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एक घंटा पहले
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सऊदी अरब को F-35 की आपूर्ति पर अमेरिका में हलचल
सऊदी अरब को 48 F-35 स्टील्थ फाइटर जेट मुहैया कराने की प्रस्तावित अमेरिकी योजना ने पेंटागन की रातों की नींद उड़ा दी है। इस डील के सामने आने के बाद से ही अमेरिकी सैन्य और खुफिया गलियारों में एक बड़ा डर बना हुआ है। चिंता का मुख्य विषय यह है कि यदि ये अत्याधुनिक लड़ाकू विमान रियाद को सौंपे जाते हैं, तो क्या इसकी सुरक्षा व्यवस्था और गोपनीय तकनीकी जानकारी सुरक्षित रह पाएगी। अमेरिकी रक्षा खुफिया एजेंसी यानी DIA के एक गुप्त आकलन में सऊदी अरब और चीन के बीच बढ़ रहे रक्षा और तकनीकी सहयोग को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं।
F-35 केवल एक विमान नहीं, तकनीक का जाल है
अमेरिकी विशेषज्ञों का मानना है कि F-35 को केवल एक लड़ाकू विमान के रूप में देखना एक भूल होगी। यह विमान अपनी अभूतपूर्व स्टील्थ डिजाइन, उन्नत रडार प्रणाली, सेंसर क्षमता और एआई आधारित डेटा एकीकरण के लिए जाना जाता है। अमेरिकी दस्तावेजों के अनुसार, इस विमान के कुछ हिस्से अत्यधिक संवेदनशील हैं, जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं:
- AN/APG-81 रडार सिस्टम।
- F135 इंजन तकनीक।
- अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम।
- लो-ऑब्जर्वेबल यानी अदृश्य तकनीक।
अमेरिका को डर है कि चीन इन तकनीकों को हासिल करने के लिए सऊदी अरब को एक माध्यम की तरह उपयोग कर सकता है। अगर यह जानकारी बीजिंग के पास पहुंची, तो यह न केवल अमेरिका के लिए रणनीतिक झटका होगा बल्कि वैश्विक सैन्य संतुलन को भी बिगाड़ सकता है।
चीन को मिल गया डेटा तो क्या होगा नुकसान?
चिंता यह नहीं है कि चीन सीधे तौर पर F-35 चुरा लेगा, बल्कि खतरा इससे कहीं अधिक गहरा और तकनीकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि विमान के रखरखाव, उसके पायलट प्रशिक्षण, कम्युनिकेशन नेटवर्क और सेंसर डेटा तक चीन की पहुंच होने से संवेदनशील जानकारी लीक हो सकती है। अमेरिकी फाइलों में चेतावनी दी गई है कि यदि किसी तकनीकी रूप से सक्षम दुश्मन को विमान के हार्डवेयर या सॉफ्टवेयर की कार्यप्रणाली समझ आ गई, तो वह इसके विरुद्ध काउंटरमेजर विकसित करने में सक्षम हो जाएगा। इसका अर्थ यह है कि चीन को विमान की नकल करने की आवश्यकता नहीं होगी, बल्कि वह उसे निष्क्रिय करने की तकनीक तैयार कर लेगा, जिससे भविष्य की जंग में अमेरिका की यह सबसे बड़ी ताकत कमजोर पड़ सकती है।
सुरक्षा के दावे और जमीनी हकीकत
हालांकि पेंटागन का कहना है कि F-35 कार्यक्रम में पहले से ही साइबर सुरक्षा परीक्षण, सॉफ्टवेयर की कड़ी जांच और हर अनधिकृत गतिविधि पर नजर रखने के लिए तंत्र मौजूद हैं। लेकिन आलोचकों का तर्क है कि F-35 महज एक मशीन नहीं, बल्कि एक पूरा नेटवर्क है जिसमें डेटा और लॉजिस्टिक्स का ताना-बाना शामिल है। इतने बड़े नेटवर्क को बाहरी हस्तक्षेप से पूरी तरह सुरक्षित रखना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
हूतियों के दावे ने बढ़ाई चुनौती
इसी बीच, 16 सितंबर को यमन में एक बड़ी घटना की चर्चा है। हूतियों ने दावा किया है कि उन्होंने यमन के मारिब प्रांत के ऊपर सऊदी अरब के एक F-15 लड़ाकू विमान को मार गिराया है। हूती सैन्य प्रवक्ता के अनुसार, इस विमान को एक स्थानीय रूप से विकसित एयर-टू-एयर मिसाइल का उपयोग करके निशाना बनाया गया है। हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि अब तक नहीं हो पाई है और न ही सऊदी अरब की तरफ से कोई आधिकारिक बयान आया है, लेकिन इसने क्षेत्रीय सुरक्षा पर प्रश्न चिह्न लगा दिया है।
F-15 और F-35 में बुनियादी अंतर
विशेषज्ञों का कहना है कि F-15 का गिरना और F-35 के प्रति डर दो अलग स्थितियां हैं। F-15 चौथी पीढ़ी का विमान है, जबकि F-35 पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ जेट है। F-35 की खासियत केवल उसका कम रडार सिग्नेचर नहीं है, बल्कि उसका सेंसर फ्यूजन और नेटवर्क से जुड़ी युद्ध क्षमता है। यही कारण है कि अमेरिका सऊदी अरब के साथ होने वाले इस अरबों डॉलर के सौदे पर बार-बार सोचने को मजबूर है। यदि चीन को F-35 के इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा कवच का पता चल गया, तो यह अमेरिका के लिए एक बहुत बड़ी रणनीतिक हार होगी।
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