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3 घंटे पहले
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शिक्षा के क्षेत्र में बांका का बढ़ा मान
बिहार के बांका जिले ने शिक्षा के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। जिले के उर्दू प्राथमिक विद्यालय, बिदायडीह की प्रधान शिक्षिका खुशबू कुमारी को वर्ष 2026 के राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए चयनित किया गया है। यह गौरवपूर्ण सम्मान प्राप्त कर उन्होंने न केवल अपने विद्यालय का बल्कि पूरे बांका जिले का नाम रोशन किया है। वर्ष 2019 के बाद से बांका के लिए यह सबसे बड़ी राष्ट्रीय उपलब्धि मानी जा रही है। खुशबू कुमारी की यह सफलता 13 वर्षों के उनके समर्पण, नवाचार और अटूट निष्ठा का परिणाम है।
चुनौतियों को अवसर में बदलने का सफर
जब खुशबू कुमारी ने बिदायडीह स्कूल की जिम्मेदारी संभाली, तब वहां का माहौल काफी कठिन था। स्कूल में बच्चों की उपस्थिति का आंकड़ा केवल 50 प्रतिशत के आसपास ही सिमटा हुआ था। इसके अलावा, संसाधनों की भारी कमी और सामुदायिक विवादों के चलते शिक्षण कार्य प्रभावित हो रहा था। उस दौरान कई लोगों ने उन्हें वहां कार्य न करने की सलाह तक दी थी। लेकिन, खुशबू कुमारी ने इसे एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया। उन्होंने हार मानने के बजाय स्थानीय अभिभावकों और स्कूल प्रबंधन समिति के साथ संवाद स्थापित करने की ठानी। उन्होंने नियमित रूप से माता-पिता शिक्षक संगोष्ठी यानी पीटीएम की शुरुआत की, जिससे स्कूल और अभिभावकों के बीच की दूरी खत्म हो गई। परिणाम स्वरूप आज स्कूल में बच्चों की उपस्थिति 90 प्रतिशत से अधिक दर्ज की जा रही है। स्कूल में बच्चों का अनुशासन भी मिसाल बन गया है, जहां अब 100 प्रतिशत बच्चे स्कूल यूनिफॉर्म, बेल्ट और टाई के साथ आते हैं।
नवाचारों की गूंज देश-विदेश तक
खुशबू कुमारी की शिक्षण पद्धति में नयापन ही उनकी असली पहचान है। उन्होंने खेल-खेल में बच्चों को जटिल विषयों को सिखाने के लिए कई अनूठे तरीके इजाद किए हैं। विशेष रूप से हिंदी की मात्राओं को सरलता से समझाने के लिए उन्होंने एक नवाचार यानी टीएलएम विकसित किया, जो आज बच्चों के लिए बेहद कारगर साबित हो रहा है। उनके इन प्रयासों की सराहना बिहार के मुख्यमंत्री से लेकर देश के प्रसिद्ध गीतकार गुलजार और दिग्गज उद्योगपति आनंद महिंद्रा तक कर चुके हैं। इसके अतिरिक्त, बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने 'गुड टच और बैड टच' जैसे संवेदनशील विषय पर आयु के अनुकूल वीडियो और पाठ तैयार किए हैं। उनकी इस महत्वपूर्ण मुहिम ने बच्चों को अनुचित व्यवहार के प्रति जागरूक किया और उन्हें बोलने का साहस दिया। इस पहल की चर्चा न केवल राष्ट्रीय मीडिया में हुई, बल्कि अन्य राज्यों ने भी अपने विद्यालयों में इसे अपनाने की ओर कदम बढ़ाए हैं।
नदी पर डायवर्जन और प्रशासनिक इच्छाशक्ति
खुशबू कुमारी का दृष्टिकोण केवल कक्षा के चार दीवारों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने बच्चों की पढ़ाई के अधिकार को सामाजिक सुरक्षा के साथ जोड़ा। कक्षा 5 की पढ़ाई पूरी करने के बाद जब गांव के बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए दूसरे गांव जाना पड़ता था, तो बारिश के दौरान उफनती नदी उनके रास्ते की सबसे बड़ी बाधा बन जाती थी। उन्होंने इस समस्या को गंभीरता से लिया और जिला अधिकारी को पत्र लिखकर स्थिति से अवगत कराया। उनकी सक्रियता और प्रशासन की तत्परता का नतीजा यह हुआ कि नदी पर डायवर्जन का निर्माण किया गया, जिससे सैकड़ों बच्चों का सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित हो सका।
डिजिटल माध्यम से लाखों शिक्षकों तक पहुंच
आज के दौर में तकनीक का सही उपयोग करते हुए खुशबू कुमारी सोशल मीडिया और यूट्यूब के जरिए देश भर के करीब 8 लाख से अधिक लोगों से जुड़ी हुई हैं। वे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर निपुण भारत और एफएलएन गतिविधियों से संबंधित शिक्षण मॉडल साझा करती हैं। उनके द्वारा शेयर की गई शिक्षण सामग्री से देशभर के लाखों शिक्षक प्रेरणा ले रहे हैं और अपने विद्यालयों में नवाचार को बढ़ावा दे रहे हैं।
शिक्षा विभाग और समर्थकों में खुशी की लहर
उनके चयन पर बांका के जिला शिक्षा पदाधिकारी देवनारायण पंडित, डीपीओ (स्थापना) संजय कुमार यादव, डीपीओ (एसएसए) मो. फारुख रहमान और जिला गुणवत्ता शिक्षा समन्वयक मनोहर कुमार सिंह समेत शिक्षा विभाग के तमाम अधिकारियों ने खुशी जाहिर की है और उन्हें बधाई दी है। खुशबू कुमारी का कहना है कि यह पुरस्कार व्यक्तिगत न होकर उन सभी बच्चों, अभिभावकों और बांका के पूरे शिक्षा परिवार का है, जिन्होंने उन पर अटूट विश्वास जताया। उनकी यह यात्रा साबित करती है कि यदि एक शिक्षक अपने नवाचार और निष्ठा से ठान ले, तो सरकारी स्कूलों की सूरत और सीरत दोनों बदली जा सकती हैं।
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