उपनाम: जलवायु परिवर्तन
मुजफ्फरपुर की शाही लीची का दाम काजू से भी ऊंचा, 1200 रुपये सैकड़ा तक पहुंची कीमत, विदेशों तक डिमांड बरकरार
खराब मौसम और जलवायु परिवर्तन के चलते इस बार मुजफ्फरपुर की शाही लीची के उत्पादन में 75% तक गिरावट आई है, जिससे इसकी कीमत 1200 रुपये प्रति सैकड़ा तक चली गई है। इसके बावजूद देश-विदेश में इसकी मांग में कोई कमी नहीं है।
'गॉडजिला' अल नीनो क्या है जिसने वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ाई? प्रशांत महासागर में बदलते मौसम का दुनिया पर क्या होगा असर
एल नीनो प्रशांत महासागर से जुड़ी एक मौसमी घटना है, जो दुनियाभर के तापमान और मौसम के पैटर्न को प्रभावित करती है। कुछ जानकार 2026 में बेहद ताकतवर 'गॉडजिला' सुपर एल नीनो की आशंका जता रहे हैं, हालांकि कई वैज्ञानिक अभी पुख्ता भविष्यवाणी से बच रहे हैं।
हर साल समंदर में समा रहा 5 करोड़ टन प्लास्टिक, दोगुनी हुई समुद्री जलस्तर बढ़ने की रफ्तार, UN की भयावह चेतावनी
संयुक्त राष्ट्र की नई वर्ल्ड ओशियन असेसमेंट रिपोर्ट के मुताबिक बीते 10 सालों में समुद्र का जलस्तर बढ़ने की रफ्तार दोगुनी हो चुकी है, पानी तेजी से गर्म हो रहा है और प्लास्टिक प्रदूषण से समुद्री जीवन खतरे में है। UN प्रमुख एंटोनियो गुटेरेस ने इसे जलवायु संक...
अंबाला में डेंगू का नया संकट: कम जोखिम वाले इलाकों में भी क्यों बढ़ रहे मामले?
अब डेंगू सिर्फ मानसून तक सीमित नहीं रहा। बदलते मौसम और बढ़ते तापमान के चलते गर्मियों में भी इसके मामले सामने आ रहे हैं, और जिन क्षेत्रों को पहले सुरक्षित माना जाता था वहां भी खतरा दिखने लगा है।
धरती का भूजल भंडार खाली, अपनी धुरी से 31.5 इंच खिसका हमारा ग्रह; मंडरा रहा महाप्रलय का खतरा!
ज़मीन के नीचे से बेतहाशा पानी निकाले जाने के कारण पृथ्वी का संतुलन बिगड़ गया है और वह अपनी घूर्णन धुरी से रिकॉर्ड 31.5 इंच तक खिसक चुकी है, जिससे दुनिया भर में भीषण आपदाओं की आशंका गहरा गई है।
एक दिन में तीन मौसम! इस राज्य में जून में महसूस हो रही ठंड, लोग बोले- मौसम बना पहेली
जहां उत्तर भारत के कई हिस्से भीषण गर्मी से जूझ रहे हैं, वहीं उत्तराखंड में जून के महीने में ठंड का एहसास हो रहा है और देहरादून के लोग 24 घंटे में तीन-तीन मौसमों का अनुभव कर रहे हैं।
World Environment Day 2026: बदलते पर्यावरण का जीवन पर गहरा असर, इन 7 रूपों में महसूस हो रहा बदलाव
हर साल 5 जून को मनाया जाने वाला विश्व पर्यावरण दिवस लोगों को प्रकृति के संरक्षण के लिए जागरूक करता है। बिगड़ते पर्यावरण का असर अब जल, जंगल, जीव-जंतु और इंसानी जीवन पर साफ दिखाई देने लगा है।
पलामू में हर साल बढ़ती तपिश: प्रकृति के साथ इंसानी लापरवाही भी जिम्मेदार, कहीं रेगिस्तान न बन जाए यह इलाका
कभी जंगलों और जल स्रोतों के लिए जाना जाने वाला पलामू आज तेजी से बढ़ते तापमान से जूझ रहा है। विशेषज्ञ जंगलों की कटाई और घटते जल स्रोतों को मुख्य कारण मानते हुए इसे मरुस्थलीकरण की प्रारंभिक चेतावनी बता रहे हैं।
बांज का पेड़: पहाड़ों का 'जल प्रहरी', जहां ये मौजूद वहां नहीं रहती पानी की किल्लत
उत्तराखंड के पहाड़ों में बांज का पेड़ जल संरक्षण और पर्यावरण की रक्षा का सबसे बड़ा माध्यम माना जाता है। इसकी गहरी जड़ें भूजल को बनाए रखती हैं, जिससे नौले, धारे और गधेरे आज भी जीवित हैं।