राष्ट्रीय राजनीति
एक महीने पहले
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विचारों
संसद में बड़ा सियासी तूफान आने के आसार
संसद का मानसून सत्र शुरू होने वाला है और इसके साथ ही देश की राजनीति में एक बड़े सियासी तूफान के संकेत मिल रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने विदेशी दौरों से लौटने के बाद अब पूरी तरह घरेलू मोर्चे पर ध्यान केंद्रित कर लिया है। खबर है कि सरकार इस सत्र के दौरान दो अत्यंत महत्वपूर्ण संशोधन विधेयक संसद में पेश कर सकती है। इसमें पहला महिला आरक्षण से जुड़ा है और दूसरा परिसीमन यानी डीलिमिटेशन से संबंधित है। परिसीमन के माध्यम से सरकार लोकसभा की सीटों को मौजूदा 543 से बढ़ाकर 815 से 850 के बीच ले जाने का लक्ष्य रखती है। इस कदम से देश के राजनीतिक मानचित्र में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
इंडी गठबंधन की बढ़ती चिंताएं
मोदी सरकार के इस मेगा प्लान की गूंज अभी से सुनाई देने लगी है। तीन महीने पहले इंडी गठबंधन के घटक दलों ने मिलकर सरकार के इस तरह के प्रयासों को रोकने में सफलता हासिल की थी, लेकिन इस बार समीकरण पूरी तरह बदलते हुए दिख रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी के रणनीतिकार अमित शाह और प्रधानमंत्री मोदी ने मिलकर पिछले तीन महीनों में पूरा खेल ही पलट दिया है। इंडी गठबंधन के कई प्रमुख नेता अब राहुल गांधी के साथ पूरी तरह खड़े रहने के बजाय अपने राजनीतिक हितों को प्राथमिकता दे रहे हैं। कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि कहीं शरद पवार की पार्टी और डीएमके जैसे दल मोदी सरकार को समर्थन न दे दें।
शरद पवार का स्टैंड और बदले समीकरण
राजनीति के अनुभवी खिलाड़ी माने जाने वाले शरद पवार के रुख में आए बदलाव ने विपक्ष में खलबली मचा दी है। सुप्रिया सुले ने परिसीमन बिल पर सीधे विरोध जताने के बजाय शर्तों के साथ समर्थन के संकेत दिए हैं। उन्होंने कहा है कि यदि सरकार इस बिल के साथ 50 प्रतिशत वाला फार्मूला लेकर आती है, तो उनकी पार्टी इस पर गंभीरता से विचार कर सकती है। गौरतलब है कि पिछली बार भी मोदी सरकार इसी 50 प्रतिशत फार्मूले के साथ आगे बढ़ी थी, जिसमें हर राज्य में आबादी के अनुपात में सीटों में वृद्धि का प्रावधान था। अमित शाह ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि वे इस पर लिखित आश्वासन देने को तैयार हैं। अब गेंद शरद पवार के पाले में है कि वे आगामी सत्र में क्या निर्णय लेते हैं।
दिल्ली से मुंबई तक बैठकों का दौर
बीते कुछ घंटों में हुई घटनाओं ने दिल्ली से लेकर मुंबई तक हलचल बढ़ा दी है। कल रात शरद पवार गुट के प्रदेश अध्यक्ष जयंत पाटिल ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात की। वहीं, एनसीपी के अन्य धड़े के नेताओं प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे ने भी मुख्यमंत्री के साथ अलग से बैठक की। दिल्ली में महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने अमित शाह से मुलाकात की, जिसमें उद्धव ठाकरे गुट के 6 बागी सांसद भी शामिल थे। इन बैठकों का उद्देश्य साफ है, राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करना और आगामी चुनावों की बिसात बिछाना। सूत्रों का कहना है कि इन नेताओं को पार्टी बदलने और भविष्य की संभावनाओं को लेकर ठोस आश्वासन दिए गए हैं।
परिसीमन की आवश्यकता और डेमोग्राफी का मुद्दा
मोदी सरकार परिसीमन को लेकर इतनी गंभीर क्यों है, इसके पीछे के गणित को समझना जरूरी है। वर्ष 1971 में देश की आबादी लगभग 55 करोड़ थी और लोकसभा सीटें अधिकतम 550 तय की गई थीं। तब एक सांसद औसतन 10 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता था। आज 2026 में आबादी बढ़कर 145 करोड़ के पार पहुँच चुकी है, जो कि 172 प्रतिशत की वृद्धि है। आज एक सांसद पर लगभग 26 लाख की आबादी का भार है। यह स्थिति बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में अधिक गंभीर है। सरकार का तर्क है कि बढ़ती आबादी के अनुरूप जनप्रतिनिधियों की संख्या बढ़ना अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त, सीमावर्ती इलाकों में डेमोग्राफी में आए बदलाव भी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक चिंता का विषय हैं, जिस पर अमित शाह ने हाल ही में उच्च स्तरीय समितियों और पुलिस अधिकारियों के साथ गहन चर्चा की है।
विपक्ष की रणनीति और चुनौतियां
कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने आशंका जताई है कि भाजपा शरद पवार की पार्टी और डीएमके को अपने साथ लाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने सोशल मीडिया पर एम. के. स्टालिन और सुप्रिया सुले को टैग करते हुए विपक्षी एकता बनाए रखने की अपील की है। कांग्रेस को डर है कि यदि ये दल भाजपा के पाले में चले गए, तो संविधान में बदलाव करने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत, यानी 360 सांसदों का आंकड़ा सरकार के लिए जुटाना आसान हो जाएगा। वर्तमान में एनडीए के पास 292 वोट हैं, और उसे लक्ष्य तक पहुँचने के लिए छोटे दलों जैसे वाईएसआरसीपी, वीसीके, आरएलपी और निर्दलीय सांसदों का समर्थन जुटाना होगा।
भविष्य के दो प्रमुख संशोधन बिल
सरकार की ओर से पेश किए जाने वाले संभावित विधेयकों में शामिल हैं:
- 130वां संशोधन बिल: इसमें प्रावधान है कि यदि किसी प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री पर आरोप लगने के बाद वे 30 दिन से ज्यादा जेल में रहते हैं, तो उन्हें पद से हटाया जा सकता है।
- 131वां संशोधन बिल: यह पहले से पारित 33 प्रतिशत महिला आरक्षण को परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ने वाला बिल है, जिससे लोकसभा सीटों की संख्या में बड़ी वृद्धि का मार्ग प्रशस्त होगा।
आगामी सत्र यह तय करेगा कि भारत की राजनीति आने वाले वर्षों में किस दिशा में बढ़ेगी। प्रधानमंत्री का यह मिशन न केवल प्रशासनिक सुधारों का है, बल्कि देश के राजनीतिक ढांचे को लंबे समय बाद नई पहचान देने का प्रयास भी है।
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