काजू और बादाम से भी महंगा है छत्तीसगढ़ के जंगलों का यह खजाना, ₹2000 किलो बिकने वाले 'गुहिया पुटू' को खरीदने उमड़ रही भीड़ व्यापार 2 महीने पहले 77
छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले के जंगलों में मानसून के दौरान मिलने वाला गुहिया पुटू मशरूम इन दिनों बाजारों में ₹2000 प्रति किलो के ऊंचे दाम पर बिक रहा है, जिससे ग्रामीण महिलाएं बंपर कमाई कर रही हैं।

छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग में स्थित जशपुर जिला इन दिनों एक बेहद खास और प्राकृतिक सौगात के लिए चर्चा का केंद्र बना हुआ है। मानसून की दस्तक के साथ ही यहां के जंगलों में एक अनोखा और कीमती खजाना उगने लगता है, जिसे स्थानीय लोग 'गुहिया पुटू' के नाम से पुकारते हैं। खाने के शौकीनों के बीच इसकी दीवानगी इस कदर बढ़ गई है कि इसकी कीमत बाजार में काजू और बादाम जैसे महंगे सूखे मेवों को भी पीछे छोड़ रही है। इस अनोखे मशरूम की तलाश में ग्रामीण इलाकों की महिलाएं सुबह-सुबह ही घने जंगलों की ओर रुख कर लेती हैं। वहां से इसे इकट्ठा कर जब वे स्थानीय बाजारों में लाती हैं, तो इसे खरीदने के लिए ग्राहकों का हुजूम उमड़ पड़ता है।

जशपुर की सबसे महंगी मौसमी सब्जी और इसकी भारी मांग

जशपुर के जंगलों में मिलने वाला यह पुटू इन दिनों बाजार की सबसे महंगी सब्जी के रूप में तहलका मचा रहा है। वर्तमान में इसकी कीमत बाजार में करीब ₹2000 प्रति किलो तक पहुंच चुकी है। बाजार में मिलने वाली आम सब्जियों की तुलना में यह कीमत बहुत अधिक है, लेकिन इसके बेमिसाल स्वाद और लाजवाब सुगंध के आगे लोग पैसे की परवाह नहीं कर रहे हैं। इस अनोखे प्राकृतिक कवक को खरीदने के लिए लोगों में होड़ मची रहती है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यह केवल एक सब्जी नहीं है, बल्कि जशपुर की पारंपरिक खान-पान संस्कृति का एक अहम हिस्सा है। यही वजह है कि अमीर तो क्या, गरीब से गरीब परिवार भी साल में कम से कम एक बार इसका स्वाद चखने की ख्वाहिश जरूर रखता है।

पुटू की विशेषताएं और वैज्ञानिक खेती की आवश्यकता

इस अनूठे मशरूम के औषधीय और पोषक तत्वों के बारे में विशेषज्ञ अजय शर्मा ने विस्तार से जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि पुटू में सेहत के लिए बेहद फायदेमंद माने जाने वाले प्रोटीन और कई तरह के जरूरी खनिज तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। यह वास्तव में प्राकृतिक रूप से जंगलों की मिट्टी में उगने वाला एक विशेष प्रकार का कवक है। सबसे बड़ी बात यह है कि अब तक इंसानों द्वारा इसकी कृत्रिम खेती करने की तकनीक विकसित नहीं की जा सकी है। यह पूरी तरह से कुदरत पर निर्भर है। अजय शर्मा ने इस बात पर जोर दिया कि सरकार को इस प्राकृतिक उत्पाद पर गहन शोध कराना चाहिए। यदि इसकी व्यावसायिक खेती की तकनीक विकसित हो जाती है, तो यह स्थानीय लोगों के लिए आय का एक क्रांतिकारी जरिया बन सकता है।

ग्रामीणों के लिए वरदान बनी इसकी बंपर बिक्री

जंगलों से मिलने वाली यह सौगात जशपुर के आसपास रहने वाले गरीब ग्रामीणों के लिए इन दिनों रोजगार का सबसे बड़ा साधन बन चुकी है। जंगल से पुटू चुनकर बाजार में बेचने वाली एक ग्रामीण मुलंदी नायक ने बताया कि वे हर दिन सुबह जल्दी उठकर अपनी सहयोगियों के साथ जंगल जाती हैं और बड़ी मशक्कत से इसे ढूंढकर लाती हैं। बाजार में इसे पारंपरिक रूप से पत्तों के बने कटोरों यानी 'दोने' में रखकर बेचा जाता है। मुलंदी नायक के अनुसार, एक दोने पुटू की कीमत बाजार में ₹200 प्रति दोना है, जबकि वजन के हिसाब से यह ₹2000 प्रति किलो के भाव पर बिक रहा है। उन्होंने बताया कि बाजार में इसकी मांग इतनी अधिक है कि दुकान सजाते ही सारा माल हाथों-हाथ बिक जाता है। इससे उन्हें प्रतिदिन लगभग दो से तीन हजार रुपये तक की शानदार कमाई हो रही है।

जंगलों के भीतर पुटू की तलाश और सीमित समय की उपलब्धता

इस काम में जुटी ग्रामीण महिला अनीता ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि वे अपने परिवार के सदस्यों के साथ सुबह ही जंगलों में पुटू की खोज में निकल पड़ती हैं। उन्होंने बताया कि पुटू को ढूंढना बेहद मुश्किल काम है क्योंकि यह मिट्टी और पत्तों के बीच छिपा रहता है। अनीता को जंगल में थोड़ी ही मात्रा में पुटू मिला, जिसे वे बाजार में बेचने के बजाय अपने घर में पकाने के लिए ले जा रही हैं। उनका कहना है कि इसका स्वाद बेहद लाजवाब होता है। वहीं, जंगल से लौट रही एक अन्य ग्रामीण महिला ने बताया कि उन्हें इस बार जंगल से करीब दो किलो पुटू मिला है, जिसे बाजार में बेचकर वे अच्छी खासी रकम कमा लेंगी। उन्होंने बताया कि यह प्राकृतिक सब्जी साल भर नहीं मिलती, बल्कि केवल बारिश के मौसम में, यानी जून से लेकर जुलाई और अगस्त तक ही जंगलों में उपलब्ध होती है। यही कारण है कि सीमित समय के लिए मिलने वाली इस सब्जी को लोग ऊंचे दामों पर भी खरीदने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं।

खेती की तकनीक विकसित होने से सुधर सकते हैं हालात

जशपुर के स्थानीय जानकारों और कृषि क्षेत्र से जुड़े लोगों का मानना है कि अगर सरकार वैज्ञानिक पद्धति के जरिए इस गुहिया पुटू की खेती करने की तकनीक खोज निकालती है, तो जशपुर के हजारों ग्रामीण और आदिवासी परिवारों की किस्मत बदल सकती है। फिलहाल यह पूरी तरह प्राकृतिक रूप से केवल जंगलों से ही प्राप्त किया जा सकता है, जो कि मौसम पर निर्भर है। यदि इसकी नियमित खेती की शुरुआत हो जाए, तो स्थानीय युवाओं और महिलाओं को घर के पास ही सालों भर चलने वाला एक टिकाऊ रोजगार मिल जाएगा, जिससे क्षेत्र की आर्थिक स्थिति में बड़ा सुधार देखने को मिल सकता है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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