40 हजार की नौकरी छोड़कर शुरू किया मछली पालन, आज 30 लाख का कारोबार कर रहे भागलपुर के सौरभ व्यापार 2 घंटे पहले 7
भागलपुर के सौरभ ने अच्छी-खासी प्राइवेट नौकरी को छोड़कर मछली पालन और हैचरी के व्यवसाय में कदम रखा, जिससे आज उनका सालाना टर्नओवर 30 लाख रुपये तक पहुँच गया है।

सफलता की नई इबारत

अक्सर लोग अपनी सुरक्षित नौकरी छोड़ने का जोखिम लेने से डरते हैं, लेकिन भागलपुर के रहने वाले 31 वर्षीय सौरभ ने न सिर्फ यह जोखिम उठाया, बल्कि साबित कर दिया कि सही दिशा में की गई कड़ी मेहनत रंग जरूर लाती है। नवगछिया निवासी सौरभ ने अपनी बीटेक की डिग्री पूरी करने के बाद एक निजी कंपनी में नौकरी की शुरुआत की थी, जहाँ उन्हें हर महीने 35 से 40 हजार रुपये का वेतन मिलता था। करीब चार साल तक कॉरपोरेट जगत में काम करने के बाद, उन्होंने अपनी स्थिरता को छोड़कर एक अलग राह पर चलने का साहसी फैसला किया। आज उनका मछली पालन और हैचरी का व्यवसाय कामयाबी की नई ऊंचाइयों पर है, जिसका सालाना टर्नओवर लगभग 30 लाख रुपये तक पहुँच चुका है।

परिवार की चिंता और सौरभ का आत्मविश्वास

जब सौरभ ने नौकरी से इस्तीफा देने का मन बनाया और वापस अपने घर लौटे, तो उनके परिवार के सदस्यों ने इस फैसले पर काफी नाराजगी जताई। घर वालों का तर्क था कि एक अच्छी सैलरी वाली नौकरी को बिना किसी ठोस आधार के छोड़ना समझदारी नहीं है। हालांकि, सौरभ का लक्ष्य बिल्कुल स्पष्ट था और वह नौकरी के बजाय अपना खुद का काम शुरू करने को लेकर दृढ़ संकल्पित थे। उन्होंने लोगों की आलोचनाओं को नजरअंदाज करते हुए मत्स्य पालन विभाग से संपर्क साधा। वहां से उन्होंने मछली पालन के वैज्ञानिक तरीकों और व्यवसाय की बारीकियों को गहराई से समझा, जो उनके भविष्य के लिए एक मजबूत नींव साबित हुआ।

दो एकड़ से शुरू हुआ सफर

मछली पालन में ट्रेनिंग लेने और सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने के बाद, सौरभ ने लगभग दो एकड़ के तालाब से अपने काम की शुरुआत की। शुरुआती दौर उनके लिए बिल्कुल आसान नहीं था। तालाब के रखरखाव से लेकर मछलियों के स्वास्थ्य और बीमारियों से बचाव जैसी समस्याओं को समझने में उन्हें काफी मशक्कत करनी पड़ी। कई बार उन्हें असफलता और निराशा का सामना भी करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। जैसे-जैसे समय बीतता गया, उनका अनुभव बढ़ता गया और उन्हें इस व्यवसाय की पूरी समझ हो गई। धीरे-धीरे उनकी मेहनत ने परिणाम देना शुरू कर दिया, जिससे उनके व्यवसाय का विस्तार होने लगा।

बंगाल पर निर्भरता को खत्म कर बनाई नई पहचान

सौरभ ने सिर्फ मछली उत्पादन तक सीमित न रहकर अपने काम को और बड़ा बनाने का सोचा। मछली पालन के व्यवसाय में 'जीरा' यानी मछली के छोटे बच्चों की उपलब्धता सबसे महत्वपूर्ण होती है। पहले इस क्षेत्र के किसानों को मछली के बच्चों के लिए पूरी तरह पश्चिम बंगाल पर निर्भर रहना पड़ता था। सौरभ ने इस समस्या को समझा और खुद की हैचरी स्थापित करने का फैसला किया। बिहार में ही मछली के बच्चों का उत्पादन शुरू करने से उनकी लागत में कमी आई और उन्हें गुणवत्तापूर्ण बीज मिलने लगा। उनकी हैचरी से निकले जीरे की मांग इतनी बढ़ गई कि उनका काम तेजी से फैलने लगा।

सफलता का नया मुकाम

समय के साथ सौरभ ने अपने तालाबों की संख्या और क्षेत्रफल में भी काफी बढ़ोत्तरी की है। आज उनका यह मछली पालन का कारोबार लगभग पांच एकड़ के बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है। 35 से 40 हजार रुपये महीने की तनख्वाह से शुरू हुआ उनका सफर आज 30 लाख रुपये सालाना के टर्नओवर तक पहुँच गया है। सौरभ की यह सफलता उन युवाओं के लिए एक बड़ा उदाहरण है जो पारंपरिक नौकरियों से हटकर कृषि आधारित व्यवसायों में अपनी किस्मत आजमाना चाहते हैं। उनका अनुभव यह सिखाता है कि अगर उचित तकनीकी जानकारी, धैर्य और सही प्रशिक्षण हो, तो मछली पालन जैसे क्षेत्रों को भी एक व्यवस्थित और मुनाफे वाला व्यवसाय बनाया जा सकता है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

आपकी प्रतिक्रिया?

Comments

https://pabna.in/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!

फेसबुक वार्तालाप