जानिए क्या है 'मुठ' परंपरा, धान की बुआई से पहले हर घर में क्यों निभाई जाती है यह सदियों पुरानी रस्म छत्तीसगढ़ एक घंटा पहले 2
छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में किसान धान की बुआई शुरू करने से पहले 'मूठ निकालने' की सदियों पुरानी परंपरा निभाते हैं, जिसमें शुभ मुहूर्त पर 5 मुट्ठी धान को हल्दी पानी से शुद्ध कर बांस की टोकरी में रखा जाता है।

छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में किसान आज भी सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार ही धान की फसल बोने की शुरुआत करते हैं। स्थानीय जानकारों के मुताबिक, गांव के लगभग हर घर में मानसून आने से पहले 'मुठ' निकाली जाती है। यह रिवाज प्रकृति और खेती दोनों के प्रति लोगों के गहरे लगाव को दर्शाता है। इसके लिए किसान शुभ मुहूर्त का इंतजार करते हैं और बांस से बनी टोकरी, जिसे आम बोलचाल की भाषा में 'मुर्री' कहा जाता है, का इस्तेमाल करते हैं। इसी मुर्री में 5 मुट्ठी धान रखकर सूर्योदय से पहले स्नान कर हल्दी पानी से उसका शुद्धिकरण किया जाता है, और इसी प्रक्रिया को 'मुठ निकालना' कहते हैं।

शुभ मुहूर्त में 5 मुट्ठी धान से होती है खेती की शुरुआत

सरगुजा समेत आसपास के ग्रामीण अंचलों में धान की खेती शुरू करने से पहले 'मूठ निकालने' की परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ निभाई जाती है। स्थानीय जानकार सिकंदर प्रजापति बताते हैं कि यह परंपरा उनके पूर्वजों और बुजुर्गों के समय से चली आ रही है, यही वजह है कि गांव के लोग आज भी इसे नहीं छोड़ते।

मूठ निकालने की प्रक्रिया में किसान सबसे पहले शुभ तिथि और मुहूर्त का चयन करते हैं। इसके बाद पुराने धान के बीज की पांच मुट्ठियां निकाली जाती हैं और इन बीजों को बांस से बनी विशेष टोकरी यानी मुर्री में रखा जाता है।

हल्दी से शुद्धिकरण के बाद खेत में होती है पहली बोनी

परंपरा के अनुसार किसान सुबह सूर्योदय से पहले स्नान करते हैं। इसके बाद मुर्री में रखे धान के बीजों पर हल्दी मिले पानी का छिड़काव कर उनका शुद्धिकरण किया जाता है। फिर किसान एक लोटा पानी और धान के बीज लेकर खेत पहुंचते हैं और वहां पहली बोनी करते हैं। इसी पूरी प्रक्रिया को 'मूठ निकालना' कहा जाता है।

मूठ निकलने के बाद ही शुरू होती है धान की बोनी

ग्रामीण मान्यता है कि मूठ निकालने के बाद ही धान की बोनी का काम शुरू किया जाता है। किसान इसे खेती के नए सीजन की शुभ शुरुआत मानते हैं। गांवों में आज भी लोग इस परंपरा का पालन करते हैं और इसे अच्छी फसल तथा समृद्धि से जोड़कर देखते हैं।

पूर्वजों की विरासत को सहेज रहे ग्रामीण

सिकंदर प्रजापति के मुताबिक यह केवल एक धार्मिक या सांस्कृतिक परंपरा भर नहीं, बल्कि पूर्वजों की विरासत है। यही कारण है कि आधुनिक खेती के दौर में भी ग्रामीण इसे पूरी आस्था के साथ निभा रहे हैं। उनका कहना है कि सरगुजा और बस्तर समेत देश के कई हिस्सों में ऐसी परंपराएं आज भी प्रचलित हैं, जो खेती और प्रकृति के प्रति लोगों के गहरे जुड़ाव को दर्शाती हैं।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

आपकी प्रतिक्रिया?


आपको यह भी पसंद आ सकता हैं

Comments

https://pabna.in/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!