नैनीताल के पास छिपी है रंग बदलने वाली यह अनोखी झील, खुद जिम कॉर्बेट भी थे इसकी प्राकृतिक खूबसूरती के कायल जीवनशैली 3 घंटे पहले 4
उत्तराखंड के नैनीताल से महज 12 किलोमीटर दूर स्थित खुर्पाताल झील अपनी प्राकृतिक सुंदरता और जादुई रूप से बदलते रंगों के लिए जानी जाती है, जिससे शिकारी और लेखक जिम कॉर्बेट का भी गहरा लगाव था।

नैनीताल को झीलों की नगरी कहा जाता है, जहां हर साल लाखों सैलानी घूमने आते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसी नैनीताल की हलचल और भारी भीड़भाड़ से थोड़ी ही दूरी पर एक ऐसी शांत और रहस्यमयी जगह मौजूद है, जो अपनी खूबसूरती से किसी का भी दिल जीत सकती है? हम बात कर रहे हैं खूबसूरत पहाड़ी झील खुर्पाताल की। नैनीताल जिला मुख्यालय से लगभग 12 किलोमीटर दूर पहाड़ों और घने जंगलों के बीच बसी यह झील प्रकृति प्रेमियों के लिए किसी जन्नत से कम नहीं है। विशेष रूप से मानसून के मौसम में इस जगह की सुंदरता कई गुना बढ़ जाती है। इस झील की सबसे बड़ी खासियत इसका बदलता हुआ रंग है, जो इसे उत्तराखंड की बाकी झीलों से पूरी तरह अलग और अनोखा बनाता है।

झील के बदलते रंगों का क्या है रहस्य?

खुर्पाताल की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसका पानी हमेशा एक जैसा नहीं रहता। इस झील के पानी का रंग कभी गहरा हरा, कभी हल्का लाल, तो कभी एकदम धानी नजर आता है। इस अद्भुत नजारे को देखकर यहां आने वाले पर्यटक हैरान रह जाते हैं। जानकारों और पर्यावरणविदों के अनुसार, झील के पानी के रंग में होने वाले इस बदलाव के पीछे कई प्राकृतिक और वैज्ञानिक कारण जिम्मेदार हैं। पानी की रंगत मुख्य रूप से मौसम की स्थिति, सूर्य की किरणों के कोण, आसपास की घनी वनस्पतियों की छाया और पानी के भीतर मौजूद जैविक तत्वों पर निर्भर करती है। इसके अलावा, जब पहाड़ों से बारिश का ताजा पानी बहकर इस झील में पहुंचता है, तो इसकी पारदर्शिता और रंग में उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिलता है।

स्थानीय मान्यताएं और अनसुलझी पहेलियां

वैज्ञानिक कारणों से इतर, खुर्पाताल के बदलते रंगों को लेकर स्थानीय निवासियों के बीच कई तरह की पौराणिक और पारंपरिक मान्यताएं भी प्रचलित हैं। यहां के स्थानीय लोग झील के बदलते रंगों को भविष्य में होने वाली अच्छी या बुरी घटनाओं का संकेत मानते हैं।

  • लाल रंग: स्थानीय लोक मान्यताओं के अनुसार, यदि झील के पानी का रंग हल्का लाल दिखाई देने लगे, तो इसे किसी आने वाली आपदा या संकट का सूचक माना जाता है।
  • धानी और हरा रंग: इसके विपरीत, जब झील का पानी चमकीला धानी या हरा दिखाई देता है, तो इसे क्षेत्र के लिए सुख, समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है।

हालांकि, इन मान्यताओं का कोई ठोस वैज्ञानिक आधार नहीं है, लेकिन ये कहानियां और रहस्य पर्यटकों के मन में इस जगह को लेकर उत्सुकता और बढ़ा देते हैं।

मार्च और अप्रैल में धानी रंगत और इसके वैज्ञानिक कारण

यदि आप इस झील के सबसे मनमोहक रंग को देखना चाहते हैं, तो मार्च और अप्रैल के महीने में यहां आ सकते हैं। वसंत ऋतु के इस समय में झील का पानी बेहद खूबसूरत धानी हरे रंग का दिखाई देता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इस अवधि में झील के आसपास के पेड़ों, विशेष रूप से चीड़ (पाइन) के जंगलों से गिरने वाले फूल और परागकण पानी की सतह पर तैरने लगते हैं। इसके साथ ही, झील के भीतर मौजूद विभिन्न प्रकार की शैवाल यानी एल्गी भी इस मौसम में तेजी से पनपती हैं।

जब सूर्य का प्रकाश पानी के भीतर मौजूद इन शैवालों पर पड़ता है, तो प्रकाश के परावर्तन के कारण पानी का रंग हरा या धानी दिखाई देने लगता है। शैवाल की मात्रा, पानी की गहराई और मौसम की परिस्थितियां मिलकर इस प्राकृतिक चमत्कार को जन्म देती हैं, जिसे लोग बड़े कौतूहल से देखते हैं।

'खुर्पाताल' नाम पड़ने के पीछे की भौगोलिक बनावट

इस झील का नाम 'खुर्पाताल' क्यों पड़ा, इसके पीछे भी एक दिलचस्प भौगोलिक कारण है। स्थानीय जानकारों के अनुसार, जब आप इस झील को ऊंचाई से या एक विशेष कोण से देखते हैं, तो इसका आकार गाय के पैर के खुर जैसा दिखाई देता है। कुमाऊँनी और हिंदी भाषा में खुर के आकार की वजह से ही इसे 'खुर्पाताल' नाम दिया गया है। चारों तरफ से ऊंचे और हरे-भरे पहाड़ों से घिरी यह झील देखने में अत्यंत मनमोहक लगती है। यहां का शांत वातावरण और चारों तरफ फैली प्राकृतिक नीरवता इसे नैनीताल के आसपास के सबसे बेहतरीन ऑफबीट पर्यटन स्थलों में से एक बनाती है।

प्रसिद्ध शिकारी और लेखक जिम कॉर्बेट भी थे इसके दीवाने

खुर्पाताल का ऐतिहासिक और साहित्यिक महत्व भी कम नहीं है। भारत के प्रसिद्ध शिकारी, पर्यावरणविद् और लेखक जिम कॉर्बेट का इस खूबसूरत जगह से गहरा नाता था। बताया जाता है कि जिम कॉर्बेट को इस शांत घाटी की प्राकृतिक सुंदरता बहुत पसंद थी। वे जब भी नैनीताल से रामनगर की यात्रा पर निकलते थे, तो रास्ते में इस स्थान पर रुकना और समय बिताना कभी नहीं भूलते थे। जिम कॉर्बेट ने अपनी आत्मकथा और कई लेखों में भी खुर्पाताल की शांति और इसके अद्भुत नजारों का विशेष रूप से उल्लेख किया है। इस ऐतिहासिक जुड़ाव के कारण इतिहास और वन्यजीव प्रेमियों के लिए भी यह जगह बेहद खास बन जाती है।

मानसून में बिखरती है यहां की असली खूबसूरती

वैसे तो खुर्पाताल साल भर बेहद खूबसूरत नजर आता है, लेकिन मानसून के दौरान यहां का नजारा पूरी तरह से बदल जाता है। बारिश की बूंदें गिरते ही पहाड़ों पर जमी धूल साफ हो जाती है और चारों तरफ मखमली हरियाली की चादर बिछ जाती है। इस मौसम में बादलों का पहाड़ों के बीच लुका-छिपी खेलना और झील के शांत पानी पर बादलों का प्रतिबिंब देखना एक जादुई अनुभव कराता है। पहाड़ियों से कल-कल करते हुए झरने और छोटी धाराएं इस झील में आकर मिलती हैं, जिससे पानी का स्तर बढ़ जाता है। फोटोग्राफी के शौकीनों और प्रकृति प्रेमियों के लिए मानसून का समय खुर्पाताल की असली खूबसूरती को कैमरे में कैद करने का सबसे बेहतरीन मौका होता है।

पर्यटन के साथ संरक्षण की बड़ी चुनौती

खुर्पाताल की बढ़ती लोकप्रियता के साथ ही अब इसके संरक्षण को लेकर भी चिंताएं सामने आने लगी हैं। स्थानीय निवासियों और पर्यावरणविदों का मानना है कि इस संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने के लिए कड़े कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। पर्यटन गतिविधियों के बढ़ने से इस शांत क्षेत्र पर दबाव बढ़ रहा है।

पहाड़ी क्षेत्रों में कचरा प्रबंधन एक बड़ी समस्या बनता जा रहा है। ऐसे में यह बेहद जरूरी है कि यहां आने वाले पर्यटक जिम्मेदार पर्यटन की आदत डालें। झील के आसपास प्लास्टिक और कूड़ा-कचरा न फैलाना, पानी को प्रदूषित न करना और प्राकृतिक वनस्पतियों को नुकसान न पहुंचाना हम सभी की जिम्मेदारी है। केवल एक जागरूक और जिम्मेदार दृष्टिकोण ही इस अद्वितीय और रंग बदलने वाली झील की अनमोल विरासत को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रख सकता है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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