राष्ट्रीय राजनीति
एक घंटा पहले
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सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
नवोदय विद्यालय की स्थापना को लेकर तमिलनाडु सरकार के अडियल रवैये पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जाहिर की है। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान राज्य सरकार को अपनी कार्यप्रणाली और सोच में बदलाव लाने की सख्त हिदायत दी है। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि यदि देश का हर राज्य केंद्र सरकार की नीतियों का विरोध करने लगेगा और उन्हें लागू करने से मना कर देगा, तो भारत का संघीय ढांचा पूरी तरह से बिखर जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने पहले दिए गए आदेश को वापस लेने का अनुरोध किया था। इसके बजाय, कोर्ट ने तमिलनाडु को राज्य के हर जिले में नवोदय विद्यालय के लिए जमीन की पहचान करने और उसे आवंटित करने हेतु तीन महीने का समय दिया है। यह कानूनी लड़ाई वर्ष 2017 के मद्रास हाई कोर्ट के फैसले के बाद से लगातार जारी है।
संघीय ढांचे पर सवाल
सुनवाई के दौरान अदालत का मुख्य जोर सहकारी संघवाद (को-ऑपरेटिव फेडरलिज्म) पर रहा। पीठ ने चिंता जताते हुए पूछा कि यदि भविष्य में केंद्र सरकार समवर्ती सूची के तहत कोई नीति तैयार करती है और राज्य सरकारें केवल अपनी मर्जी से उसे अपनाने से इनकार कर देती हैं, तो देश की शासन व्यवस्था कैसे चलेगी? जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि लोकतंत्र में यह आवश्यक है कि राज्य केंद्र के साथ मिलकर काम करें। राज्य को केंद्र से खुद को अलग-थलग नहीं मानना चाहिए। दिल्ली और चेन्नई के बीच संवाद का एक मजबूत और सकारात्मक पुल होना अनिवार्य है। कोर्ट का मानना है कि राज्य के मेधावी छात्रों को राष्ट्रीय स्तर की आधुनिक शिक्षण सुविधाओं से वंचित रखना किसी भी दृष्टि से तर्कसंगत नहीं है।
आदेश वापस लेने की मांग पर कोर्ट का रुख
तमिलनाडु की तरफ से पेश हुए सीनियर वकील जयदीप गुप्ता ने अदालत से 15 दिसंबर 2025 के उस आदेश को वापस लेने की गुहार लगाई, जिसमें राज्य के प्रत्येक जिले में छह हफ्ते के भीतर जमीन की तलाश पूरी करने को कहा गया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग को सिरे से ठुकरा दिया। पीठ ने स्पष्ट किया कि सरकार में बदलाव होने का मतलब यह नहीं है कि अदालत के आदेशों का महत्व खत्म हो जाए। कानूनी आदेश स्थिर रहते हैं और राजनीतिक समीकरण बदलने से अदालती निर्णयों के क्रियान्वयन पर कोई असर नहीं पड़ता है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जमीन अधिग्रहण और आवंटन की पूरी प्रक्रिया एक लंबित स्पेशल लीव पिटीशन के अंतिम निर्णय के अधीन रहेगी।
भाषा विवाद और शिक्षा नीति
तमिलनाडु में नवोदय विद्यालयों के विरोध के पीछे मुख्य कारण त्रि-भाषा फॉर्मूला रहा है। राज्य सरकार का यह तर्क रहा है कि इस व्यवस्था के माध्यम से उन पर हिंदी भाषा थोपी जा रही है। इस पर अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्य को अपनी मानसिकता बदलने की आवश्यकता है। अदालत ने पूछा कि क्या केवल इसलिए नवोदय विद्यालय नहीं खोले जाएंगे क्योंकि आप तमिलनाडु की भूमि पर हिंदी पढ़ाए जाने का विरोध कर रहे हैं? इस पर राज्य के वकील ने स्पष्ट किया कि तमिलनाडु हिंदी का विरोधी नहीं है और राज्य के कई शैक्षणिक संस्थानों में हिंदी का अध्ययन पहले से ही कराया जा रहा है। कोर्ट ने दोहराया कि नवोदय विद्यालय के आने से तमिलनाडु के उच्च शिक्षा के मानक और अधिक ऊंचे होंगे और इससे राज्य की शिक्षा प्रणाली कमजोर होने के बजाय और अधिक मजबूत होगी।
जमीन उपलब्ध कराने का जिम्मा
केंद्र सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने अदालत को आश्वस्त किया कि नवोदय विद्यालयों के निर्माण और संचालन से तमिलनाडु सरकार पर कोई भी अतिरिक्त वित्तीय भार नहीं पड़ेगा। केंद्र सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि राज्य सरकार को केवल जमीन उपलब्ध करानी है, जबकि शेष सारा खर्च केंद्र सरकार द्वारा उठाया जाएगा। अदालत ने दोनों पक्षों को आपसी समन्वय स्थापित कर भाषा से जुड़े संशय दूर करने की सलाह दी। पीठ ने कहा कि चेन्नई और दिल्ली के बीच किसी भी प्रकार का अलगाव नहीं होना चाहिए और दोनों पक्षों को गतिरोध खत्म करने के लिए मिल-जुलकर कदम उठाने चाहिए। इस पूरे मामले की अगली सुनवाई के लिए अदालत ने 14 दिसंबर की तारीख निर्धारित की है।
नवोदय विद्यालय बनाम तमिलनाडु का पुराना संघर्ष
नवोदय विद्यालय योजना की शुरुआत 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अंतर्गत की गई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों के प्रतिभाशाली बच्चों को बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराना है। विडंबना यह है कि तमिलनाडु देश का एकमात्र राज्य है जहाँ अभी तक एक भी नवोदय विद्यालय शुरू नहीं हो पाया है। राज्य दशकों से तमिल और अंग्रेजी की द्वि-भाषा नीति का पालन करता रहा है। तमिलनाडु की राजनीति में भाषा हमेशा से एक अत्यंत संवेदनशील और भावनात्मक मुद्दा रहा है। नवोदय विद्यालयों के ढांचे में कक्षा छह से आठ तक तीन भाषाएं पढ़ाई जाती हैं, जिनमें हिंदी एक अनिवार्य घटक है। इसी कारणवश तमिलनाडु की सरकारें लंबे समय से इस मॉडल को अपनाए जाने का विरोध करती रही हैं। वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े रुख ने राज्य सरकार के सामने एक बड़ी नीतिगत चुनौती पैदा कर दी है, जिसका समाधान अब संवैधानिक और कानूनी दायरे में ही खोजा जाना है।
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