गौरवपूर्ण था। जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्र भारत के समक्ष अपना पहला भाषण दिया, जो इतिहास में 'ट्रिस्ट विद डेस्टिनी' के नाम से अमर हो गया। उन्होंने कहा था कि बहुत पहले हमने नियति के साथ एक वादा किया था और अब वह समय आ गया है जब हम अपना वादा पूरा करेंगे। यह महज एक भाषण नहीं था, बल्कि उन लाखों लोगों के संघर्ष की परिणति थी जिन्होंने यातनाएं सहीं, गोलियां खाईं और जेल की हवा खाई थी। भाषण के कुछ समय बाद नेहरू वायसराय पैलेस पहुंचे, जिसे आज राष्ट्रपति भवन के नाम से जाना जाता है। वहां उन्होंने माउंटबेटन को स्वतंत्र भारत का पहला गवर्नर-जनरल बनने के लिए औपचारिक निमंत्रण दिया। इसी दौरान एक ऐसी घटना हुई जिसने सभी को हैरान कर दिया। नेहरू ने माउंटबेटन को एक सीलबंद लिफाफा सौंपा, जिसमें स्वतंत्र भारत के पहले मंत्रिमंडल के सदस्यों की सूची होनी थी। लेकिन उत्साह और अफरातफरी के माहौल में नेहरू से बड़ी चूक हो गई। वह लिफाफा बिना सूची के ही सील कर दिया गया था, जिससे माउंटबेटन को काफी हैरानी हुई।

माउंटबेटन के लिए 15 अगस्त की तारीख क्यों थी खास

उस समय ज्योतिषियों ने 15 अगस्त की तारीख को शुभ नहीं माना था, लेकिन माउंटबेटन के लिए यह तारीख अत्यधिक भावनात्मक और रणनीतिक महत्व रखती थी। ठीक दो साल पहले, 15 अगस्त 1945 को जापान ने आत्मसमर्पण किया था। उस समय माउंटबेटन मित्र देशों की ओर से दक्षिण पूर्व एशिया के सुप्रीम कमांडर के पद पर थे। जापान के उस आत्मसमर्पण के साथ ही द्वितीय विश्व युद्ध का एक बड़ा और निर्णायक अध्याय समाप्त हुआ था। इसे 'वी-जे डे' या 'विक्‍ट्री ऑवर जापान डे' के तौर पर मनाया जाता था। इस प्रकार, भारत की आजादी की तारीख माउंटबेटन के निजी सैन्य जीवन की सबसे महत्वपूर्ण जीत से जुड़ी हुई थी, जिसे वह कभी भूल नहीं सकते थे।

पाकिस्तान का स्वतंत्रता दिवस और पेच

भारत और पाकिस्तान के विभाजन के दौरान पाकिस्तान ने अपना स्वतंत्रता दिवस 14 अगस्त को मनाने का निर्णय लिया। इसके पीछे एक रोचक कानूनी स्थिति थी। 18 जुलाई 1947 को ब्रिटिश संसद में 'इंडियन इंडिपेंडेंस एक्‍ट' पारित किया गया था, जिसमें स्पष्ट था कि 15 अगस्त 1947 से भारत में दो स्वतंत्र डोमिनियन अस्तित्व में आएंगे। कानूनन दोनों देशों की आजादी की तारीख 15 अगस्त ही थी। हालांकि, व्यावहारिक कारणों से पाकिस्तान में 14 अगस्त को यह दिन मनाया गया। इसका मुख्य कारण यह था कि माउंटबेटन को कराची में सत्ता हस्तांतरण कार्यक्रम में भाग लेने के बाद उसी दिन दिल्ली वापस आना था, इसलिए पाकिस्तान में यह समारोह एक दिन पहले निपटाया गया।

गांधी की जश्न से दूरी और नोआखाली का दर्द

15 अगस्त को जब पूरा देश आजादी का जश्न मना रहा था, तब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी दिल्ली से काफी दूर बंगाल के नोआखाली इलाके में मौजूद थे। वे वहां फैली सांप्रदायिक हिंसा के कारण अत्यंत दुखी थे। गांधी नंगे पैर गांवों में घूम रहे थे ताकि लोगों के बीच फिर से आपसी विश्वास कायम कर सकें। उन्होंने दंगों से डरे हुए हिंदुओं और मुसलमानों से अपनी झोपड़ियों से बाहर आने और शांति के लिए साथ आने की अपील की, लेकिन शुरुआत में उन्हें असफलता ही मिली। जब कोई नहीं आया, तो उन्होंने बच्चों को गेंद से खेलते हुए देखा। उन बच्चों से बात करते हुए उन्होंने महसूस किया कि आने वाली पीढ़ी के मन में अभी भी उम्मीद बाकी है। उन्होंने वहीं बच्चों के साथ खेलना शुरू कर दिया और बाद में ग्रामीणों से कहा कि यदि उनमें शांति बनाए रखने का साहस नहीं है, तो उन्हें अपने बच्चों से सीखना चाहिए।

किंग्सवे अस्पताल में गांधी का तीखा सवाल

दिल्ली लौटने के बाद गांधी को ज्ञात हुआ कि उनकी शिष्या सुभद्रा जोशी किंग्सवे अस्पताल में भर्ती हैं। अस्पताल में उन्होंने सुभद्रा जोशी से दिल्ली दंगों में हुई मौतों का ब्यौरा मांगा। जब सुभद्रा जोशी ने अनुमानित मौतों की संख्या एक हजार से अधिक बताई, तो गांधी ने पूछा कि क्या उनमें कांग्रेस के शांति कार्यकर्ता भी थे। जब उन्हें पता चला कि वहां कोई शांति कार्यकर्ता मौजूद नहीं था, तो वे गहरे अवसाद में चले गए। उन्होंने सवाल उठाया कि जब इतनी हत्याएं हो रही थीं, तो शांति के पैरोकार क्या कर रहे थे। सुभद्रा जोशी ने सफाई दी कि पुलिस ने उनकी बात नहीं सुनी। इस पर गांधी का जवाब अत्यंत कठोर था। उन्होंने कहा कि जो लोग अंग्रेजों की गोलियों का सामना कर सकते थे, वे अपनी पुलिस को नहीं संभाल सके, यह अत्यंत चिंताजनक है।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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