बिहार
एक घंटा पहले
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विचारों
सोहर का अर्थ और उसका महत्व
भारत के विभिन्न क्षेत्रों, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में बच्चे के जन्म के समय सोहर गाने की परंपरा बहुत पुरानी है। सोहर केवल एक गाना नहीं, बल्कि यह लोकगीतों की एक पूरी विधा है। जब परिवार में किसी नए बच्चे का आगमन होता है, तो घर की महिलाएं एकत्र होकर सोहर गाती हैं। इन गीतों में नवजात के जन्म की खुशी के साथ-साथ मां के संघर्ष, परिवार की उम्मीदों और देवी-देवताओं के प्रति आभार के भाव व्यक्त किए जाते हैं। इन लोकगीतों में अक्सर भगवान राम, कृष्ण और शिव-पार्वती जैसे धार्मिक प्रसंगों का उल्लेख मिलता है, जो इन्हें सांस्कृतिक और आध्यात्मिक गहराई प्रदान करते हैं। क्षेत्रीय बोलियों और लोक भाषाओं के अनुसार इन गीतों की धुन और शब्दों में विविधता देखने को मिलती है।
बेटियों के जन्म पर सोहर को लेकर धारणाएं
एक लंबे समय से यह सवाल समाज में उठता रहा है कि आखिर बेटे के जन्म पर सोहर गाने की प्रथा इतनी प्रबल क्यों रही, जबकि बेटी के जन्म पर इस तरह के आयोजन सीमित क्यों थे? इसका उत्तर परंपरा से कहीं अधिक उस तत्कालीन सामाजिक ढांचे में निहित है, जिसने इन मान्यताओं को जन्म दिया। सदियों से हमारे समाज में पुत्र को वंश का उत्तराधिकारी, आर्थिक सुरक्षा का स्तंभ और धार्मिक कार्यों को संपन्न करने वाला माना गया है। इसके विपरीत, बेटी को पराया धन या विवाह के बाद दूसरे परिवार का सदस्य माना जाता था।
पितृसत्तात्मक सोच, विवाह के खर्च और दहेज जैसी कुरीतियों ने ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न कीं कि बेटी के जन्म को बेटे के जन्म की तरह उत्सव के रूप में मनाने की परंपरा मुख्यधारा में नहीं आ पाई। इसी सामाजिक मानसिकता का गहरा असर उन लोकगीतों पर भी पड़ा, जिन्हें नई पीढ़ी को सुनाया जाता था। यही कारण है कि पुराने समय में बेटी के जन्म पर सोहर गाने की रस्म को उतनी प्राथमिकता नहीं दी गई जितनी बेटे के जन्म पर दी जाती थी। हालांकि, यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि यह कोई नियम नहीं था और अलग-अलग समुदायों में परंपराएं भिन्न थीं।
सामाजिक सोच और लोकगीतों का जुड़ाव
लोकगीत केवल संगीत का माध्यम नहीं होते, बल्कि वे अपने समय के समाज का आईना होते हैं। वे उस दौर की सोच, डर और आकांक्षाओं को अपने भीतर सुरक्षित रखते हैं। पुराने सोहरों में जो शब्दावली इस्तेमाल होती थी, वह अक्सर वंश वृद्धि और आर्थिक मजबूती के इर्द-गिर्द केंद्रित होती थी। लेकिन जैसे-जैसे समय बदला है, लोकगीतों के स्वर भी बदले हैं। शिक्षा के विस्तार और महिलाओं की बढ़ती भागीदारी ने समाज की सोच को काफी प्रभावित किया है। आज के दौर में कई समुदायों में बेटी के जन्म पर उसी उत्साह और उमंग के साथ सोहर गाए जाते हैं, जैसे बेटे के जन्म पर। आधुनिक समय में बेटी को भी परिवार का गौरव और सौभाग्य का प्रतीक माना जाने लगा है, जो लोकगीतों में भी परिलक्षित हो रहा है।
क्या आज के दौर में सोहर की प्रासंगिकता बनी हुई है?
निश्चित रूप से, सोहर आज भी भारतीय लोक संस्कृति का एक अभिन्न अंग है। यह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि हमारे मौखिक इतिहास को संजोने का एक तरीका है। आज के समय में इस परंपरा को जीवित रखने की आवश्यकता है, लेकिन साथ ही हमें इसके पुराने स्वरूप में मौजूद भेदभावपूर्ण दृष्टिकोण का भी विश्लेषण करना चाहिए। किसी भी परंपरा का असली महत्व उसके मानवीय मूल्यों में है। हमें अपनी सांस्कृतिक सुंदरता को बरकरार रखते हुए उन पुरानी धारणाओं को समय के साथ बदलने की जरूरत है जो लैंगिक समानता के खिलाफ हों। आज जब हम एक प्रगतिशील समाज की ओर बढ़ रहे हैं, तो हमें ऐसे गीतों को अपनाने की आवश्यकता है जो जेंडर के आधार पर भेदभाव न करके नवजात के स्वागत की खुशी को समान रूप से व्यक्त करें।
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