खंडवा की पुरानी मंडी: बैलगाड़ियों का दौर, लुटेरों का खौफ और व्यापार का इतिहास मध्य प्रदेश एक दिन पहले 18
मध्य प्रदेश के खंडवा में स्थित पुरानी कृषि उपज मंडी न केवल व्यापार का एक केंद्र रही है, बल्कि यह किसानों के संघर्षों और उनके ऐतिहासिक बदलावों की गवाह भी है। ब्रिटिश कालीन इस मंडी ने उस समय को करीब से देखा है जब किसान अपनी उपज बेचने के लिए लंबी और खतरनाक यात्राएं करने को मजबूर थे।

खंडवा की ऐतिहासिक मंडी का सफर

मध्य प्रदेश का खंडवा शहर अपनी विशिष्ट कृषि परंपराओं के लिए जाना जाता है। शहर के हृदय स्थल, यानी देवनारायण चौक जिसे स्थानीय भाषा में जलेबी चौक भी कहा जाता है, के निकट स्थित पुरानी कृषि उपज मंडी का अपना एक गौरवशाली इतिहास है। आज भले ही इस परिसर में अनाज की नीलामी और खरीदी का शोर सुनाई न देता हो, लेकिन यह जगह खंडवा के उस दौर की जीवंत याद दिलाती है जब कृषि और व्यापार की तस्वीर बिल्कुल अलग हुआ करती थी। यह पुरानी मंडी न केवल एक व्यापारिक स्थल थी, बल्कि यह शहर और किसानों के बीच के पुराने संबंधों की एक मूक गवाह भी मानी जाती है।

ब्रिटिश काल और किसानों का संघर्ष

इस मंडी की स्थापना की कहानी ब्रिटिश शासनकाल और रियासती दौर से जुड़ी हुई है। उस समय किसानों के लिए अपनी मेहनत की फसल को सही दाम पर बेचना एक बड़ी चुनौती हुआ करती थी। स्थानीय किसान भागीरथ पटेल के अनुसार, उस दौर में खंडवा में मंडी जैसी कोई व्यवस्थित व्यवस्था मौजूद नहीं थी। किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए काफी दूर-दराज के इलाकों में जाना पड़ता था। वे अपनी फसल को बैलगाड़ियों में लादकर मीलों का सफर तय करते थे। उस समय सड़कों की स्थिति आज जैसी नहीं थी और न ही सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम थे, जिसके कारण किसानों के मन में हमेशा लुटेरों का डर बना रहता था।

लूट के डर से सुरक्षा तक का रास्ता

लंबे सफर के दौरान कई बार किसानों को रास्ते में ही लुटेरों का सामना करना पड़ता था। कई ऐसे मामले सामने आते थे जहां कड़ी मेहनत से उगाई गई फसल और कमाई हुई रकम लुटेरों द्वारा छीन ली जाती थी। इस गंभीर समस्या से आजिज आकर स्थानीय किसानों ने एकजुट होकर अपनी आवाज उठाई। उन्होंने उस समय के अंग्रेज अधिकारियों के सामने अपनी मांगें रखीं और यह आग्रह किया कि यदि शहर के भीतर ही एक मंडी का निर्माण कर दिया जाए, तो उन्हें असुरक्षित रास्तों पर नहीं जाना पड़ेगा। किसानों का मानना था कि इससे न केवल उनकी सुरक्षा सुनिश्चित होगी, बल्कि व्यापारी भी सीधे उनके पास आकर अनाज खरीद सकेंगे।

मंडी की स्थापना और किसानों को मिली राहत

किसानों की यह मांग जब पूरी हुई और शहर में मंडी का ढांचा तैयार हुआ, तो खेती-किसानी के परिदृश्य में एक बड़ा सकारात्मक बदलाव आया। मंडी बनने के बाद किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए मीलों दूर जाने की मजबूरी खत्म हो गई। वे अब अपनी बैलगाड़ियों में अनाज भरकर सीधे शहर के इस व्यापारिक केंद्र में आने लगे। इससे न केवल उनके समय की भारी बचत हुई, बल्कि आने-जाने में होने वाला अनावश्यक खर्च भी कम हो गया। सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि लुटेरों के हमले का जो डर हमेशा उनके मन में रहता था, वह खत्म हो गया। धीरे-धीरे यह जगह खंडवा का एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र बनकर उभरी।

शहर के विकास और नई मंडियों का दौर

यह पुरानी मंडी आज भी शहर के बिल्कुल बीचों-बीच स्थित है। हालांकि, समय के साथ खंडवा शहर का तेजी से विस्तार हुआ है। जैसे-जैसे आबादी और व्यापार का दायरा बढ़ा, अनाज की खरीदी-बिक्री के लिए नई और आधुनिक मंडियों का विकास किया गया। मुख्य अनाज व्यापार अब नई मंडियों में स्थानांतरित हो गया है, जिसके कारण पुरानी मंडी का स्वरूप बदल गया है। आज यहां अनाज की बोलियों का वह पारंपरिक शोर तो नहीं है, लेकिन इसकी भौगोलिक स्थिति और व्यापारिक विरासत अब भी इसे एक महत्वपूर्ण पहचान देती है।

आज के समय में मंडी परिसर की उपयोगिता

आज इस ऐतिहासिक परिसर का स्वरूप काफी बदल चुका है। अब यहां पहले की तरह अनाज की खरीदी तो नहीं होती, लेकिन यह स्थान आज भी पूरी तरह गुलजार रहता है। परिसर के बाहरी हिस्से में दुकानों की कतारें हैं, वहीं भीतर का इलाका दूसरी कृषि सुविधाओं का हब बन गया है। अब यहां खाद और बीज की दुकानें मौजूद हैं, बैंक की सुविधाएं उपलब्ध हैं और मंडी से जुड़े विभिन्न अधिकारी भी यहां अपने कार्यालयों से सेवाएं देते हैं। इस प्रकार, जिस जगह पर कभी किसान बैलगाड़ियों में अनाज लेकर आते थे, वह जगह आज बदलते समय के साथ एक आधुनिक कृषि सहायता केंद्र में तब्दील हो गई है। यह परिसर आज भी खंडवा के उस दौर की दास्तान सुनाता है जब बैलगाड़ियां ही यातायात का मुख्य साधन थीं और व्यापार की दुनिया पूरी तरह बदल रही थी।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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