मानसून के दौरान सब्जियों की फसल पर मंडराया संकट, कृषि विशेषज्ञों ने दिए बचाव के प्रभावी सुझाव छत्तीसगढ़ एक महीने पहले 49
बरसात के मौसम में बढ़ती नमी के कारण सब्जियों की फसलों में फफूंद जनित रोगों का खतरा बढ़ जाता है, जिससे बचने के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने समय पर सावधानी बरतने और उचित प्रबंधन की सलाह दी है।

मानसून और फसलों पर संकट

लगातार हो रही बारिश और वातावरण में मौजूद अत्यधिक नमी का सीधा असर खेती पर पड़ रहा है, विशेष रूप से साग-सब्जियों की फसलों के लिए यह समय चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। बालोद कृषि विज्ञान केंद्र के विषय वस्तु विशेषज्ञ डॉ. बलदेव अग्रवाल ने किसानों को सचेत करते हुए बताया है कि मानसून के दौरान फसलों में कीट और फफूंद से जुड़ी बीमारियों का प्रकोप कई गुना बढ़ जाता है। यदि किसान इन परिस्थितियों में सतर्कता नहीं बरतते हैं और समय रहते बचाव के उपाय नहीं करते हैं, तो देखते ही देखते उनकी पूरी फसल नष्ट हो सकती है, जिससे भारी आर्थिक नुकसान की संभावना रहती है।

फफूंद के पनपने का कारण

डॉ. अग्रवाल के अनुसार, बरसात के मौसम में हवा में नमी का स्तर बहुत अधिक रहता है, जो फफूंद के पनपने और फैलने के लिए सबसे अनुकूल स्थिति है। यदि किसी क्षेत्र में लगातार तीन से चार दिन तक धूप नहीं निकलती है और आसमान बादलों से ढका रहता है, तो पांचवें दिन से ही सब्जियों की फसलों में डाउनी मिल्ड्यू और पाउडरी मिल्ड्यू जैसी खतरनाक फफूंदजनित बीमारियां अपना असर दिखाना शुरू कर देती हैं। कृषि विशेषज्ञ का कहना है कि किसानों को बीमारी के गंभीर रूप लेने का इंतजार नहीं करना चाहिए, बल्कि बचाव के उपाय पहले से ही शुरू कर देने चाहिए।

शुरुआती रोकथाम का महत्व

फसलों को बचाने का सबसे प्रभावी तरीका बीमारी के फैलने से पहले ही सावधानी बरतना है। डॉ. अग्रवाल ने सलाह दी है कि किसान बाविस्टिन और रेडोमिल जैसी उपयुक्त फफूंदनाशक दवाओं का सही समय पर छिड़काव करें। यदि बीमारी आने से पहले ही एक प्रिवेंटिव स्प्रे कर दिया जाए, तो फसल को सुरक्षित रखा जा सकता है। हालांकि, बीमारी पूरी तरह फैल जाने के बाद दवाओं का प्रभाव काफी सीमित हो जाता है और उस स्थिति में फसल को बचाना मुश्किल हो जाता है। शुरुआती अवस्था में की गई रोकथाम ही पैदावार को नुकसान से बचा सकती है।

रोगों की पहचान कैसे करें

किसानों को अपनी फसलों में बीमारियों की पहचान करने के लिए नियमित रूप से निरीक्षण करने की सलाह दी गई है। डॉ. अग्रवाल ने बताया कि खीरा, ककड़ी, लौकी, कद्दू, तरबूज, खरबूजा, करेला और तुरई जैसी कद्दूवर्गीय फसलों में रोगों को पहचानना आसान है:

  • पाउडरी मिल्ड्यू: यदि पत्तियों के ऊपरी हिस्से पर सफेद पाउडर जैसा पदार्थ दिखाई दे, तो यह पाउडरी मिल्ड्यू का प्रमुख लक्षण है।
  • डाउनी मिल्ड्यू: जब पत्तियों के निचले हिस्से में फफूंद विकसित होने लगे और पत्तियों पर पीले रंग के धब्बे उभरने लगें, तो यह डाउनी मिल्ड्यू का संकेत होता है।
  • अल्टरनेरिया रोग: यदि पत्तियों पर गोल-गोल छल्ले या रिंग के समान निशान दिखाई दें, तो इसे अल्टरनेरिया रोग माना जाता है।

ऐसे लक्षण दिखते ही तुरंत कृषि विशेषज्ञ से परामर्श लेकर उचित दवा का छिड़काव करना चाहिए ताकि रोग दूसरे पौधों में न फैले।

जल निकासी की समस्या और सावधानी

कई बार किसान पत्तियों के पीले पड़ने को केवल रोग समझ लेते हैं, जबकि वास्तविकता कुछ और हो सकती है। डॉ. अग्रवाल ने स्पष्ट किया कि यदि बिना किसी बीमारी के भी पौधे की पत्तियां पीली पड़ रही हैं, तो इसका एक बड़ा कारण खेत में पानी का भरा होना भी हो सकता है। खेत में जलभराव के कारण पौधों की जड़ों तक ऑक्सीजन नहीं पहुँच पाती, जिससे फसल कमजोर होकर सूखने लगती है। इसलिए खेत से अतिरिक्त पानी निकालने की समुचित व्यवस्था करना बेहद अनिवार्य है। किसानों से अपील की गई है कि वे बरसात के पूरे सीजन में अपनी फसलों की निगरानी करते रहें और छोटी से छोटी समस्या को भी नजरअंदाज न करें। यह थोड़ी सी सावधानी न केवल आर्थिक नुकसान से बचाएगी, बल्कि सब्जियों की बेहतर गुणवत्ता और अधिक पैदावार सुनिश्चित करने में भी मददगार साबित होगी।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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