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एक घंटा पहले
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संयुक्त राष्ट्र में बढ़ा अमेरिका और रूस-चीन के बीच तनाव
ईरान के परमाणु कार्यक्रम को नियंत्रित करने और उस पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की निगरानी को लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक बार फिर बड़ी खींचतान देखने को मिली है। गुरुवार को अमेरिका द्वारा पेश किए गए एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव को रूस और चीन ने वीटो कर दिया, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हड़कंप मच गया है। इस प्रस्ताव में ईरान पर लागू संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों की निगरानी करने वाले विशेषज्ञों के पैनल का कार्यकाल एक साल और बढ़ाए जाने की मांग की गई थी। मतदान के दौरान 11 देशों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया, जबकि रूस और चीन ने इसके खिलाफ वोट डालकर इसे रोक दिया। सोमालिया और पाकिस्तान ने इस पूरी प्रक्रिया से दूरी बनाए रखी और मतदान में भाग नहीं लिया। रूस और चीन द्वारा वीटो का इस्तेमाल किए जाने के कारण यह प्रस्ताव पारित नहीं हो पाया, जिससे ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर नजर रखने वाली व्यवस्था के भविष्य पर सवालिया निशान लग गए हैं।
ईरान पर लागू हैं ये सख्त अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध
ईरान के परमाणु महत्वकांक्षाओं को देखते हुए उस पर संयुक्त राष्ट्र के कड़े प्रतिबंध पहले से ही लागू हैं। इन प्रतिबंधों के दायरे में ईरान की विदेशी संपत्तियों को फ्रीज करना, हथियारों की खरीद-बिक्री पर पूरी तरह रोक और उसके बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम से जुड़ी गतिविधियों पर कड़ी पाबंदियां शामिल हैं। ये प्रतिबंध वर्ष 2025 में फिर से प्रभावी किए गए थे। उस समय ईरान परमाणु समझौते में शामिल रहे देशों फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन ने समझौते में मौजूद स्नैपबैक व्यवस्था का सक्रिय उपयोग किया था। इसके परिणामस्वरूप 27 सितंबर 2025 को ईरान पर संयुक्त राष्ट्र के पुराने प्रतिबंधों को दोबारा बहाल कर दिया गया और उनकी निगरानी के लिए एक समिति बनाई गई थी। संयुक्त राष्ट्र के रिकॉर्ड के मुताबिक, इस समिति के साथ ही विशेषज्ञों का एक पैनल भी काम कर रहा था ताकि प्रतिबंधों के अनुपालन पर बारीकी से नजर रखी जा सके।
अमेरिका का क्या था प्रस्ताव और क्या थी रणनीति?
अमेरिका का स्पष्ट उद्देश्य विशेषज्ञों के पैनल का कार्यकाल एक वर्ष के लिए बढ़ाना था। अमेरिकी प्रशासन का तर्क था कि यह सुनिश्चित करना अनिवार्य है कि ईरान पर लगे प्रतिबंधों का उल्लंघन न हो। वर्तमान में ईरान को उसके शेष आर्थिक सहयोगियों से अलग करने की अमेरिकी रणनीति जारी है और वहां चल रहा संघर्ष फिलहाल एक गतिरोध की स्थिति में है। अमेरिका के अनुसार, ये स्वतंत्र विशेषज्ञ न केवल प्रतिबंधों के उल्लंघन की पहचान करने में मदद करते हैं, बल्कि ईरान द्वारा किए जा रहे प्रतिबंधित सहयोगों पर भी बारीक नजर रखते हैं। अमेरिका का मानना है कि इन विशेषज्ञों की उपस्थिति अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
अमेरिका की चेतावनी: निगरानी व्यवस्था हो जाएगी कमजोर
अमेरिकी उप राजदूत जेनिफर लोसेटा ने रूस और चीन के वीटो पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्हें इस कदम से कोई हैरानी नहीं हुई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संयुक्त राष्ट्र के ये विशेषज्ञ ईरान और उसके सहयोगियों के बीच चल रहे संदिग्ध लेन-देन की रिपोर्ट देने में सक्षम थे। लोसेटा के अनुसार, इस वीटो का प्राथमिक उद्देश्य ही प्रतिबंधों की निगरानी प्रक्रिया को बाधित करना था। उन्होंने चेतावनी दी कि विशेषज्ञों की अनुपस्थिति में सुरक्षा परिषद को प्रतिबंधों के उल्लंघन की निष्पक्ष जानकारी प्राप्त नहीं हो पाएगी, जिसका सीधा लाभ ईरान और उन देशों को मिलेगा जो प्रतिबंधों को दरकिनार करना चाहते हैं।
रूस ने बताया प्रतिबंधों की वापसी को गैरकानूनी
दूसरी ओर, संयुक्त राष्ट्र में रूस के राजदूत वासिली नेबेंजिया ने अमेरिकी प्रस्ताव को ही खारिज कर दिया। उन्होंने तर्क दिया कि ईरान पर स्नैपबैक व्यवस्था के माध्यम से प्रतिबंधों को दोबारा लागू करना ही पूरी तरह गैरकानूनी था। रूस का मानना है कि विशेषज्ञों के पैनल का कार्यकाल बढ़ाने का प्रस्ताव भी किसी कानूनी आधार पर टिका नहीं है। नेबेंजिया ने बताया कि रूस और चीन ने पहले ही अमेरिका और उसके सहयोगियों से आग्रह किया था कि वे इस प्रस्ताव को मतदान के लिए न रखें, क्योंकि इससे सुरक्षा परिषद के भीतर तनाव बढ़ेगा। लेकिन, अमेरिका ने टकराव का मार्ग चुना।
ईरान ने दी प्रतिक्रिया: रूस और चीन को कहा शुक्रिया
इस पूरे मामले पर ईरान का रुख सकारात्मक रहा है। ईरान के संयुक्त राष्ट्र मिशन ने सोशल मीडिया पर आधिकारिक बयान जारी करते हुए रूस और चीन के प्रति आभार प्रकट किया। ईरान के मुताबिक, इन दोनों देशों ने अमेरिका और उसके सहयोगियों की उस कोशिश को नाकाम कर दिया है, जिसमें सुरक्षा परिषद के मंच का उपयोग केवल राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया जा रहा था। हालांकि, फ्रांस के राजदूत जेरोम बोनाफों ने इसका कड़ा विरोध किया और कहा कि ईरान पर प्रतिबंध जारी रखना अनिवार्य है ताकि उसे अपने परमाणु दायित्वों का पालन करने के लिए मजबूर किया जा सके। फ्रांस ने संकेत दिए कि वे प्रतिबंधों को लागू रखने के लिए अन्य विकल्पों पर विचार कर रहे हैं।
परमाणु कार्यक्रम को लेकर वैश्विक चिंताएं
ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय में चिंताएं बढ़ती जा रही हैं। जून 2025 में इजरायल और अमेरिका द्वारा किए गए हमलों के बाद से स्थिति और अधिक अस्पष्ट हो गई है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के अनुसार, वे इस बात की पुष्टि नहीं कर पा रहे हैं कि ईरान के पास मौजूद समृद्ध यूरेनियम के भंडार की वास्तविक स्थिति क्या है। रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के पास 440.9 किलोग्राम यूरेनियम है, जिसे 60 प्रतिशत तक शुद्ध किया गया है। यह स्तर परमाणु हथियार बनाने के लिए आवश्यक 90 प्रतिशत की शुद्धता के अत्यंत करीब माना जाता है।
क्या उत्तर कोरिया जैसा इतिहास दोहराया जा रहा है?
यह कोई पहली घटना नहीं है जब रूस ने प्रतिबंधों की निगरानी करने वाले पैनल का विरोध किया हो। मार्च 2024 में भी ऐसा ही हुआ था जब रूस के वीटो के कारण उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम पर नजर रखने वाले संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों का कामकाज ठप हो गया था। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि माली में भी इसी तरह से प्रतिबंधों की निगरानी समाप्त की जा चुकी है। वहीं, यमन और मध्य अफ्रीकी गणराज्य के मामलों में भी विशेषज्ञों की नियुक्तियों को लेकर गंभीर देरी और बाधाएं सामने आई हैं। ईरान के मामले में भी विशेषज्ञों का पैनल पिछले एक साल से मंजूरी के इंतजार में था, जिसे संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने प्रस्तावित किया था।
आगे की राह: क्या बनेगा नया विकल्प?
फ्रांस ने स्पष्ट किया है कि भले ही वर्तमान विशेषज्ञ पैनल का कार्यकाल समाप्त हो रहा हो, लेकिन ईरान पर प्रतिबंधों की निगरानी के लिए अन्य तरीके अपनाए जा सकते हैं। फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन और अमेरिका मिलकर एक नई स्वतंत्र निगरानी टीम गठित करने पर विचार कर रहे हैं। उत्तर कोरिया के मामले में भी ठीक इसी प्रकार के वैकल्पिक तरीके अपनाए गए थे। रूस और चीन के वीटो ने यह साफ कर दिया है कि ईरान को लेकर वैश्विक शक्तियों के बीच मतभेद गहरे हो चुके हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सुरक्षा परिषद से बाहर निकलकर अमेरिका और उसके सहयोगी ईरान पर किस प्रकार का दबाव बनाए रखते हैं।
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