अफगानिस्तान में तालिबान के पांच साल पूरे होने पर दिल्ली में पहली बार हुआ विक्ट्री डे आयोजन राष्ट्रीय राजनीति 2 घंटे पहले 6
तालिबान के अफगानिस्तान की सत्ता में लौटने के पांच साल पूरे होने पर नई दिल्ली में पहली बार एक विशेष रिसेप्शन आयोजित किया गया, जिसमें भारत सरकार के प्रतिनिधि भी शामिल हुए।

दिल्ली में पहली बार तालिबान का विक्ट्री डे आयोजन

अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता वापसी को पांच साल बीत चुके हैं। इस मौके पर पहली बार भारत की राजधानी नई दिल्ली में विक्ट्री डे रिसेप्शन का आयोजन किया गया है। यह कार्यक्रम इस बात का संकेत है कि भारत और तालिबान के बीच कूटनीतिक स्तर पर बातचीत और संपर्क का दायरा लगातार बढ़ रहा है। कार्यक्रम की मेजबानी भारत में नियुक्त तालिबान के चार्ज डी'अफेयर्स नूर अहमद नूर ने की। इस आयोजन में भारतीय विदेश मंत्रालय के पाकिस्तान, अफगानिस्तान और ईरान (PAI) डिवीजन के संयुक्त सचिव एम. आनंद प्रकाश की उपस्थिति ने इस पूरे आयोजन को काफी महत्वपूर्ण बना दिया है।

कार्यक्रम में दिखी आधिकारिक भागीदारी

नई दिल्ली में आयोजित इस कार्यक्रम में न केवल तालिबान के वरिष्ठ प्रतिनिधि मौजूद थे, बल्कि अफगानिस्तान के मुंबई स्थित महावाणिज्यदूत डॉ. इकरामुद्दीन कामिल भी इसमें शामिल हुए। यह पहली बार है जब भारत की धरती पर तालिबान ने इतने बड़े स्तर पर अपनी सत्ता के पांच साल पूरे होने का जश्न मनाया है और इसमें भारत सरकार का आधिकारिक प्रतिनिधित्व भी देखने को मिला है। हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि भारत ने अभी तक तालिबान की सरकार को औपचारिक मान्यता नहीं दी है, लेकिन लगातार हो रही ये बैठकें दोनों देशों के बदलते संबंधों को दर्शाती हैं।

भारत और तालिबान के बीच बढ़ता संवाद

नूर अहमद नूर इसी साल जनवरी में नई दिल्ली पहुंचे थे। वे तालिबान के सत्ता में आने के बाद भारत में तैनात होने वाले पहले अधिकारी हैं। भारत आने के बाद से उन्होंने विदेश मंत्रालय के कई आला अधिकारियों के साथ मुलाकात की है, जिससे यह साफ होता है कि दोनों पक्षों के बीच संवाद अब एक नियमित प्रक्रिया बन गया है। विश्लेषकों का मानना है कि भारत के लिए अफगानिस्तान की सुरक्षा, क्षेत्रीय आतंकवाद पर लगाम और व्यापारिक कनेक्टिविटी जैसे मुद्दे प्राथमिकता हैं, जिसके लिए तालिबान के साथ संपर्क बनाए रखना आवश्यक है।

अफगानिस्तान का नया रुख: युद्ध से विकास की ओर

कार्यक्रम के दौरान नूर अहमद नूर ने अफगानिस्तान की मौजूदा स्थिति पर अपनी बात रखी। उन्होंने दावा किया कि अफगानिस्तान अब युद्ध के लंबे और विनाशकारी दौर से बाहर निकल चुका है। उनके अनुसार, पिछले पांच वर्षों में अफगानिस्तान के भीतर सुरक्षा व्यवस्था काफी मजबूत हुई है और देश स्थिरता की ओर बढ़ रहा है। नूर ने कहा कि तालिबान सरकार अब युद्ध के बजाय देश के पुनर्निर्माण, कानून व्यवस्था को दुरुस्त करने और आम नागरिकों को बेहतर जनसुविधाएं प्रदान करने पर पूरी तरह ध्यान केंद्रित कर रही है।

आर्थिक निवेश और क्षेत्रीय परियोजनाओं पर जोर

नूर अहमद नूर ने बताया कि अफगानिस्तान का लक्ष्य अब ऊर्जा, खनन, कृषि और परिवहन जैसे क्षेत्रों में अधिक से अधिक निवेश आकर्षित करना है। उन्होंने विशेष रूप से टीएपीआई और कासा-1000 जैसी क्षेत्रीय परियोजनाओं का उल्लेख किया, जिन्हें अफगानिस्तान की आर्थिक तरक्की के लिए रीढ़ बताया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि अफगानिस्तान की भौगोलिक स्थिति का उपयोग किसी विवाद या संघर्ष के लिए नहीं, बल्कि व्यापार और क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाने के लिए किया जाना चाहिए।

भारत के साथ रिश्तों की अहमियत

भारत के साथ संबंधों को लेकर नूर काफी सकारात्मक नजर आए। उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच संपर्क काफी बढ़ा है। उन्होंने माना कि राजनीतिक बातचीत और आर्थिक साझेदारी न केवल दोनों देशों के लिए, बल्कि पूरे क्षेत्र में शांति बनाए रखने के लिए अनिवार्य है। उन्होंने भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर और भारतीय नेतृत्व का आभार जताते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अफगानिस्तान के अधिकारों के समर्थन में भारत का रुख महत्वपूर्ण रहा है। नूर ने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में दोनों देशों के बीच सहयोग के नए आयाम खुलेंगे।

भारत के लिए क्यों जरूरी है यह संवाद

नई दिल्ली में इस रिसेप्शन का होना एक कूटनीतिक संदेश भी है। भारत के लिए अफगानिस्तान की स्थिति इसलिए मायने रखती है क्योंकि वहां का घटनाक्रम सीधे तौर पर भारत की सुरक्षा और मध्य एशिया तक पहुंच को प्रभावित करता है। तालिबान के लिए भी भारत जैसे बड़े क्षेत्रीय और लोकतांत्रिक देश के साथ संवाद बनाए रखना अपनी अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता और आर्थिक स्थिरता के लिए जरूरी है। इस आयोजन के माध्यम से दोनों पक्ष एक-दूसरे के करीब आने की कोशिश कर रहे हैं।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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