अमेरिका
6 घंटे पहले
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विचारों
दुनिया के दो सबसे बड़े और पुराने लोकतंत्रों, भारत और अमेरिका, के बीच अक्सर तुलना की जाती है। भारत जहां दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, वहीं अमेरिका सबसे पुराना। लेकिन जब बात दोनों देशों की चुनावी प्रक्रियाओं की आती है, तो इनमें जमीन-आसमान का अंतर देखने को मिलता है। हाल के वर्षों में अमेरिकी चुनावी प्रक्रिया पर कई तरह के सवाल उठे हैं और इस व्यवस्था की खामियों को लेकर वहां व्यापक स्तर पर बहस छिड़ी हुई है। इसी बीच, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय चुनाव प्रणाली की जमकर तारीफ की है और अमेरिका में भी भारत की तरह मतदाताओं की पहचान सुनिश्चित करने वाले कड़े नियम लागू करने की मांग की है। डोनाल्ड ट्रंप के इस बयान के बाद से दोनों देशों के चुनावी सिस्टम में अंतर को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय चुनाव प्रणाली की सराहना क्यों की?
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रू पर एक पोस्ट लिखकर भारतीय चुनाव प्रणाली के प्रति अपना सम्मान व्यक्त किया। अपनी इस पोस्ट में उन्होंने भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ हुए एक संवाद का भी उल्लेख किया। डोनाल्ड ट्रंप ने लिखा कि इस महीने के अंत में, भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त, ज्ञानेश कुमार ने हमारे प्रशासन से एक बेहद महत्वपूर्ण सवाल पूछा। उन्होंने पूछा कि आप एक वैध फोटो पहचान पत्र के बिना अमेरिका में चुनाव कैसे करा सकते हैं?
डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी पोस्ट में भारत की विशाल चुनावी प्रक्रिया के आंकड़ों का भी जिक्र किया। उन्होंने लिखा कि भारत के पिछले चुनाव में कुल 64,60,00,000 (64.6 करोड़) मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था। इतनी बड़ी आबादी होने के बावजूद, वहां केवल 1 प्रतिशत से भी कम लोगों ने पोस्टल यानी मेल के माध्यम से मतदान किया। भारत में प्रत्येक मतदाता के लिए मतदान केंद्र पर एक वैध फोटो पहचान पत्र (वोटर आईडी) दिखाना अनिवार्य था। ट्रंप ने अमेरिकी व्यवस्था की आलोचना करते हुए कहा कि अमेरिका को भी तुरंत 'द सेव अमेरिका एक्ट' तुरंत पारित करने की सख्त आवश्यकता है, ताकि अमेरिकी चुनावों की सुरक्षा और विश्वसनीयता को सुनिश्चित किया जा सके।
क्या है 'द सेव अमेरिका एक्ट' और इसकी जरूरत क्यों है?
व्हाइट हाउस ने अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर 'द सेव अमेरिका एक्ट' के उद्देश्यों और इसकी रूपरेखा के बारे में विस्तार से जानकारी साझा की है। इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि केवल अमेरिकी नागरिक ही अमेरिकी चुनावों में मतदान कर सकें और विदेशी हस्तक्षेप या गैर-नागरिकों के मतदान पर पूरी तरह से रोक लगाई जा सके। यह एक व्यावहारिक और द्विदलीय विधेयक के रूप में पेश किया जा रहा है, जिसमें निम्नलिखित सख्त नियम तय करने की सिफारिश की गई है:
- संघीय चुनाव में पंजीकरण के लिए वैध पहचान पत्र: अमेरिका में संघीय स्तर पर होने वाले किसी भी चुनाव के लिए मतदाता सूची में पंजीकरण कराने से पहले मतदाता के पास एक वैध सरकारी पहचान पत्र होना अनिवार्य होगा।
- नागरिकता का प्रमाण: मतदान के लिए केवल पहचान पत्र ही काफी नहीं होगा, बल्कि मतदाता को यह भी साबित करना होगा कि वह अमेरिका का वैध नागरिक है। इसके लिए नागरिकता का स्पष्ट प्रमाण देना होगा।
- पोस्टल मतदान पर सख्त प्रतिबंध: डाक या मेल-इन बैलेट के जरिए मतदान की व्यवस्था को काफी हद तक सीमित किया जाएगा। गंभीर बीमारी, शारीरिक विकलांगता, सैन्य सेवा में तैनाती या देश से बाहर यात्रा करने जैसे विशेष मामलों को छोड़कर किसी भी आम नागरिक को पोस्टल मतदान की अनुमति नहीं दी जाएगी।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इसके लिए रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों ही दलों के सांसदों से अपील कर रहे हैं कि वे 'द सेव अमेरिका एक्ट' को सर्वसम्मति से पारित करें। उनका मानना है कि मतदान के लिए वोटर आईडी को अनिवार्य बनाए जाने का विरोध किसी भी अमेरिकी नागरिक या राजनीतिक दल द्वारा नहीं किया जाना चाहिए। इसके अलावा, यह कानून राज्यों को अपनी मतदाता सूची से गैर-नागरिकों को हटाने का निर्देश भी देगा।
सुरक्षा मानकों में दुनिया के अन्य देशों से पीछे क्यों है अमेरिकी चुनाव?
अमेरिका भले ही खुद को दुनिया का सबसे ताकतवर और आधुनिक देश मानता हो, लेकिन जब बात चुनाव सुरक्षा और बुनियादी चुनावी मानकों की आती है, तो वह कई विकासशील देशों से भी पीछे नजर आता है। 'द सेव अमेरिका एक्ट' के समर्थकों का कहना है कि बुनियादी चुनाव सुरक्षा को लागू करने के मामले में अमेरिका वैश्विक स्तर पर काफी पिछड़ा हुआ है:
- भारत और ब्राजील का मॉडल: भारत और ब्राजील जैसे देश अपने मतदाताओं की पहचान को पूरी तरह सुरक्षित और पुख्ता बनाने के लिए वोटर आईडी को बायोमेट्रिक डेटाबेस से जोड़ते हैं। इसके विपरीत, अमेरिका आज भी मुख्य रूप से नागरिकता के सत्यापन के लिए स्व-सत्यापन (self-attestation) यानी स्वयं के दावे पर ही निर्भर रहता है, जो फर्जीवाड़े के द्वार खोलता है।
- जर्मनी और कनाडा की व्यवस्था: जर्मनी और कनाडा जैसे विकसित देश मतों की सटीक गिनती और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए मुख्य रूप से कागजी मतपत्रों (paper ballots) का उपयोग करते हैं और वहां मतों की सुरक्षा की कड़ी व्यवस्था होती है। अमेरिका में इस तरह की बुनियादी सुरक्षा कड़ी की भारी कमी देखने को मिलती है।
- डेनमार्क और स्वीडन के नियम: डेनमार्क और स्वीडन जैसे यूरोपीय देशों में पोस्टल मतदान को बेहद नियंत्रित रखा गया है। वहां केवल उन्हीं लोगों को मेल-इन वोटिंग की अनुमति दी जाती है जो व्यक्तिगत रूप से मतदान केंद्र पर आने में पूरी तरह असमर्थ होते हैं। इसके अलावा, नियत समय के बाद आने वाले किसी भी वोट की गिनती नहीं की जाती है। इसके विपरीत, अमेरिकी चुनावों में मतदान के दिन के बाद भी बड़े पैमाने पर पोस्टल वोटों की गिनती जारी रहती है, जिससे नतीजों में देरी और भ्रम की स्थिति पैदा होती है।
अमेरिकी चुनाव प्रणाली की तीन सबसे बड़ी खामियां
अमेरिकी चुनावी प्रणाली के मौजूदा स्वरूप में कई ऐसी कमियां हैं जो हर चुनाव के बाद विवाद का कारण बनती हैं। इनमें से प्रमुख चुनौतियां निम्नलिखित हैं:
1. विकेंद्रीकृत नियम और अलग-अलग कानून
अमेरिका की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वहां कोई एकल केंद्रीय चुनाव आयोग नहीं है। अमेरिका के 50 राज्यों में मतदान और चुनाव कराने के नियम अलग-अलग हैं। मतदाता पहचान पत्र की अनिवार्यता, पंजीकरण की प्रक्रिया और मेल-इन बैलेट भेजने के नियम हर राज्य में बदलते रहते हैं। इस विकेंद्रीकरण के कारण मतदाताओं में भ्रम पैदा होता है और चुनाव की निष्पक्षता पर अविश्वास बढ़ता है।
2. धीमी मतगणना और नतीजों में देरी
अमेरिका में मेल-इन या पोस्टल बैलेट का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है। इन मतपत्रों की जांच और गिनती की प्रक्रिया बेहद जटिल और समय लेने वाली होती है। इस वजह से चुनाव के अंतिम नतीजे आने में कई दिन और कभी-कभी तो हफ्ते भर का समय लग जाता है। इस देरी के कारण राजनीतिक दलों को नतीजों में धांधली और हेरफेर के आरोप लगाने का मौका मिल जाता है, जिससे देश में अदालती मुकदमों का सिलसिला शुरू हो जाता है।
3. इलेक्टोरल कॉलेज का पेच
अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनता के कुल वोटों (पॉपुलर वोट) के आधार पर नहीं होता, बल्कि इलेक्टोरल कॉलेज के माध्यम से होता है। कई बार ऐसा होता है कि पूरे देश में सबसे ज्यादा वोट पाने वाला उम्मीदवार भी राष्ट्रपति बनने से चूक जाता है। ऐसा ही साल 2016 के चुनावों में भी देखने को मिला था, जिसने इस प्रणाली की लोकतांत्रिक विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए थे।
आखिर अमेरिका क्यों चाहता है भारत जैसी चुनाव प्रणाली?
भारतीय चुनाव प्रणाली अपनी विशालता, गति और पारदर्शिता के कारण पूरी दुनिया के विचारकों और नीति निर्माताओं को आकर्षित करती है। अमेरिका के विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के मॉडल से अमेरिका बहुत कुछ सीख सकता है:
- EVM और त्वरित नतीजे: भारत में मतदाताओं की संख्या अमेरिका की कुल आबादी से भी कई गुना अधिक है। इसके बावजूद, भारत में EVM (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) और VVPAT के उपयोग के कारण महज एक ही दिन में पूरे देश के नतीजे पूरी पारदर्शिता के साथ घोषित कर दिए जाते हैं। अमेरिका में हफ्तों तक चलने वाली मतगणना के मुकाबले भारत की यह त्वरित व्यवस्था जनता का विश्वास बनाए रखने में बेहद मददगार है।
- स्वतंत्र और केंद्रीय संस्था: भारत में चुनाव कराने की पूरी जिम्मेदारी 'भारत निर्वाचन आयोग' (ECI) के पास होती है। यह एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है जो पूरे देश में एक समान नियमों के तहत निष्पक्ष चुनाव आयोजित कराती है। इसके विपरीत, अमेरिका में स्थानीय राजनीतिक दल अपने राज्यों में अपनी राजनीतिक सहूलियत के हिसाब से नियम बदलते रहते हैं। एक स्वतंत्र केंद्रीय संस्था अमेरिका में भी चुनावों को निष्पक्ष बना सकती है।
- फर्जी मतदान पर पूर्ण विराम: भारत में प्रत्येक मतदाता के लिए फोटो युक्त पहचान पत्र अनिवार्य है, और मतदान के समय मतदाता की भौतिक उपस्थिति को सत्यापित किया जाता है। इसके अलावा VVPAT पर्ची के माध्यम से मतदाता स्वयं देख सकता है कि उसका वोट सही उम्मीदवार को गया है या नहीं। इससे फर्जी मतदान की गुंजाइश लगभग खत्म हो जाती है, जबकि अमेरिका में पहचान पत्र के बिना मतदान और असुरक्षित मेल-इन बैलेट को लेकर हमेशा विवाद बना रहता है।
भारत जैसी विशाल आबादी, अनेक भाषाओं और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों वाले देश में जिस तरह से हर बार शांतिपूर्ण, सटीक और विवाद-मुक्त तरीके से चुनाव संपन्न कराए जाते हैं, वह वाकई अद्भुत है। यही कारण है कि आज अमेरिका जैसा विकसित देश भी अपनी चुनाव प्रणाली में जनता का भरोसा बहाल करने के लिए भारत के इस आधुनिक और एकीकृत मॉडल की ओर देख रहा है ताकि वह अपनी व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और सुदृढ़ बना सके।
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