राष्ट्रीय राजनीति
एक घंटा पहले
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विचारों
तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के नेताओं ने रविवार को साफ किया कि अगर पार्टी के कुछ सांसद अलग होकर अपना गुट बनाने की कोशिश करते हैं, तो उन्हें दलबदल-रोधी कानून के तहत कई गंभीर कानूनी और प्रक्रियात्मक रुकावटों से जूझना पड़ेगा। इन दिनों ऐसी चर्चाएं हैं कि पार्टी के सांसदों का एक हिस्सा संसदीय दल से अलग होने की संभावना तलाश रहा है और इसके लिए समर्थन जुटाने में लगा है।
घटनाक्रम की जानकारी रखने वाले सूत्रों के मुताबिक, असंतुष्ट नेता संसद के दोनों सदनों के सांसदों के बीच समर्थन हासिल करने की कोशिश में हैं। कयास लगाए जा रहे हैं कि अगर यह गुट ज़रूरी संख्या में सांसदों को अपने साथ जोड़ लेता है, तो वह अलग मान्यता की मांग कर सकता है।
19 सांसदों का गणित
पार्टी के एक नेता ने बताया कि फिलहाल लोकसभा में टीएमसी के 28 सदस्य हैं। दलबदल-रोधी कानून के तहत किसी भी कदम के लिए संसदीय दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्यों, यानी 19 सांसदों का समर्थन ज़रूरी होगा।
हालांकि पार्टी के एक अन्य वरिष्ठ पदाधिकारी का तर्क है कि इतनी संख्या जुटा लेने के बाद भी बागी गुट अपने आप एक अलग संसदीय समूह के रूप में काम नहीं कर पाएगा। उसे किसी न किसी राजनीतिक दल का हिस्सा बनना ही होगा।
कानून के अनुसार, अगर दो-तिहाई सांसद भी पार्टी छोड़ना चाहें, तो उनके सामने एकमात्र रास्ता किसी दूसरे राजनीतिक दल में विलय का है। अलग समूह बनाने का कोई प्रावधान नहीं है।
लोकसभा अध्यक्ष क्या कर सकते हैं
एक अटकल यह भी है कि नाराज़ सांसद लोकसभा अध्यक्ष से संपर्क कर पार्टी के संसदीय नेतृत्व में बदलाव की मांग रख सकते हैं। लेकिन सूत्रों का कहना है कि इस रास्ते से भी कुछ हासिल नहीं होगा।
एक सूत्र ने बताया, “उस स्थिति में भी लोकसभा अध्यक्ष कोई फैसला नहीं ले सकते। संसदीय दल के नेता की नियुक्ति पार्टी करती है और इसमें कोई भी बदलाव सिर्फ पार्टी अध्यक्ष ही कर सकती हैं।” यानी इस पद को लेकर अंतिम अधिकार ममता बनर्जी के पास ही है।
ध्यान भटकाने का आरोप
सूत्रों ने यह भी दावा किया कि इन तमाम अटकलों का असल मकसद सोमवार को होने वाली ‘इंडिया’ गठबंधन की बैठक से ध्यान हटाना है। पार्टी इसे एक सोची-समझी कवायद के रूप में देख रही है।
इसी बीच टीएमसी के एक अन्य नेता ने कहा कि राजनीतिक गलियारों में कई तरह की अटकलें चल रही हैं, मगर इन पर अमल में वक्त लग सकता है क्योंकि संसद के मानसून सत्र में अभी काफी समय बाकी है।
दो संभावित परिदृश्य
उस नेता के मुताबिक मुख्य रूप से दो हालात पर चर्चा हो रही है। उन्होंने कहा, “पहला परिदृश्य पश्चिम बंगाल विधानसभा में रिताब्रता बनर्जी के नेतृत्व में हुई टूट जैसा है, जहां विधायकों के एक हिस्से ने पार्टी से अलग होकर विद्रोह कर दिया था। दूसरा आम आदमी पार्टी (आप) के मामले जैसा है, जब राघव चड्ढा और राज्यसभा सदस्यों के एक समूह ने दलबदल-रोधी प्रावधानों का पालन करते हुए पार्टी छोड़ी और भाजपा में विलय कर लिया।”
उन्होंने जोड़ा, “दोनों ही सूरतों में ये ऐसी प्रक्रियाएं हैं जिनमें समय लगता है और जिनमें कानूनी अड़चनें भी शामिल रहती हैं।” सूत्रों का कहना है कि संसद में इस तरह की स्थिति बनने से रोकने की कोशिशें लगातार जारी हैं।
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