ज्यादा से ज्यादा क्या बिगाड़ लेंगे डोनाल्ड ट्रंप? ईरान के साथ व्यापार पर प्रतिबंधों की हकीकत और अमेरिकी दबाव की असली सीमाएं अमेरिका 2 घंटे पहले 2
ईरान के खिलाफ आर्थिक युद्ध की घोषणा करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया भर के देशों को सख्त चेतावनी दी है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय नियमों और वैश्विक व्यापारिक समीकरणों के बीच अमेरिका के इस कदम की अपनी सीमाएं हैं।

ईरान के खिलाफ सैन्य और मिसाइल कार्रवाइयों के बाद भी जब मनमुताबिक नतीजे नहीं मिले, तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अब एक नया रास्ता चुना है। ट्रंप ने अब ईरान को आर्थिक मोर्चे पर पूरी तरह से घेरने और दंडित करने का मन बना लिया है। इसके लिए उन्होंने बाकायदा 'इकोनॉमिक डी-डे' का ऐलान किया है, जिसे अब तक का सबसे बड़ा आर्थिक दबाव बताया जा रहा है। अमेरिका की तरफ से स्पष्ट तौर पर चेतावनी दी गई है कि जो भी देश या संस्था ईरान के साथ किसी भी तरह का व्यापार करेगी या वित्तीय लेन-देन रखेगी, उसे बेहद गंभीर आर्थिक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा।

डोनाल्ड ट्रंप का यह फैसला असल में उन तमाम देशों के लिए एक खुली चेतावनी है जो ईरान के साथ अपने व्यापारिक रिश्तों को बनाए हुए हैं। इस नई और सख्त घोषणा के बाद से ही वैश्विक बाजारों में खलबली मच गई है। ऐसे में यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि आखिर ट्रंप की इन धमकियों में कितना दम है? क्या अमेरिका के पास वाकई इतनी शक्ति है कि वह दुनिया के किसी भी संप्रभु देश को ईरान के साथ व्यापार करने से पूरी तरह रोक दे? आइए समझते हैं कि अमेरिकी प्रतिबंधों की असली सीमाएं क्या हैं और यह दबाव तंत्र कैसे काम करता है।

ट्रंप की सोशल मीडिया चेतावनी और 'लाइफलाइन' का अर्थ

डोनाल्ड ट्रंप ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर बेहद सख्त और आक्रामक लहजे में अपनी रणनीति को साझा किया है। ट्रंप ने साफ शब्दों में कहा है कि जो भी देश या संस्था ईरान को किसी भी तरह की 'लाइफलाइन' यानी जीवनदान देने की कोशिश करेगी, उसे इसके भयानक आर्थिक परिणाम भुगतने होंगे। अमेरिकी प्रशासन के नजरिए से इस लाइफलाइन का दायरा काफी व्यापक है।

ट्रंप द्वारा दी गई इस चेतावनी के अनुसार, लाइफलाइन देने के दायरे में निम्नलिखित बातें शामिल हैं:

  • ईरान के वित्तीय और बैंकिंग संस्थानों को किसी भी तरह की मदद पहुंचाना।
  • ईरानी व्यवसायों, एयरपोर्ट या वहां की किसी भी सरकारी संस्था के साथ व्यापारिक सहयोग करना।
  • ईरान द्वारा की जाने वाली अवैध तेल की तस्करी में भागीदार बनना।
  • कैश ट्रांसफर यानी नकद पैसों के अवैध लेन-देन में शामिल होना।
  • प्रतिबंधों से बचने के लिए बनाई गई फ्रंट कंपनियों का इस्तेमाल करना।

ट्रंप ने साफ कर दिया है कि ईरान को परोक्ष या अपरोक्ष रूप से मिलने वाली ऐसी तमाम मदद अब तत्काल प्रभाव से बंद होनी चाहिए, अन्यथा अमेरिका उनके खिलाफ बेहद कड़े कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा।

क्या अमेरिका अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर कानूनी रूप से रोक लगा सकता है?

इस पूरे मामले का सबसे बड़ा तकनीकी और कानूनी पहलू यह है कि क्या अमेरिका के पास ऐसा करने का कोई कानूनी अधिकार है? अंतरराष्ट्रीय कानून और वैश्विक व्यापार नीति के विशेषज्ञों की मानें तो इसका सीधा जवाब 'नहीं' है। अमेरिका के पास ऐसी कोई प्रत्यक्ष कानूनी शक्ति नहीं है जिसके बल पर वह किसी अन्य स्वतंत्र और संप्रभु देश को अपनी मर्जी से किसी तीसरे देश के साथ व्यापार करने से जबरन रोक सके।

अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार, किसी देश पर वैश्विक व्यापारिक प्रतिबंध लगाने का वैधानिक अधिकार केवल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पास ही होता है। जब तक संयुक्त राष्ट्र की तरफ से आधिकारिक रूप से किसी प्रतिबंध को मंजूरी नहीं दी जाती, तब तक कोई भी देश अपनी मर्जी से दूसरे देशों के व्यापार पर कानूनी रोक नहीं लगा सकता। इसका मतलब यह हुआ कि डोनाल्ड ट्रंप न तो चीन को, न भारत को और न ही इराक जैसे देशों को सीधे तौर पर यह कानूनी आदेश जारी कर सकते हैं कि वे ईरान के साथ अपने आर्थिक और व्यापारिक संबंध तुरंत खत्म कर दें।

'सेकेंडरी सैंक्शन': अमेरिका का असली और घातक हथियार

भले ही अमेरिका के पास सीधे तौर पर किसी संप्रभु देश का व्यापार रोकने की कानूनी ताकत न हो, लेकिन उसके तरकश में एक ऐसा तीर है जो दुनिया की बड़ी से बड़ी कंपनियों को घुटने टेकने पर मजबूर कर देता है। इस हथियार का नाम है 'सेकेंडरी सैंक्शन' यानी द्वितीयक प्रतिबंध। यह अमेरिका का सबसे प्रभावी और खतरनाक आर्थिक हथियार माना जाता है।

इस व्यवस्था के तहत अमेरिका उन विदेशी बैंकों, वित्तीय संस्थानों या कंपनियों को निशाना बनाता है जो ईरान के साथ किसी भी तरह का लेन-देन करती हैं। खास बात यह है कि इन प्रतिबंधों को लागू करने के लिए यह जरूरी नहीं है कि उस लेन-देन में कोई अमेरिकी कंपनी या अमेरिकी नागरिक शामिल हो। जब अमेरिका किसी विदेशी कंपनी पर सेकेंडरी सैंक्शन लगाता है, तो उस कंपनी के सामने केवल दो ही रास्ते बचते हैं:

पहला रास्ता यह होता है कि वह कंपनी ईरान के साथ अपने तमाम व्यापारिक संबंधों को हमेशा के लिए तोड़ ले। दूसरा रास्ता यह होता है कि वह ईरान के साथ व्यापार जारी रखे, लेकिन इसके बदले में उसे अमेरिकी वित्तीय प्रणाली और डॉलर आधारित वैश्विक भुगतान व्यवस्था से पूरी तरह बाहर कर दिया जाएगा। चूंकि आज के समय में दुनिया भर की अधिकांश बड़ी कंपनियां और बैंक सीधे या परोक्ष रूप से डॉलर पर निर्भर हैं, इसलिए वे अमेरिका के इस आर्थिक कोपभाजन से बचने के लिए ईरान से खुद ही दूरी बना लेने में अपनी भलाई समझती हैं।

टैरिफ की नई धमकी और इसका आर्थिक प्रभाव

अपनी इस आर्थिक घेराबंदी को और अधिक मजबूत बनाने के लिए डोनाल्ड ट्रंप ने एक और बड़ा कार्ड खेला है। उन्होंने ईरान के साथ व्यापारिक संबंध बनाए रखने वाले देशों के सामानों पर 25 प्रतिशत टैरिफ यानी आयात शुल्क लगाने की धमकी भी दी है। ट्रंप ने इस साल जनवरी के महीने में ही इस संभावित कदम का जिक्र किया था।

हालांकि, जानकारों का कहना है कि अभी तक इस तरह के भारी-भरकम टैरिफ को लागू करने के लिए कोई भी ठोस कानूनी या प्रशासनिक ढांचा पेश नहीं किया गया है। लेकिन यदि ट्रंप अपने इस फैसले को अमलीजामा पहनाने में कामयाब हो जाते हैं, तो यह सीधे तौर पर उन देशों की अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक बड़ा झटका होगा जो ईरान के साथ अपने आर्थिक रिश्तों को बनाए रखना चाहते हैं। इससे उन देशों के अमेरिका निर्यात होने वाले उत्पादों पर भारी टैक्स लगेगा, जिससे उनका व्यापार घाटा बढ़ सकता है।

चीन की बड़ी चुनौती: अमेरिकी प्रतिबंधों की काट

इस पूरे परिदृश्य में अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चुनौती चीन बनकर उभरा है। चीन वर्तमान में ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार और उसके कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार है। विभिन्न रिपोर्टों और आंकड़ों के मुताबिक, ईरान के कुल तेल निर्यात का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अकेले चीन ही खरीदता है।

अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने के लिए चीन ने एक बेहद चालाक और मजबूत वैकल्पिक व्यवस्था तैयार कर ली है। चीन ने अपना एक ऐसा स्वतंत्र रिफाइनरी सिस्टम विकसित किया है, जिसका अमेरिकी वित्तीय प्रणाली या डॉलर से कोई सीधा लेना-देना नहीं है। इसके अलावा, ईरान का कच्चा तेल अक्सर सीधे चीन न जाकर मलेशिया या इंडोनेशिया के रास्ते से होते हुए चीनी बंदरगाहों पर पहुंचता है, जिससे इसकी पहचान छुपाना आसान हो जाता है। चीन ने इस मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए हमेशा कहा है कि किसी भी समस्या का समाधान प्रतिबंधों और दबाव के जरिए नहीं निकाला जा सकता।

भारत पर ट्रंप की इस चेतावनी का क्या होगा असर?

भारतीय दृष्टिकोण से देखें तो राहत की बात यह है कि ट्रंप की इस ताजा चेतावनी का भारत पर बहुत ही सीमित या नगण्य असर पड़ने की उम्मीद है। इसके पीछे मुख्य कारण दोनों देशों के बीच व्यापार में आई भारी गिरावट है। साल 2018-19 के दौरान भारत और ईरान के बीच द्विपक्षीय व्यापार का आंकड़ा लगभग 17 अरब डॉलर तक पहुंच गया था। लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के दबाव के चलते यह व्यापार अब घटकर महज 1.6 अरब डॉलर के आसपास ही रह गया है।

इसके अलावा, भारत ने अमेरिकी प्रतिबंधों के पिछले दौर के बाद साल 2019 से ही ईरान से कच्चे तेल का आयात पूरी तरह से बंद कर दिया है। भारत अब अपनी तेल जरूरतों के लिए अन्य देशों पर निर्भर है। यही वजह है कि ट्रंप की इस नई धमकी के कारण भारतीय उपभोक्ताओं के लिए ईंधन यानी पेट्रोल-डीजल या अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर तत्काल कोई बड़ा या प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं दिखाई देती है।

संयुक्त अरब अमीरात (UAE) का फैसला: ईरान के लिए तगड़ा झटका

इस पूरे घटनाक्रम के बीच ईरान को सबसे बड़ा झटका अपने पड़ोसी देश संयुक्त अरब अमीरात यानी UAE से लगा है। हाल ही में संयुक्त अरब अमीरात ने एक बड़ा कदम उठाते हुए ईरान के साथ अपने सभी तरह के वित्तीय और आर्थिक लेन-देन को अगले आदेश तक के लिए पूरी तरह निलंबित कर दिया है।

अब तक यूएई को ईरान के लिए एक बड़े व्यावसायिक और वित्तीय गेटवे के रूप में देखा जाता था, जहां से ईरान वैश्विक व्यापारिक गतिविधियों को अंजाम देता था। ऐसे में यूएई जैसे करीबी व्यापारिक केंद्र का हाथ पीछे खींच लेना ईरान की अर्थव्यवस्था के लिए एक बहुत बड़ा और गंभीर झटका साबित होने वाला है।

क्या अमेरिकी दबाव का यह चक्रव्यूह सफल हो पाएगा?

हालांकि डोनाल्ड ट्रंप के पास कानूनी तौर पर अन्य संप्रभु देशों को ईरान से व्यापार करने से रोकने की शक्ति नहीं है, लेकिन वे अपनी आर्थिक नीतियों और दंड के डर के जरिए व्यापार को इतना अधिक महंगा और जोखिम भरा जरूर बना सकते हैं कि बड़ी-बड़ी कंपनियां खुद-ब-खुद ईरान से किनारा करने पर मजबूर हो जाएं।

अब असली परीक्षा चीन, इराक और तुर्की जैसे देशों की है, जो अपनी ऊर्जा और व्यापारिक जरूरतों के लिए ईरान पर काफी हद तक निर्भर हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि ये देश अमेरिकी प्रतिबंधों की भारी कीमत चुकाकर भी ईरान के साथ अपने रिश्तों को कब तक और किस हद तक निभा पाते हैं। ट्रंप की इस रणनीति की सफलता पूरी तरह से इस बात पर टिकी है कि ईरान के सहयोगी देश अमेरिका के इस आर्थिक दबाव का मुकाबला करने के लिए कितने तैयार हैं।

फरवरी से शुरू हुआ अमेरिकी मिशन अब तक रहा है अधूरा

इस पूरे टकराव की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो अमेरिका और इजरायल ने मिलकर इस साल फरवरी महीने के आखिरी दिनों में ईरान पर सैन्य हमले शुरू किए थे। उस समय अमेरिकी खेमे की तरफ से यह दावा किया गया था कि महज चार से पांच हफ्तों के भीतर इस पूरी जंग को समाप्त कर दिया जाएगा। हमले की शुरुआत में ही ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई को मार गिराने का दावा करते हुए अमेरिकी और इजरायली खेमे ने अपनी जीत का जश्न मनाना भी शुरू कर दिया था।

लेकिन अमेरिका की यह खुशी ज्यादा दिनों तक नहीं टिक सकी। अयातुल्लाह अली खामेनेई के बाद उनके उत्तराधिकारी के रूप में मुज्तबा खामेनेई मजबूती से खड़े हो गए। इसके साथ ही ईरानी सेना में भी नए और आक्रामक कमांडरों की नियुक्तियां की गईं, जिन्होंने प्रतिरोध को और तेज कर दिया। ट्रंप प्रशासन की तरफ से की गई स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की नाकेबंदी और पहले से लागू आर्थिक प्रतिबंध भी ईरान को पूरी तरह झुकाने में नाकाम साबित हुए। अब देखना यह है कि सैन्य मोर्चे पर मनमुताबिक सफलता न मिलने के बाद ट्रंप का यह नया और कड़ा आर्थिक प्रतिबंधों का दांव क्या रंग लाता है।

करण मल्होत्रा पाबना के अंतरराष्ट्रीय संवाददाता हैं, जो अमेरिका, यूरोप और एशिया की खबरें रिपोर्ट करते हैं। वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और बड़े अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर वे नजर रखते हैं। उनकी रिपोर्ट्स दुनिया की हलचल को पाठकों तक तेजी से पहुंचाती हैं।

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