नर्सरी में पौधों के ऊपर क्यों लगी होती है ग्रीन नेट, जानिए इसके पीछे का असली कारण और फायदे जीवनशैली एक घंटा पहले 2
नर्सरी में इस्तेमाल होने वाली हरी जाली पौधों के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम करती है। यह न केवल चिलचिलाती धूप से बचाव करती है, बल्कि पौधों को तेज हवा, ओलावृष्टि और पानी की कमी जैसी समस्याओं से भी बचाकर उनकी ग्रोथ में मदद करती है।

नर्सरी में ग्रीन नेट का महत्व

अगर आपने कभी किसी नर्सरी का दौरा किया है, तो आपने गौर किया होगा कि वहां पौधों को एक विशेष प्रकार की हरे रंग की जाली के नीचे रखा जाता है, जिसे ग्रीन नेट या शेड नेट कहा जाता है। आम तौर पर लोग इसे केवल धूप रोकने वाली एक साधारण चीज मान लेते हैं, लेकिन बागवानी के जानकारों के अनुसार, यह पौधों की सेहत और उनकी सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है। बदलते मौसम के मिजाज और खराब होती जलवायु के बीच, ग्रीन नेट किसी जादुई कवच से कम नहीं है। यह तकनीक न केवल छोटे बगीचों के लिए बल्कि बड़े स्तर पर व्यावसायिक खेती और नर्सरियों के लिए भी अनिवार्य हो गई है।

पौधों के लिए सुरक्षा कवच

ऋषिकेश के रहने वाले गार्डनर राम सागर का मानना है कि ग्रीन नेट का उपयोग पौधों के जीवनचक्र को बेहतर बनाने में एक बड़ी भूमिका निभाता है। यह न केवल सूरज की तपिश से पौधों को बचाती है, बल्कि कई प्राकृतिक आपदाओं जैसे कि ओलावृष्टि, तेज आंधी और मूसलाधार बारिश से भी पौधों की सुरक्षा करती है। अक्सर खराब मौसम के कारण पौधों की नाजुक टहनियां टूट जाती हैं या पत्तियां खराब हो जाती हैं, लेकिन ग्रीन नेट इन जोखिमों को प्रभावी तरीके से कम कर देती है। यही कारण है कि किसी भी नर्सरी में तैयार किए जा रहे छोटे और कोमल पौधों को विशेष रूप से ग्रीन नेट के साये में ही रखा जाता है।

तेज धूप और हीट स्ट्रेस से बचाव

गर्मियों के दौरान सूरज की किरणें इतनी तीव्र हो जाती हैं कि पौधों की पत्तियां झुलसने लगती हैं और उनकी विकास प्रक्रिया रुक जाती है। ग्रीन नेट का मुख्य काम सूर्य की हानिकारक और तेज किरणों को फिल्टर करना है। यह जाली सूरज की रोशनी को छनकर पौधों तक पहुंचाती है, जिससे पौधों को उनकी आवश्यकता के अनुसार ही रोशनी मिलती है। इससे पौधों पर पड़ने वाला हीट स्ट्रेस काफी हद तक कम हो जाता है, जिससे वे लंबे समय तक हरे-भरे और स्वस्थ बने रहते हैं।

तापमान नियंत्रण और पानी की बचत

ग्रीन नेट के नीचे का वातावरण सामान्य खुली जगह की तुलना में अधिक ठंडा और अनुकूल होता है। यह नियंत्रित तापमान पौधों की जड़ों को फैलने और विकसित होने के लिए एक बेहतर वातावरण प्रदान करता है। विशेष रूप से टमाटर, मिर्च, धनिया, पालक और लेट्यूस जैसी नाजुक सब्जियों के लिए यह तकनीक रामबाण साबित होती है। इसके अलावा, ग्रीन नेट मिट्टी की नमी को उड़ने से रोकती है। वाष्पीकरण की दर कम होने के कारण गमलों या क्यारियों की मिट्टी में नमी लंबे समय तक बनी रहती है। इसका सीधा फायदा यह है कि आपको बार-बार पौधों को पानी देने की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे पानी की भारी बचत होती है। पानी की कमी वाले इलाकों में यह तकनीक अत्यंत उपयोगी साबित हो रही है।

सही नेट का चुनाव कैसे करें

ग्रीन नेट का लाभ उठाने के लिए सही शेड का चुनाव करना बेहद महत्वपूर्ण है। बाजार में अलग-अलग घनत्व वाली नेट उपलब्ध होती हैं। आपको अपने पौधों की जरूरत के हिसाब से सही विकल्प चुनना चाहिए। आमतौर पर निम्नलिखित प्रतिशत वाली नेट का उपयोग किया जाता है:

  • 35 प्रतिशत शेड नेट: कम धूप चाहने वाले पौधों के लिए उपयुक्त।
  • 50 प्रतिशत शेड नेट: सामान्य पौधों और सब्जियों के लिए सबसे अधिक इस्तेमाल की जाने वाली।
  • 75 प्रतिशत शेड नेट: बहुत तेज धूप वाले इलाकों में या उन पौधों के लिए जो कम रोशनी में पनपते हैं।

यदि आप जरूरत से ज्यादा घनी नेट लगा देते हैं, तो पौधों तक पर्याप्त रोशनी नहीं पहुंच पाएगी और उनकी ग्रोथ पर नकारात्मक असर पड़ेगा। वहीं, यदि बहुत हल्की नेट का चुनाव किया जाता है, तो वह चिलचिलाती धूप से पौधों को पर्याप्त सुरक्षा नहीं दे पाएगी। इसलिए, अपनी स्थानीय जलवायु और पौधे की किस्म को समझकर ही सही प्रतिशत वाली ग्रीन नेट का चयन करना समझदारी है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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