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एक घंटा पहले
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इजरायल का हमला और बदलते रणनीतिक संकेत
सीरिया में इजरायल द्वारा हाल ही में किए गए हवाई हमलों ने न केवल एक महत्वपूर्ण एयरबेस को क्षति पहुंचाई है, बल्कि पूरे मध्य पूर्व के रणनीतिक मानचित्र पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। 18 अगस्त को उत्तर-पश्चिमी सीरिया स्थित अबू अल-दुहूर एयरबेस पर इजरायल की ओर से आठ हवाई हमले किए गए। यह सैन्य कार्रवाई ऐसे दौर में हुई है, जब सीरिया में सरकार बदलने के बाद अमेरिका के साथ उसके संबंधों में सुधार के संकेत मिल रहे थे। हालांकि, अमेरिका इजरायल के इस कदम से स्पष्ट रूप से असहज नजर आ रहा है। इस पूरी घटना के बाद जो सबसे बड़ा विकास हुआ, वह यह है कि हमले के ठीक अगले ही दिन सीरिया के विदेश मंत्री पाकिस्तान की यात्रा पर पहुंच गए। यह दौरा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हाल ही में पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब ने मिलकर एक रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 'इस्लामिक NATO' की संज्ञा दी जा रही है। इस नए गठबंधन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें शामिल किसी भी देश पर हमला होने की स्थिति में, इसे सभी सदस्यों पर हमला माना जाएगा। यही कारण है कि अब दुनिया भर में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या इजरायल का यह हमला अनजाने में सीरिया को इस नए सैन्य गठबंधन की ओर धकेल रहा है। यद्यपि सीरिया के इस संगठन में शामिल होने को लेकर अभी तक कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन इन घटनाओं की टाइमिंग ने कई कयासों को जन्म दिया है।
तुर्की सीमा और सैन्य दावे का विवाद
जिस अबू अल-दुहूर एयरबेस को निशाना बनाया गया, वह तुर्की की सीमा से महज 70 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इजरायली पक्ष का तर्क है कि सीरिया वहां तुर्की के सैनिकों की तैनाती की अनुमति देकर सुरक्षा के नाजुक संतुलन को बिगाड़ने की कोशिश कर रहा था। दूसरी ओर, तुर्की ने इन दावों को पूरी तरह खारिज किया है। मिडिल ईस्ट आई की एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, सीरियाई अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि वहां तुर्की की कोई सैन्य टीम तैनाती के इरादे से नहीं गई थी। उनका कहना है कि वे विशेषज्ञ केवल रनवे और कंट्रोल टावर की मरम्मत के लिए वहां पहुंचे थे। सीरियाई सूत्रों का दावा है कि तकनीकी टीम इस हमले से दो दिन पहले ही वहां से वापस जा चुकी थी। इस प्रकार, इजरायल जिस संभावित खतरे को आधार बनाकर हमले को सही ठहरा रहा है, उसे सीरिया और तुर्की दोनों ही सिरे से नकार रहे हैं।
मक्का समझौते से बढ़ी बेचैनी
इस हमले के समय पर गौर करना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि 7 अगस्त को मक्का में एक महत्वपूर्ण रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच हुए इस समझौते का मुख्य उद्देश्य रक्षा सहयोग, संयुक्त सैन्य अभ्यास और सैन्य उद्योग में साझा उन्नति करना है। इस समझौते की सबसे चर्चित शर्त यह है कि तीनों देशों में से किसी एक पर हमला शेष दो देशों पर हमले के समान माना जाएगा। हालांकि तुर्की ने यह स्पष्ट किया है कि यह समझौता किसी विशिष्ट देश, जैसे ईरान या इजरायल को अपना दुश्मन नहीं मानता, लेकिन इसकी धमक रणनीतिक तौर पर महसूस की जा रही है। तुर्की सीरिया के नए नेतृत्व का सबसे प्रमुख क्षेत्रीय समर्थक बनकर उभरा है और वहां के सैन्य ढांचे को पुनर्गठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। ऐसे में सीरिया पर हुआ इजरायली हमला सीधे तौर पर तुर्की के बढ़ते प्रभाव को चुनौती देने के रूप में देखा जा रहा है।
पाकिस्तान का दौरा और कूटनीतिक रुख
सीरिया के विदेश मंत्री असद हसन अल-शैबानी 19 और 20 अगस्त को पाकिस्तान के आधिकारिक दौरे पर हैं। उन्हें पाकिस्तान के उपप्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने विशेष रूप से आमंत्रित किया है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2007 के बाद यह किसी सीरियाई विदेश मंत्री की पहली पाकिस्तान यात्रा है। साथ ही, असद शासन के पतन के बाद दमिश्क में बनी नई सरकार के किसी विदेश मंत्री का यह पहला विदेश दौरा है। दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने, आपसी सहयोग और विभिन्न क्षेत्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर गंभीरता से चर्चा की जा रही है। सबसे गौर करने वाली बात यह है कि इजरायल द्वारा सीरियाई एयरबेस पर हमले के अगले ही दिन पाकिस्तान ने आधिकारिक रूप से इसकी कड़ी निंदा की। पाकिस्तान ने इस हमले को अंतरराष्ट्रीय कानून का सरासर उल्लंघन और क्षेत्रीय शांति व स्थिरता के लिए बड़ा खतरा करार दिया है।
अमेरिका की चिंता और भविष्य की दिशा
इस पूरे मामले में अमेरिका का रुख भी काफी मायने रखता है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सीरिया दूत और तुर्की में अमेरिकी राजदूत टॉम बराक ने इजरायल के हमले को बिना वजह का तनाव बढ़ाने वाला कदम बताया है। बराक के अनुसार, ऐसी सैन्य कार्रवाई क्षेत्रीय स्थिरता लाने के बजाय उसे और अधिक बिगाड़ने का काम करती है। अमेरिका अब एक ऐसे कूटनीतिक तंत्र को विकसित करने की कोशिश में जुटा है, जिससे इजरायल, तुर्की और सीरिया के बीच किसी भी सैन्य टकराव की स्थिति में संवाद के रास्ते खुले रहें। बराक ने यह भी कहा कि हमले के समय तुर्की को पूर्व में कोई सूचना नहीं दी गई थी, जिससे एक ऐसी जोखिम भरी स्थिति बन सकती थी जहां तुर्की के विमान इसे अपने खिलाफ मानकर जवाबी कार्रवाई का फैसला ले लेते। अमेरिका इस बात को लेकर विशेष रूप से चिंतित है कि तुर्की पर हुआ कोई भी हमला नाटो के चार्टर के तहत एक सदस्य देश पर हमले के रूप में देखा जा सकता था। क्या सीरिया भविष्य में इस्लामिक NATO का हिस्सा बनेगा, यह तो समय ही बताएगा, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में इजरायल का हमला अनजाने में उसी रणनीतिक गुटबंदी को मजबूत करता दिख रहा है, जिससे बचने की कोशिश में इजरायल लगातार सैन्य हस्तक्षेप कर रहा है।
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