चीन
एक घंटा पहले
4
विचारों
कांगो की जमीन पर महाशक्तियों का कब्जा
दुनिया के सबसे गरीब देशों में शुमार डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो इन दिनों वैश्विक भू-राजनीति का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है। दशकों से भुखमरी, गृहयुद्ध और कंगाली से जूझ रहे इस देश के नीचे कुदरत का ऐसा बेशकीमती खजाना छिपा है, जिसे हथियाने के लिए चीन और अमेरिका के बीच जंग छिड़ गई है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, दोनों ही इस देश के संसाधनों को अपने नियंत्रण में लेने के लिए पूरी ताकत झोंक रहे हैं। यह महज एक आर्थिक प्रतिस्पर्धा नहीं है, बल्कि भविष्य की तकनीक और सुरक्षा पर अपना सिक्का जमाने की एक विकराल लड़ाई है।
कांगो का दुर्लभ खनिज भंडार
कांगो की धरती पर छिपी हुई संपदा किसी भी देश को वैश्विक महाशक्ति बनाने की क्षमता रखती है। यहाँ की मिट्टी में मौजूद दुर्लभ खनिजों के बिना आधुनिक दुनिया की कल्पना करना भी मुश्किल है।
- कोबाल्ट: कांगो दुनिया में कोबाल्ट का सबसे बड़ा उत्पादक है, जो इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी बनाने के लिए अनिवार्य कच्चा माल है।
- तांबा: यह देश तांबे का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, जिसके बिना विश्व का इलेक्ट्रॉनिक ढांचा खड़ा नहीं हो सकता।
- अन्य खनिज: यहाँ लिथियम, कोल्टन, मैंगनीज, टैंटलम, टंगस्टन, सोना, टिन और हीरे के विशाल भंडार मौजूद हैं।
अत्यधिक संसाधनों के बावजूद, कांगो खुद इनका लाभ नहीं उठा पाया है। रेल नेटवर्क और सड़कों के अभाव के साथ-साथ दशकों से जारी आंतरिक हिंसा ने इस देश की कमर तोड़ दी है। इसी कमजोरी और अस्थिरता का फायदा उठाते हुए चीन ने कांगो के खदानों पर अपना एकतरफा आधिपत्य जमा लिया था, लेकिन अब अमेरिका की सीधी एंट्री ने स्थिति को पूरी तरह बदल दिया है।
चीन ने कैसे जमाया अपना वर्चस्व
चीन ने उन देशों में भारी निवेश करने की रणनीति अपनाई है जहाँ पश्चिमी देशों ने जाने से परहेज किया। कांगो में जब भीषण गृहयुद्ध चल रहा था, तब चीनी कंपनियों ने वहां के सिस्टम में पानी की तरह पैसा बहाया। आज स्थिति यह है कि कांगो की क्रिटिकल मिनरल खदानों और प्रोडक्शन का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा चीनी कंपनियों के नियंत्रण में है या उनके इशारे पर चलता है। चीन ने सिर्फ उत्खनन तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि रिफाइनिंग और प्रोसेसिंग के पूरे तंत्र पर अपना दबदबा कायम कर लिया है। वैश्विक स्तर पर कमर्शियल ग्रेड कोबाल्ट केमिकल रिफाइनिंग पर चीन का 90 प्रतिशत से ज्यादा कंट्रोल है। इसी तरह, बैटरी निर्माण में प्रयुक्त कोबाल्ट सल्फेट के 80 प्रतिशत बाजार और फिनिश्ड कॉपर के 50 प्रतिशत से अधिक उत्पादन पर भी चीन का ही एकाधिकार है। चीन इन खनिजों को कांगो से निकालकर अपने देश भेजता है, जिससे वैश्विक टेक और ऑटोमोबाइल सेक्टर की सप्लाई चेन की चाबी चीन के हाथ में आ गई है।
अमेरिका का राष्ट्रीय सुरक्षा दांव
चीन के बढ़ते प्रभाव से अमेरिका की चिंताएं बढ़ गई हैं। वाशिंगटन को यह स्पष्ट हो गया है कि यदि चीन ने सप्लाई चेन पर रोक लगाई, तो अमेरिकी टेक और डिफेंस सेक्टर ठप हो सकते हैं। इसीलिए, अमेरिका ने क्रिटिकल मिनरल्स की वैकल्पिक आपूर्ति श्रृंखला बनाने को अपनी ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का प्रमुख मुद्दा घोषित किया है।
चीन की घेराबंदी करने के लिए अमेरिका ने ट्रांसपोर्ट नेटवर्क पर बड़ा दांव खेला है। अमेरिका ने 'लोबिटो कॉरिडोर' प्रोजेक्ट को जोर-शोर से बढ़ावा दिया है। यह 1,300 किलोमीटर लंबी रेलवे लाइन है, जो अटलांटिक तट को कांगो और जाम्बिया के कॉपरबेल्ट से जोड़ती है। इस प्रोजेक्ट के लिए 6 अरब डॉलर से अधिक का बजट निर्धारित किया गया है, जिसमें अमेरिका 4 अरब डॉलर से अधिक की राशि देगा। इसमें अमेरिकी इंटरनेशनल डेवलपमेंट फाइनेंस कॉर्पोरेशन का 55.3 करोड़ डॉलर का कर्ज भी सम्मिलित है। इसका मुख्य उद्देश्य कांगो के संसाधनों को चीन के बजाय सीधे पश्चिमी बाजारों तक पहुंचाना है।
शांति समझौते और कूटनीति का खेल
पूर्वी कांगो खनिज संपदा से भरा है, लेकिन यही इलाका हिंसा और विद्रोही गुटों का गढ़ भी है। यहां सक्रिय M23 विद्रोही गुट का खदानों वाले इलाकों पर दबदबा है। जानकारों का आरोप है कि M23 को पड़ोसी रवांडा का समर्थन प्राप्त है। इस लड़ाई को शांत करने और अमेरिकी कंपनियों के लिए रास्ता बनाने के लिए डोनाल्ड ट्रंप ने कूटनीतिक हथकंडा अपनाया। 27 जून 2025 को अमेरिका की मध्यस्थता में कांगो और रवांडा के बीच एक शांति समझौता हुआ। इसके बाद दिसंबर 2025 में डोनाल्ड ट्रंप ने दोनों देशों के प्रमुखों की मेजबानी की और 'वाशिंगटन एकॉर्ड्स फॉर पीस एंड प्रॉस्परिटी' पर हस्ताक्षर करवाए। साथ ही, क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण ढांचा (REIF) भी साइन किया गया, जिससे अमेरिकी प्राइवेट कंपनियों को कांगो में निवेश का सीधा मार्ग मिल सके। दबाव बनाने हेतु अमेरिकी खजाना विभाग ने M23 की मदद करने के आरोप में रवांडा डिफेंस फोर्स और उसके चार सैन्य अधिकारियों पर सख्त प्रतिबंध लगा दिए हैं।
अमेरिकी अरबपतियों और फर्मों की एंट्री
अमेरिकी सरकारी समर्थन के बाद, कई बड़ी प्राइवेट कंपनियाँ कांगो में सक्रिय हो गई हैं। जेफ बेजोस और बिल गेट्स समर्थित 'कोबोल्ड मेटल्स' ने दुनिया के सबसे बड़े लिथियम भंडारों में से एक, विवादित 'मानोनो लिथियम डिपॉजिट' को हासिल करने का सौदा किया है। वहीं, 'वर्चस मिनरल्स' जैसी अन्य अमेरिकी कंपनियों ने कॉपर और कोबाल्ट के लिए मेगा-डील साइन की है। कांगो सरकार ने भी अपनी पहली 'स्ट्रेटेजिक एसेट रिजर्व' सूची जारी की है, जिसमें अमेरिकी कंपनियों को विशेष प्राथमिकता देने का प्रावधान है।
9 अरब डॉलर का ऐतिहासिक सौदा
कांगो में चीन के वर्चस्व पर सबसे घातक प्रहार अमेरिकी बिजनेस कंसोर्टियम ने किया है। ओरियन रिसोर्स पार्टनरशिप के नेतृत्व में 'ओरियन सीएमसी' ने माइनिंग दिग्गज ग्लेनकोर के साथ मिलकर 9 अरब डॉलर (लगभग 75 हजार करोड़ रुपये) का बड़ा समझौता किया है। इस डील के तहत, ओरियन ने कांगो की सबसे बड़ी कोबाल्ट और कॉपर खदानों, 'मुतांडा माइनिंग' और 'कामोतो कॉपर कंपनी', में 40 प्रतिशत हिस्सेदारी हासिल कर ली है। ऐतिहासिक रूप से मुतांडा खदान का उत्पादन चीन की सप्लाई चेन में जाता था, लेकिन अब ओरियन के पास इसे सीधे अमेरिका और पश्चिमी देशों को बेचने का अधिकार है।
आम लोगों की बदहाली का अंत कब?
कांगो की धरती पर छिड़ी यह जंग दो महाशक्तियों के वर्चस्व की लड़ाई का अखाड़ा बन चुकी है। हालांकि, इस पूरे खेल में कांगो की जनता का भविष्य कहीं पीछे छूट गया है। वाशिंगटन समझौते के बावजूद पूर्वी कांगो में हिंसा और असुरक्षा बरकरार है। यह देखना शेष है कि महाशक्तियों की इस आपाधापी से कांगो के आम नागरिकों को कोई लाभ होता है या यह देश केवल इन बड़ी शक्तियों के स्वार्थ का बलि का बकरा बनकर रह जाएगा।
Comments
0 comment