मध्य प्रदेश
एक घंटा पहले
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लगातार हो रहे जलवायु परिवर्तन के कारण किसानों का मानसून पर पहले जैसा भरोसा अब धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है। उन्हें कभी अत्यधिक बारिश तो कभी सूखे की चिंता सताती रहती है। भारी बारिश होने पर खेतों में जल भराव की स्थिति बन जाती है, जिससे फसलें सड़ने लगती हैं, वहीं लंबे ड्राई स्पेल के दौरान खेतों से नमी गायब हो जाती है और पौधे सूखने लगते हैं।
चाहे अधिक बारिश हो या सूखा पड़े, दोनों ही स्थितियों में किसान को अपनी फसल बर्बाद होने का नुकसान उठाना पड़ता है। इसके बावजूद अधिकांश किसान आज भी सपाट पारंपरिक तरीके से ही खेती कर रहे हैं। बदलते मौसम के मिजाज को देखते हुए अब किसानों को अपनी खेती की पद्धति में बदलाव लाना जरूरी हो गया है। कृषि वैज्ञानिक भी अतिवृष्टि और सूखे की चपेट में आने से बचाने के लिए बुवाई की नई-नई विधियां बता रहे हैं, जिन्हें अपनाकर किसान प्रकृति की इस दोहरी मार से बच सकते हैं।
ऊंची क्यारी-नाली विधि (रेज्ड बेड मेथड)
सागर कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉक्टर के एस यादव बताते हैं कि ऊंची क्यारी-नाली विधि यानी रेज्ड बेड मेथड में लगभग एक मीटर चौड़ा बेड तैयार किया जाता है। इसके लिए ऐसी मशीन का उपयोग होता है जिसमें दो या तीन लाइनों में बुवाई की जाती है। इस बेड के बगल में एक नाली बनी होती है, जिससे अधिक बारिश होने पर अतिरिक्त पानी बाहर निकल जाता है और कम पानी की स्थिति में मिट्टी में नमी बनी रहती है।
चौड़ी क्यारी-नाली पद्धति (वाइड बेड-फरो सिस्टम)
चौड़ी क्यारी-नाली पद्धति यानी वाइड बेड-फरो सिस्टम में खेत के भीतर 90 सेमी चौड़े और चपटे बेड बनाए जाते हैं। इस चौड़े बेड के ऊपर फसल की कतारों के बीच 30 सेमी की दूरी रखी जाती है। वहीं, दो अलग-अलग चौड़े बेड के बीच में 45 सेमी चौड़ी और 15 सेमी गहरी पक्की जल निकासी वाली नाली स्वतः बन जाती है।
इस तकनीक के फायदे
इस पद्धति से बुवाई करने पर बेड पर तैयार होने वाले पौधों तक सूर्य की किरणें सीधे पहुंचती हैं। धूप और हवा का प्रवाह अच्छी तरह होने के कारण पौधे रोगों और प्रतिकूल परिस्थितियों का बेहतर ढंग से सामना करते हैं।
खरीफ मौसम की अत्यधिक वर्षा का पानी गहरी नालियों के रास्ते बिना रुके और बिना ठहराव के खेत से बाहर निकल जाता है, जिससे जड़ों को वायुमंडल की नाइट्रोजन और ऑक्सीजन आसानी से मिलती रहती है। इस तरह की तकनीक अपनाने से न केवल प्राकृतिक आपदा से बचाव होता है, बल्कि उत्पादकता में भी लगभग 20% की वृद्धि देखने को मिल सकती है।
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