पश्चिमी प्रशांत महासागर से हटा अमेरिका का घातक युद्धपोत, चीन को मिली रणनीतिक बढ़त विश्व 3 घंटे पहले 6
ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने अपने सबसे शक्तिशाली युद्धपोत यूएसएस जॉर्ज वाशिंगटन को प्रशांत महासागर से हटाकर मिडिल ईस्ट भेजने का निर्णय लिया है, जिससे इस क्षेत्र में सुरक्षा का संकट खड़ा हो गया है और चीन इसका फायदा उठाने की कोशिश में है।

मिडिल ईस्ट में उलझी अमेरिकी नौसेना

अमेरिकी नौसेना इस समय अपनी ही नीतियों और वैश्विक चुनौतियों के जाल में बुरी तरह फंसती नजर आ रही है। ईरान के साथ छिड़े तनाव के कारण अमेरिका को मिडिल ईस्ट में अपनी सैन्य ताकत को बढ़ाना पड़ रहा है, जिसका सीधा असर उसके वैश्विक रक्षा संतुलन पर पड़ा है। इस मजबूरी में अमेरिकी नौसेना ने पश्चिमी प्रशांत महासागर से अपने सबसे घातक एयरक्राफ्ट कैरियर यूएसएस जॉर्ज वाशिंगटन को हटाने का अप्रत्याशित फैसला लिया है। यह जहाज अब मध्य पूर्व में तैनात यूएसएस एब्राहम लिंकन की जगह लेगा। इस रणनीतिक फेरबदल ने न केवल एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में सुरक्षा का एक बड़ा रिक्त स्थान पैदा कर दिया है, बल्कि अमेरिका के सहयोगी देशों में भी गहरी चिंता पैदा कर दी है।

चीन के लिए खुला बड़ा अवसर

वाशिंगटन के इस कदम को रणनीतिक विशेषज्ञ चीन के लिए एक सुनहरे मौके के रूप में देख रहे हैं। चीन हमेशा से पश्चिमी प्रशांत महासागर में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति को अपने विस्तारवाद में सबसे बड़ी बाधा मानता रहा है। अब जब अमेरिका का ध्यान मिडिल ईस्ट में भटक गया है, तो चीन के पास अपनी धमक दिखाने का मौका मिल गया है। हालांकि अमेरिकी अधिकारी इसे केवल एक अस्थायी बदलाव बता रहे हैं और जल्द ही अन्य जहाजों की तैनाती का वादा कर रहे हैं, लेकिन रक्षा विशेषज्ञ इसे वाशिंगटन की विवशता मान रहे हैं। चीन इस अवसर का लाभ उठाकर जापान, फिलीपींस और इंडोनेशिया जैसे देशों पर अपना मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ा रहा है, ताकि वह यह संदेश दे सके कि प्रशांत क्षेत्र में अब अमेरिका नहीं, बल्कि बीजिंग का प्रभुत्व है।

सहयोगी देशों की बढ़ती चिंता

इस पूरे बदलाव के बीच अमेरिका के एशियाई सहयोगी देश खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे हैं। सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के विशेषज्ञ ग्रेग पोलिंग का मानना है कि अमेरिका की आधिकारिक नीति में प्रशांत महासागर को सबसे महत्वपूर्ण बताया जाता है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के इस फैसले से जापान और फिलीपींस जैसे देशों को लग रहा है कि संकट के समय वाशिंगटन उन्हें अकेला छोड़ सकता है। चीन इसी घबराहट का फायदा उठाकर अपनी सैन्य गतिविधियों को तेज कर रहा है, जिसमें हाल ही में साउथ चाइना सी के विवादित स्कारबोरो शोल के पास किया गया युद्धाभ्यास और जापान के ओकिनोटोरी द्वीप के पास मिसाइल परीक्षण शामिल हैं।

अमेरिकी बेड़े पर रिकॉर्ड दबाव

अमेरिकी नौसेना के लिए यह संकट रातों-रात पैदा नहीं हुआ है। इसके पीछे जहाजों और सैनिकों पर लंबे समय से पड़ा अत्यधिक बोझ एक बड़ा कारण है। यूएसएस एब्राहम लिंकन ने समुद्र में लगातार 240 से ज्यादा दिन बिताए हैं, जो अपने आप में एक इतिहास है। लंबे समय तक तैनाती के कारण न केवल सैनिकों की मानसिक स्थिति पर विपरीत असर पड़ा है, बल्कि रसद, ईंधन और जरूरी हथियारों की भारी कमी भी सामने आई है। अमेरिकी संसद में भी डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने इन स्थितियों पर सवाल उठाते हुए जांच की मांग की है। विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार तैनाती से जहाजों की मरम्मत और रखरखाव में भी बड़ी तकनीकी बाधाएं आ रही हैं, जो आने वाले समय में अमेरिकी नौसेना की ताकत के लिए खतरा बन सकती हैं।

मेंटेनेंस और रसद का गहरा संकट

अमेरिकी नौसेना के सामने आ रहे इन संकटों को कुछ प्रमुख उदाहरणों से समझा जा सकता है। उदाहरण के तौर पर, यूएसएस जेराल्ड आर फोर्ड 11 महीने की रिकॉर्ड तैनाती के बाद मई के मध्य में घर लौटा था, जो वियतनाम युद्ध के बाद से किसी भी अमेरिकी विमानवाहक पोत की सबसे लंबी तैनाती थी। इस दौरान जहाज के भीतर कई तकनीकी खामियां देखी गईं। एक अन्य घटना में, ईरान विरोधी अभियानों के दौरान जहाज के लॉन्ड्री एरिया में आग लग गई थी, जिसके कारण इसे मरम्मत के लिए भूमध्य सागर वापस लौटना पड़ा था। इस आग ने सैकड़ों सैनिकों के रहने की जगह को भी प्रभावित किया था, जिससे युद्धपोत की परिचालन क्षमता पर सीधा असर पड़ा। ब्रायन क्लार्क जैसे रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका के पास कुल 11 एयरक्राफ्ट कैरियर हैं, लेकिन तैनाती के बढ़ते दबाव के कारण एक समय में चार-चार युद्धपोतों को मोर्चे पर रखने की स्थिति ने संसाधनों को निचोड़ कर रख दिया है।

सहयोगियों का मनोबल बढ़ाने की कोशिश

एशिया में अपनी गिरती साख और सहयोगियों के घटते भरोसे को थामने के लिए वाशिंगटन ने अपने शीर्ष सैन्य अधिकारियों को कूटनीतिक मोर्चे पर उतार दिया है। अमेरिकी स्पेशल ऑपरेशन्स कमांड के प्रमुख एडमिरल फ्रैंक ब्रैडली ने हाल ही में मनीला का दौरा किया और फिलीपींस को संयुक्त सैन्य अभ्यासों को और अधिक विस्तार देने का भरोसा दिलाया। हालांकि, कैटो इंस्टीट्यूट के नीति विश्लेषक इवान सैंकी का स्पष्ट मानना है कि एयरक्राफ्ट कैरियर केवल एक जहाज नहीं, बल्कि सहयोगियों के लिए एक मानसिक संबल का प्रतीक होते हैं। उनकी अनुपस्थिति सीधे तौर पर यह संदेश देती है कि अमेरिका मिडिल ईस्ट के युद्ध और भू-राजनीतिक उलझनों में बुरी तरह फंसा हुआ है, जिससे प्रशांत क्षेत्र में उसकी पकड़ कमजोर पड़ रही है। चीन इसे भली-भांति समझ रहा है और इसका भरपूर लाभ उठाकर ताइवान व अन्य पड़ोसी देशों के साथ अपनी आक्रामक नीति को और धार दे रहा है।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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