राष्ट्रीय राजनीति
2 घंटे पहले
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विचारों
लाल किले से 'दिमागी नक्सल' पर प्रहार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से दिए गए अपने स्वतंत्रता दिवस संबोधन के दौरान 'दिमागी नक्सल' का जिक्र किया। इस टिप्पणी के बाद से ही राजनीतिक गलियारों और सोशल मीडिया पर इस शब्द के अर्थ को लेकर गहन चर्चा शुरू हो गई है। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि देश ने हथियारबंद नक्सलियों को तो काफी हद तक नियंत्रित कर लिया है, लेकिन वैचारिक स्तर पर चुनौती अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
विचारधारा का खतरा
प्रधानमंत्री के अनुसार, केवल भौतिक हथियारों से लड़ने वाले नक्सली ही एकमात्र समस्या नहीं हैं। असली चुनौती उन लोगों से है जो परोक्ष रूप से नक्सली या माओवादी विचारधारा का समर्थन करते हैं और समाज में भ्रम फैलाने का काम करते हैं। प्रधानमंत्री ने देशवासियों का आह्वान किया कि ऐसे वैचारिक समर्थकों को न केवल पहचाना जाए, बल्कि उन्हें अलग-थलग भी किया जाना चाहिए ताकि समाज सुरक्षित रह सके।
अर्बन नक्सल से जुड़ा विमर्श
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि 'दिमागी नक्सल' शब्द का इस्तेमाल 'अर्बन नक्सल' जैसी शब्दावली के विस्तार के रूप में देखा जा सकता है। पिछले कुछ वर्षों से भारत में यह विमर्श काफी चर्चा में रहा है कि किस प्रकार कुछ बुद्धिजीवी और विचारक नक्सलवाद के हिंसक कृत्यों को वैचारिक आधार प्रदान करते हैं। सरकार का यह रुख संकेत देता है कि आने वाले समय में देश के भीतर की वैचारिक लड़ाई को और अधिक गंभीरता से लिया जाएगा।
सरकार का रुख
प्रधानमंत्री की इस टिप्पणी के बाद यह स्पष्ट है कि केंद्र सरकार वैचारिक नक्सलवाद के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने के मूड में है। यह बयान ऐसे समय पर आया है जब देश के अलग-अलग हिस्सों में सुरक्षा एजेंसियों ने नक्सल गतिविधियों पर लगाम कसी है। अब प्रशासन उन लोगों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है जो हिंसा तो नहीं करते, लेकिन अपनी बातों और लेखन के माध्यम से विध्वंसक विचारधारा को बढ़ावा देते हैं।
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