राष्ट्रीय राजनीति
एक घंटा पहले
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विचारों
चुनावी रण में मनीष तिवारी की गैरमौजूदगी
किसी भी राजनीतिक दल के लिए चुनाव का समय अपने सबसे भरोसेमंद और अनुभवी नेताओं को मैदान में उतारने का अवसर होता है। हालांकि, पंजाब विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस पार्टी की ओर से जो सूचियां जारी की गई हैं, उन्होंने सबको चौंका दिया है। कांग्रेस ने चंडीगढ़ से सांसद मनीष तिवारी को राज्य की सभी महत्वपूर्ण चुनावी समितियों से दूर रखा है। उन्हें चुनाव प्रचार समिति, घोषणापत्र तैयार करने वाली समिति और चुनाव प्रबंधन समिति, इन तीनों ही अहम निकायों में कोई जगह नहीं दी गई है।
इस घटनाक्रम के तुरंत बाद मनीष तिवारी ने सोशल मीडिया पर एक क्रिप्टिक पोस्ट साझा किया। उन्होंने अपनी पोस्ट में लिखा कि काश व्यक्तियों और संस्थाओं की असुरक्षा (इनसिक्योरिटी) का भी कोई इलाज होता। राजनीतिक गलियारों में इस संदेश को कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व पर एक सीधे तंज के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, यह पहला मौका नहीं है जब मनीष तिवारी और कांग्रेस आलाकमान के बीच दूरियों की खबरें सामने आई हैं। पिछले कुछ सालों में ऐसे कई वाकये हुए हैं जिन्होंने दोनों के रिश्तों में कड़वाहट पैदा की है।
जी-23 और सुधारों की मांग
मनीष तिवारी के लिए मुश्किलों का दौर तब शुरू हुआ जब उन्होंने कांग्रेस के अंदर सुधार की मांग करने वाले समूह यानी G-23 में सक्रिय भूमिका निभाई। मनीष तिवारी उन वरिष्ठ नेताओं में शामिल थे जिन्होंने सोनिया गांधी को पत्र लिखकर पार्टी को मजबूत करने के लिए व्यापक बदलावों का सुझाव दिया था। माना जाता है कि कांग्रेस हाईकमान ने इसे रचनात्मक सुझाव के रूप में लेने के बजाय नेतृत्व को दी गई चुनौती के तौर पर लिया। इस घटना के बाद से ही पार्टी के शीर्ष स्तर और तिवारी के बीच एक गहरी खाई बन गई जो समय के साथ और चौड़ी होती गई।
ऑपरेशन सिंदूर और वैचारिक मतभेद
हाल के महीनों में यह दूरी और अधिक स्पष्ट हो गई है। जब केंद्र सरकार ने ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत का पक्ष अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रखने के लिए एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल विदेश भेजा, तो उसमें मनीष तिवारी और शशि थरूर दोनों शामिल थे। कांग्रेस का नेतृत्व इस फैसले से बेहद असहज था। पार्टी के रणनीतिकारों का मानना था कि विपक्ष को भाजपा के राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा नहीं बनना चाहिए। लेकिन तिवारी और थरूर ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय हित किसी भी दलीय राजनीति से ऊपर है।
वापसी के बाद जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मनीष तिवारी की मुलाकात की तस्वीरें सार्वजनिक हुईं, तो राजनीतिक चर्चाओं का बाजार और गर्म हो गया। इसके कुछ समय बाद ही जब लोकसभा में ऑपरेशन सिंदूर पर बहस हुई, तो मनीष तिवारी को अपनी बात रखने का मौका नहीं दिया गया। समर्थकों ने इसे एक सोची-समझी साजिश करार दिया, जबकि पार्टी के भीतर यह तर्क दिया गया कि दोनों नेताओं ने सरकार की आलोचना करने के बजाय उसके रुख का समर्थन किया था।
लगातार बढ़ती उपेक्षा और साइडलाइन होने के संकेत
पार्टी के भीतर उपेक्षा का यह संकेत पहली बार नहीं मिला है। कांग्रेस की पूर्व नेता राधिका खेड़ा ने भी यह दावा किया था कि रायपुर में आयोजित पार्टी के एक बड़े कार्यक्रम के दौरान उन्हें निर्देश मिला था कि मनीष तिवारी को अन्य वरिष्ठ नेताओं के साथ एक ही होटल में न ठहराया जाए। इसके अतिरिक्त, वर्ष 2023 के बाद से उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी यानी AICC मुख्यालय में किसी भी प्रमुख प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करने की जिम्मेदारी नहीं सौंपी गई है। कभी यूपीए सरकार में सूचना एवं प्रसारण मंत्री रहे तिवारी की भूमिका अब पार्टी के भीतर पहले जैसी प्रभावी नहीं दिखती।
पंजाब की सियासत में अनदेखी
मनीष तिवारी का पंजाब की राजनीति से दशकों पुराना नाता रहा है। वे लुधियाना और आनंदपुर साहिब से सांसद रह चुके हैं। जब पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह को मुख्यमंत्री पद से हटाने का निर्णय लिया गया था, तब भी मनीष तिवारी ने इसका खुलकर विरोध किया था और इसे कांग्रेस की एक बड़ी रणनीतिक भूल बताया था।
अब जब भूपेश बघेल की देखरेख में पंजाब कांग्रेस का नया चुनावी ढांचा तैयार किया गया है, तो तिवारी को किसी भी प्रमुख समिति में जगह नहीं मिली है। पार्टी के कुछ नेता बचाव में तर्क देते हैं कि वे चंडीगढ़ से सांसद हैं, इसलिए पंजाब की चुनावी समितियों में उनका नाम नहीं है। दूसरी तरफ, उनके समर्थकों का साफ कहना है कि पंजाब में उनके व्यापक अनुभव और एक हिंदू चेहरे के तौर पर उनकी साख को जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है। यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस का यह फैसला राज्य के चुनावी नतीजों पर क्या असर डालता है।
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