पैकेट बंद खाद्य पदार्थों में नमक, चीनी और फैट की चेतावनी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, FSSAI से मांगे स्पष्ट जवाब भारत एक घंटा पहले 4
सुप्रीम कोर्ट ने पैकेट बंद खाने की चीजों पर स्पष्ट चेतावनी न होने को लेकर भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) से कई तीखे सवाल किए हैं। कोर्ट ने बच्चों और आम लोगों के स्वास्थ्य के मद्देनजर 10 दिन के भीतर विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

सुप्रीम कोर्ट की FSSAI को फटकार

बाजार में बिकने वाले पैकेट बंद खाद्य पदार्थों में उच्च मात्रा में मौजूद शुगर, नमक और फैट को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर रुख अपनाया है। कोर्ट ने भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) के प्रस्तावों पर सवाल उठाते हुए कहा कि जनता और खास तौर पर बच्चों के स्वास्थ्य के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता है। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने प्राधिकरण से साफ तौर पर कहा है कि चेतावनी ऐसी होनी चाहिए जिसे कोई भी आम ग्राहक देखते ही समझ जाए। कोर्ट ने FSSAI को अपने प्रस्तावों को और अधिक पारदर्शी बनाने के लिए 10 दिन का समय दिया है।

FSSAI का प्रस्तावित प्लान और कोर्ट की आपत्तियां

FSSAI ने कोर्ट के सामने एक प्रस्ताव रखा है, जिसमें पैकेट के सामने के हिस्से पर लाल रंग के हेक्सागन यानी छह कोनों वाले निशान में चेतावनी देने की बात कही गई है। इस निशान के भीतर HIGH FAT, HIGH SUGAR, HIGH SALT और HIGHLY SWEETENED BEVERAGE जैसे संदेश लिखे जाने का सुझाव दिया गया है। प्राधिकरण का कहना है कि यह निशान पैकेट के पीछे दी गई न्यूट्रिशन जानकारी से एक पॉइंट बड़ा होगा। इसे दो चरणों में लागू करने की योजना है, जिसमें पहले चरण में दो या अधिक हानिकारक तत्वों की अधिकता वाले उत्पादों को कवर किया जाएगा और दूसरे चरण में एकल तत्व की अधिकता वाले खाद्य पदार्थों पर ध्यान दिया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने इस दो चरणों वाली नीति पर कड़ा एतराज जताया है। कोर्ट ने पूछा है कि अगर किसी खाद्य उत्पाद में केवल एक हानिकारक तत्व, जैसे कि अत्यधिक नमक या अत्यधिक फैट है, तो उसे पहले चरण में क्यों बाहर रखा जा रहा है? अदालत का मानना है कि सेहत को नुकसान पहुंचाने वाले इन तत्वों का असर अलग-अलग हो सकता है और उपभोक्ताओं को जागरूक करना अनिवार्य है।

समयसीमा और रंग की प्रासंगिकता पर सवाल

अदालत ने प्रस्ताव में समयसीमा की कमी को लेकर भी नाराजगी जताई। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि दो चरणों में नियम लागू किए जा रहे हैं, तो उनके बीच का अंतराल भी स्पष्ट होना चाहिए, अन्यथा दूसरे चरण को अनिश्चितकाल के लिए टाला जा सकता है। साथ ही, कोर्ट ने चेतावनी के लिए चुने गए लाल रंग पर भी सवाल खड़े किए। पीठ ने कहा कि भारत में लाल रंग का उपयोग अक्सर मांसाहारी भोजन की पहचान के लिए किया जाता है। ऐसे में यह रंग उपभोक्ताओं के बीच अनावश्यक भ्रम पैदा कर सकता है। कोर्ट ने प्राधिकरण को इस पर पुनर्विचार करने का सुझाव दिया है।

दृश्य संकेत और लेबलिंग की स्पष्टता

न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि केवल अंग्रेजी शब्दों में चेतावनी लिख देना काफी नहीं है। भारत जैसे विविध देश में हर किसी की पढ़ने की क्षमता और भाषा एक समान नहीं है। इसलिए, कोर्ट ने सुझाव दिया कि केवल शब्दों के भरोसे न रहकर, चित्रों और प्रतीकों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए ताकि कम पढ़े-लिखे लोग भी खतरे को पहचान सकें।

इसके अलावा, कोर्ट ने चेतावनी के निशानों के स्वरूप पर भी चर्चा की। यदि किसी पैकेट में फैट और शुगर दोनों की मात्रा सीमा से अधिक है, तो उन्हें एक ही निशान में समेटने के बजाय अलग-अलग दिखाने का विकल्प होना चाहिए, ताकि उपभोक्ता दूर से ही समझ सकें कि उत्पाद में क्या नुकसानदायक है। लेबल की साइज को लेकर भी कोर्ट ने स्पष्टता मांगी है कि ये हेक्सागन पैकेट पर कहां और किस आकार में लगेंगे, यह अभी तक सुनिश्चित नहीं है।

शुगर और फैट की परिभाषा पर स्पष्टीकरण

FSSAI से यह भी पूछा गया है कि आखिर शुगर और फैट की मात्रा की गणना का पैमाना क्या होगा। क्या इसमें केवल बाहर से मिलाई गई चीनी और वसा शामिल है या उत्पाद में मौजूद कुल सैचुरेटेड फैट और शुगर की गणना होगी? इसके अलावा, ट्रांस फैट को किस तरह से मापा जाएगा, इस पर भी विस्तृत जवाब मांगा गया है।

स्कूली स्तर पर जागरूकता की जरूरत

सुप्रीम कोर्ट ने केवल कानूनी नियमों तक सीमित न रहकर सामाजिक जागरूकता पर भी ध्यान दिया है। केंद्र सरकार से पूछा गया है कि क्या वे स्कूलों और कार्यशालाओं के जरिए बच्चों को इस तरह की पोषण संबंधी जानकारी और चेतावनी निशानों को पढ़ना सिखाने की कोई योजना बना रहे हैं। स्वस्थ आदतों का निर्माण बचपन से ही होना चाहिए। इन सभी बिंदुओं पर कोर्ट ने 10 दिन के भीतर हलफनामा मांगा है और अगली सुनवाई 28 सितंबर के लिए निर्धारित कर दी है।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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