नागपंचमी पर बरसेगा संतान सुख का आशीर्वाद, खरगोन के इस प्राचीन मंदिर में साक्षात विराजमान हैं भिलट देव धर्म एक घंटा पहले 5
खरगोन का नागलवाड़ी भिलट मंदिर नागपंचमी के अवसर पर भक्तों की आस्था का बड़ा केंद्र बन जाता है, जहां संतान प्राप्ति की मन्नत लेकर लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं।

नागपंचमी और आस्था का संगम

पूरे भारतवर्ष में नागपंचमी का पर्व अत्यंत हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस वर्ष 17 अगस्त को नागपंचमी का पावन पर्व पड़ रहा है, जिसे लेकर तैयारियां जोरों पर हैं। इस दिन खरगोन जिले के विभिन्न नाग और भिलट मंदिरों में भक्तों का तांता लगना शुरू हो जाता है। विशेष रूप से जिले की सीमा पर सतपुड़ा पर्वत की ऊंची चोटियों पर स्थित नागलवाड़ी भिलट मंदिर इस दिन श्रद्धालुओं के लिए मुख्य आकर्षण का केंद्र रहता है। निमाड़ अंचल के सबसे प्रमुख धार्मिक स्थलों में गिने जाने वाले इस मंदिर में मध्य प्रदेश के अलावा महाराष्ट्र और आसपास के अन्य राज्यों से भी लाखों की संख्या में भक्त अपनी मनोकामनाएं लेकर पहुंचते हैं। ऐसी मान्यता है कि यहां भिलट देव साक्षात रूप में उपस्थित होकर अपने भक्तों की हर पुकार सुनते हैं और उन्हें कष्टों से मुक्ति दिलाते हैं।

शिखर धाम के नाम से विख्यात है मंदिर

यह धार्मिक स्थल शिखर धाम के नाम से भी प्रसिद्ध है। इस मंदिर का इतिहास काफी पुराना है, जो लगभग 800 साल गौरवशाली गाथाओं को समेटे हुए है। इस स्थान को भिलट देव की मुख्य कर्मभूमि के रूप में जाना जाता है। नागपंचमी के मौके पर तड़के सुबह से ही यहां भक्तों की लंबी कतारें लगनी शुरू हो जाती हैं और मंदिर परिसर में एक विशाल मेले का भी आयोजन किया जाता है। अनुमान के अनुसार, इस पर्व के दौरान लगभग 8 से 10 लाख श्रद्धालु दर्शन करने और मेले का आनंद लेने के लिए यहां पहुंचते हैं। भक्तों का अटूट विश्वास है कि यदि कोई निःसंतान दंपति यहां आकर सच्चे मन से मन्नत मांगता है, तो भगवान के आशीर्वाद से उसकी गोद जरूर भरती है और घर में खुशियों की किलकारियां गूंजती हैं।

800 साल पुराना है इतिहास

मंदिर के पुजारी राजेंद्र बाबा के अनुसार, भिलट देव मंदिर का इतिहास करीब 800 वर्ष पुराना है। प्राचीन ग्रंथों और मान्यताओं के अनुसार, भिलट देव का जन्म विक्रम संवत 1220 में मध्य प्रदेश के हरदा जिले में हुआ था। नागलवाड़ी को उनकी साधना और कर्म की भूमि माना जाता है। उन्हें नाग देवता का ही एक अवतार माना जाता है, इसीलिए नागपंचमी के दिन यहां पूजा-अर्चना और अनुष्ठान का विशेष महत्व बताया गया है।

शिव की तपस्या से जुड़ी कथा

भिलट देव के जन्म के पीछे की कथा अत्यंत रोचक है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मेंदाबाई और रेलन नाम के एक दंपति ने संतान प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी श्रद्धा से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति का वरदान दिया। हालांकि, वह बालक सांसारिक रूप में उनके पास अधिक समय तक नहीं रह सका। कथा के अनुसार, जन्म के कुछ समय बाद ही भगवान शिव उस बालक को अपने साथ ले गए और उनकी जगह पर एक टोकरी में सांप रख दिया। दंपति ने उस सांप को ही अपना पुत्र मानकर पूरी श्रद्धा के साथ पालन-पोषण और पूजा शुरू कर दी। तभी से भिलट देव को नाग देवता के स्वरूप में पूजने की परंपरा चली आ रही है।

संतान सुख के लिए मन्नत

क्षेत्र में भिलट देव को 'वरदानी बाबा' के रूप में जाना जाता है। मंदिर में संतान सुख की मन्नत लेकर पहुंचने वाले दंपतियों का तांता लगा रहता है। जो भक्त अपनी मन्नत पूरी होने के बाद फिर से दर्शन करने आते हैं, वे अक्सर अपनी संतान का तुलदान करके बाबा के प्रति आभार व्यक्त करते हैं। यही कारण है कि नागपंचमी के अवसर पर यहां आने वाले लोगों में उन दंपतियों की संख्या काफी अधिक होती है जो नई आशाओं के साथ बाबा की शरण में पहुंचते हैं और पूरी श्रद्धा के साथ माथा टेकते हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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