छत्तीसगढ़
एक घंटा पहले
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विचारों
छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में सुरक्षा और शांति का एक नया सवेरा देखने को मिल रहा है। कभी धुर नक्सल प्रभावित रहे सुकमा जिले में अब बदलाव की बयार साफ महसूस की जा सकती है। इसी कड़ी में छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा स्थानीय ग्रामीणों के बीच विश्वास बहाली और विकास कार्यों को गति देने के लिए एक विशेष अभियान चलाया जा रहा है। इस अभियान का नाम 'निवा दुवाद ते' रखा गया है, जिसका स्थानीय गोंडी भाषा में अर्थ होता है 'आपके द्वार पर'। इस पहल के तहत पुलिस अधिकारी और जवान सुदूर गांवों में जाकर चौपाल लगा रहे हैं और लोगों की बुनियादी समस्याओं को दूर करने का प्रयास कर रहे हैं।
इस अभियान के दौरान सुकमा जिले के सुदूर अरलमपल्ली गांव में आयोजित एक शांति बैठक में एक ऐसा वाकया सामने आया, जिसने अतीत के उस दौर की याद दिला दी जब इस इलाके में लाल आतंक का खौफ चरम पर था। यहां के पूर्व सरपंच सोधी हांडा ने साल 1990 के उस बेहद खौफनाक और दर्दनाक वाकये को याद किया, जिसे सुनकर वहां मौजूद हर किसी की रूह कांप गई।
शिक्षा के खिलाफ नक्सलियों की बर्बरता: पूर्व सरपंच सोधी हांडा की जुबानी
अरलमपल्ली गांव के पूर्व सरपंच सोधी हांडा ने समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत के दौरान बताया कि किस तरह नक्सलियों ने उनके भविष्य को तबाह करने की कोशिश की थी। उन्होंने कहा कि वर्ष 1990 में जब वह स्कूल में 12वीं कक्षा के छात्र थे, तब नक्सलियों ने उन पर बर्बरता से हमला कर उनके दोनों हाथ तोड़ दिए थे।
सोधी हांडा के अनुसार, नक्सलियों के इस अमानवीय कृत्य के पीछे की वजह बेहद हैरान करने वाली थी। नक्सली नहीं चाहते थे कि क्षेत्र का कोई भी युवा पढ़-लिखकर समझदार बने। उन्हें डर था कि अगर सोधी हांडा अपनी पढ़ाई पूरी कर लेंगे, तो वह उनके काले कानूनों और तानाशाही नीतियों को समझने लगेंगे। नक्सलियों को इस बात का गहरा भय था कि पढ़ा-लिखा युवा उनके खिलाफ आवाज उठाएगा और उनके संगठन के विस्तार में बड़ी बाधा बनेगा। इसी डर के कारण नक्सलियों ने उनकी पढ़ाई को बीच में ही रोकने के लिए उनके दोनों हाथ बेरहमी से तोड़ दिए, ताकि वह कभी लिख-पढ़ न सकें।
महेंद्र कर्मा के अभियान और किस्टाराम का वो दौर
अपने पुराने दिनों को याद करते हुए सोधी हांडा ने बताया कि उस दौर में किस्टाराम क्षेत्र में एक बड़ा जन-जागरण अभियान चलाया जा रहा था। इस अभियान की शुरुआत बस्तर के कद्दावर नेता स्वर्गीय महेंद्र कर्मा ने की थी। सोधी हांडा और उनके साथी इस अभियान में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे थे और ग्रामीणों को जागरूक कर रहे थे। इसी जन-जागरूकता से बौखलाए नक्सलियों ने रात के समय उन पर हमला किया था।
उन्होंने कहा, "मैं केवल 12वीं का छात्र था, लेकिन उनके इस हिंसक हमले की वजह से मेरी आगे की पढ़ाई पूरी तरह रुक गई। वे लोग मुझे आगे बढ़ने से रोकना चाहते थे, लेकिन ईश्वर की कृपा से मैं आज भी जीवित हूं। उन्होंने मुझे सिर्फ इसलिए अपाहिज बनाने की कोशिश की क्योंकि मैं पढ़-लिखकर समाज की मुख्यधारा से जुड़ना चाहता था और उनके खिलाफ खड़ा हो रहा था।"
ग्रामीणों का अदम्य साहस: ढहने से बचाया अपना स्कूल
नक्सलियों के आतंक के बावजूद अरलमपल्ली गांव के लोगों ने कभी घुटने नहीं टेके। सोधी हांडा ने बताया कि उनके गांव का स्कूल काफी पुराना है और शिक्षा का मुख्य केंद्र रहा है। नक्सली इस स्कूल और वहां के पंचायत भवन को पूरी तरह ध्वस्त करना चाहते थे ताकि नई पीढ़ी अशिक्षित रहे और हमेशा उनके अधीन काम करे।
नक्सली भारी हथियारों के साथ स्कूल की इमारत को गिराने आए थे, लेकिन पूरे गांव के लोग एकजुट हो गए। ग्रामीणों ने अपनी जान जोखिम में डालकर नक्सलियों का कड़ा विरोध किया और उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। ग्रामीणों के इसी अदम्य साहस और दृढ़ संकल्प के कारण आज भी वह स्कूल और पंचायत भवन सुरक्षित खड़ा है, जो उनकी अटूट इच्छाशक्ति का जीता-जागता प्रतीक है।
पुलिस के आगमन से जागा नया विश्वास और विकास की उम्मीदें
पूर्व सरपंच सोधी हांडा ने वर्तमान स्थिति पर संतोष व्यक्त करते हुए कहा कि अब सुरक्षा बलों और पुलिस विभाग के जवानों की नियमित आवाजाही से ग्रामीणों में सुरक्षा की एक नई भावना जगी है। उन्होंने कहा कि पुलिस के यहां आने से लोगों का खोया हुआ भरोसा वापस लौट रहा है।
छत्तीसगढ़ पुलिस की चौपालों में अब भय का माहौल नहीं होता, बल्कि विकास के विभिन्न मुद्दों पर खुलकर चर्चा होती है। इस विशेष अभियान के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में निम्नलिखित महत्वपूर्ण मुद्दों पर तेजी से काम किया जा रहा है:
- बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की व्यवस्था और पुराने स्कूलों का कायाकल्प।
- गांवों को मुख्य मार्गों से जोड़ने के लिए मजबूत सड़कों और पुलों का निर्माण।
- सभी ग्रामीणों के लिए शुद्ध और साफ पेयजल की समुचित व्यवस्था करना।
- अंधेरे में डूबे घरों को रोशन करने के लिए निरंतर बिजली की आपूर्ति।
- आधुनिक दुनिया से संपर्क स्थापित करने के लिए सुदूर क्षेत्रों में मोबाइल नेटवर्क कनेक्टिविटी का विस्तार।
कभी जहां गोलियों की गूंज और बारूद की गंध होती थी, वहां अब विकास की नई इबारत लिखी जा रही है। सुकमा जिले का यह सकारात्मक बदलाव बस्तर में आ रही शांति की नई सुबह का सबसे बड़ा प्रमाण है।
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