पश्चिम बंगाल
एक घंटा पहले
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विचारों
भोजन पर छिड़ी सियासी रार
पश्चिम बंगाल में मिड-डे मील का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। राज्य सरकार ने मिड-डे मील तैयार करने का अनुबंध ISKCON को सौंपा है, जिसके बाद विपक्ष ने तीखे सवाल खड़े किए हैं। विवाद की मुख्य वजह यह है कि ISKCON अपनी रसोई में प्याज और लहसुन तक का इस्तेमाल नहीं करता, ऐसे में इस बात पर बहस शुरू हो गई है कि क्या अब सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को उबले हुए अंडे मिलना बंद हो जाएंगे।
तृणमूल कांग्रेस और ISKCON का पक्ष
तृणमूल कांग्रेस के नेता कुणाल घोष ने इस मुद्दे पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि पार्टी को ISKCON से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन बच्चों के स्वास्थ्य के साथ समझौता नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि यदि मिड-डे मील में अंडे शामिल नहीं किए गए, तो बच्चों को पर्याप्त पोषण कैसे मिलेगा।
वहीं, दूसरी ओर ISKCON के प्रवक्ता राधारमण दास ने इन आरोपों का खंडन किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रोटीन केवल अंडों से ही नहीं मिलता, बल्कि दाल और पनीर जैसे शाकाहारी विकल्पों में भी भरपूर मात्रा में प्रोटीन उपलब्ध होता है। उन्होंने कहा कि विपक्ष को बच्चों के पोषण को लेकर बेवजह चिंता नहीं करनी चाहिए क्योंकि संस्था गुणवत्तापूर्ण भोजन उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है।
विपक्ष की कड़ी प्रतिक्रिया
इंडियन सेकुलर फ्रंट के नौशाद सिद्दीकी ने इस फैसले का विरोध करते हुए कहा कि पनीर काफी महंगा होता है और बच्चों को मात्र एक टुकड़ा देने से पोषण की जरूरत पूरी नहीं होगी। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि बड़ी संख्या में गरीब परिवारों के बच्चे अंडे के कारण ही स्कूल आते हैं, ऐसे में यह निर्णय गरीब तबके के हितों के खिलाफ है।
क्या है चुनौती
अंडों की उपयोगिता को लेकर यह बहस कोई नई नहीं है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि अंडे प्रोटीन का सस्ता और अच्छा स्रोत हैं। अब पूरी चुनौती ISKCON के सामने है कि वे बिना अंडे के भी किस तरह बच्चों को संतुलित और पौष्टिक आहार प्रदान करते हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार और संस्था इस पोषण संबंधी चिंताओं का समाधान कैसे निकालते हैं।
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