किराया कानून में बड़ा बदलाव: बिना पंजीकरण के लीज डीड को नहीं मिलेगी कानूनी मान्यता व्यापार 2 घंटे पहले 7
राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण ने एक अहम फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि बिना पंजीकरण के लीज डीड को अदालत में साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा।

पंजीकरण के बिना लीज का कोई आधार नहीं

अगर आप भविष्य में कोई संपत्ति किराये पर लेने की योजना बना रहे हैं, तो अब आपको बेहद सतर्क रहने की आवश्यकता है। संपत्ति किराये पर लेने के बाद उसकी लीज डीड को केवल बनवाना ही काफी नहीं है, बल्कि उसे कानूनी रूप से पंजीकृत कराना अनिवार्य है। राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण यानी NCLAT ने एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करते हुए यह स्पष्ट किया है कि यदि लीज डीड का पंजीकरण नहीं कराया गया है, तो उसे कानूनी दस्तावेज के तौर पर किसी भी सूरत में मान्यता नहीं दी जाएगी। यह निर्णय उन लोगों के लिए एक बड़ी चेतावनी है जो बिना उचित पंजीकरण के किरायेदारी के समझौतों को अंजाम देते हैं।

लिक्विडेटर के पास है संपत्ति खाली कराने का अधिकार

अपीलीय न्यायाधिकरण ने इस निर्णय के साथ एक और स्पष्ट निर्देश दिया है। किसी कंपनी का लिक्विडेटर बिना किराया नियंत्रण कानून के तहत अलग-अलग कानूनी कार्यवाही किए बिना भी कॉरपोरेट देनदार की संपत्तियों पर कब्जा ले सकता है। न्यायाधिकरण के अनुसार, लिक्विडेटर के पास संपत्ति को खाली कराने का पूर्ण अधिकार है। गौरतलब है कि लिक्विडेटर वह अधिकारी होता है जिसे अदालत या NCLT द्वारा किसी विवादित संपत्ति के निपटारे और परिसमापन प्रक्रिया को पूरा करने के लिए नियुक्त किया जाता है।

मामला और NCLAT का फैसला

यह पूरा मामला लुधियाना की दो कंपनियों, ड्यूक फैशन्स और यूवीएंडडब्ल्यू प्रोडक्ट्स से जुड़ा हुआ है। इन दोनों कंपनियों ने NCLT की चंडीगढ़ पीठ द्वारा दिए गए आदेश को NCLAT में चुनौती दी थी। हालांकि, NCLAT की दो-सदस्यीय पीठ ने इन कंपनियों की दलील को सिरे से खारिज कर दिया और चंडीगढ़ पीठ के आदेश को पूरी तरह बरकरार रखा। NCLT ने इन दोनों कंपनियों को कराबारा और हुसैनपुरा में स्थित दो वाणिज्यिक संपत्तियों को महज दो सप्ताह की समय सीमा के भीतर खाली करने का निर्देश दिया था।

क्यों खारिज हुई कंपनियों की दलील

अपील करने वाली कंपनियों ने तर्क दिया था कि उनके पास 30 साल की लीज डीड है, जिसके आधार पर उन्हें किरायेदारी का अधिकार मिला हुआ है। उनका दावा था कि उन्हें बेदखल करने की कार्यवाही केवल 1949 के ईस्ट पंजाब अर्बन रेंट रिस्ट्रिक्शन एक्ट के दायरे में और किराया नियंत्रक के सामने ही की जा सकती है। लेकिन, NCLAT ने इस तर्क को स्वीकार करने से मना कर दिया। न्यायाधिकरण ने साफ कहा कि क्योंकि लीज डीड पंजीकृत नहीं थी, इसलिए इसे साक्ष्य के रूप में कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसके अतिरिक्त, न्यायाधिकरण ने यह भी गौर किया कि इन कंपनियों के निदेशक, कॉरपोरेट देनदार के निलंबित निदेशकों के काफी करीबी रिश्तेदार थे।

IBC कानून की प्राथमिकता

अपीलीय न्यायाधिकरण ने यह भी स्पष्ट किया कि दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता कानून यानी IBC की धारा 35 के तहत कॉरपोरेट देनदार की संपत्तियों पर कब्जा लेना परिसमापक का एक अनिवार्य वैधानिक दायित्व है। इसके अलावा, IBC की धारा 238 अन्य सभी कानूनों पर प्रभावी है, जिसका मतलब है कि IBC की प्रक्रिया को अन्य कानूनों के ऊपर प्राथमिकता दी जाएगी। यह विशेष मामला वीनस गारमेंट्स (इंडिया) से संबंधित है। इस कंपनी को चंडीगढ़ स्थित NCLT ने कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया यानी CIRP के तहत लिया था और अंततः 22 जुलाई, 2025 को कंपनी के परिसमापन के आदेश जारी किए गए थे।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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