सरकारी ताजिया: सीकर की 293 साल पुरानी राजशाही परंपरा, आज भी सबसे पहले निकलता है राजा का ताजिया राजस्थान 2 महीने पहले 88
राजस्थान के सीकर में मोहर्रम के मौके पर 293 साल पुरानी राजशाही परंपरा का निर्वहन किया जाता है, जहाँ आज भी राजा द्वारा शुरू कराया गया 'सरकारी ताजिया' सबसे पहले निकाला जाता है।

सीकर की अनूठी सांस्कृतिक विरासत

राजस्थान के सीकर शहर में मोहर्रम का पर्व एक ऐसी ऐतिहासिक परंपरा के साथ मनाया जाता है, जो सदियों पुरानी राजशाही संस्कृति की याद दिलाती है। यहाँ मोहर्रम के अवसर पर ताजियों का जुलूस निकाला जाना कोई सामान्य धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि एक गौरवशाली विरासत है। सीकर के राजघराने द्वारा शुरू कराई गई यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और धूमधाम के साथ निभाई जाती है। इस विशेष ताजिये को 'सरकारी ताजिया' के नाम से जाना जाता है और इसकी विशेषता यह है कि पूरे शहर में जितने भी ताजिए निकलते हैं, उनमें सबसे पहले इसी सरकारी ताजिये को रवाना किया जाता है।

इतिहास के पन्नों में 293 साल का सफर

इतिहासकार महावीर पुरोहित के अनुसार, सीकर में ताजिया निकालने की यह अनूठी प्रथा लगभग 293 वर्ष पुरानी है। इस गौरवशाली परंपरा का सूत्रपात संवत 1789, यानी वर्ष 1732 ईस्वी में हुआ था। उस समय सीकर रियासत पर राव राजा शिवसिंह का शासन था। यह परंपरा उस समय के एक सम्मानित फकीर बाबा चार कुतुब की प्रेरणा से शुरू हुई थी। बाबा चार कुतुब का शहर और राजमहल दोनों ही जगहों पर विशेष प्रभाव और सम्मान था। वे अक्सर अपनी झोली और चिमटा लेकर शहर में भ्रमण किया करते थे और उनकी बातों को समाज में बहुत महत्व दिया जाता था।

राजा शिवसिंह के दरबार से हुई शुरुआत

इस परंपरा की शुरुआत के पीछे एक भावुक कहानी जुड़ी है। महावीर पुरोहित ने विस्तार से बताया कि एक बार बाबा चार कुतुब सीकर के तत्कालीन शासक राव राजा शिवसिंह के दरबार में पहुंचे। वहां उन्होंने हजरत इमाम हुसैन की शहादत की याद में मोहर्रम की 10वीं तारीख को सरकारी ताजिया निकालने का प्रस्ताव रखा और इसके लिए राजा से अनुमति मांगी। राजा शिवसिंह ने बाबा की धार्मिक भावनाओं का पूरा सम्मान किया और उनके आग्रह को स्वीकार कर लिया। इतना ही नहीं, राजा ने ताजिया तैयार करने के लिए कुशल कारीगरों की व्यवस्था भी स्वयं अपने संसाधनों से कराई। इसी तरह संवत 1789 में सीकर का पहला सरकारी ताजिया बनकर तैयार हुआ और शहर में एक नई धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का जन्म हुआ।

परंपरा का निर्वहन और जुलूस का मार्ग

ऐतिहासिक दस्तावेजों और मान्यताओं के अनुसार, पहला सरकारी ताजिया बावड़ी दरवाजा, गढ़ की सिरह ड्योढ़ी और नानी दरवाजा होते हुए कर्बला तक पहुंचा था। समय बीतने के साथ शहर में बहुत बदलाव आए, लेकिन यह राजशाही परंपरा आज भी अपनी मूल गरिमा के साथ कायम है। वर्तमान में यह सरकारी ताजिया सुल्तानशाह वार्ड-31 से निकाला जाता है। पूरे शहर के अन्य ताजिए इसी के पीछे चलते हैं, जो इसे एक विशेष दर्जा प्रदान करता है।

गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल

ढोल और ताशों की मातमी धुनों के बीच जब यह जुलूस निकलता है, तो शहर का नजारा देखने लायक होता है। रास्ते में लोग पारंपरिक करतब दिखाते हैं और अंत में निर्धारित मार्गों से होते हुए ताजिए कर्बला पहुंचते हैं, जहां उन्हें पूरी धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ सुपुर्द-ए-खाक किया जाता है। पिछले तीन सौ वर्षों से निरंतर चल रही यह प्रक्रिया सीकर की गंगा-जमुनी तहजीब का एक जीवंत उदाहरण है। मोहर्रम के मौके पर इस ऐतिहासिक जुलूस को देखने के लिए बड़ी संख्या में हिंदू समुदाय के लोग भी उमड़ते हैं। यह परंपरा इस बात का प्रमाण है कि सीकर की मिट्टी में आपसी भाईचारा और सांस्कृतिक एकता की जड़ें कितनी गहरी हैं, जो आज भी समय की कसौटी पर खरी उतरी हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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