हिमाचल प्रदेश: मंडी के बिंगा गांव के खास कचालू को मिली राष्ट्रीय मान्यता, अब किसान को मिलेगी रॉयल्टी हिमाचल प्रदेश एक घंटा पहले 6
हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के बिंगा गांव की पारंपरिक कचालू फसल को अब राष्ट्रीय स्तर पर विशेष पहचान मिल गई है। सरकारी निकाय पीपीवीएफआरए ने इसे स्वाद कचालू के रूप में पंजीकृत कर इसके संरक्षण और किसानों की आर्थिक मजबूती का रास्ता साफ कर दिया है।

राष्ट्रीय पटल पर छाई बिंगा की पहचान

हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के धर्मपुर उपमंडल में स्थित बिंगा गांव में सदियों से खेती की जा रही पारंपरिक कचालू को अब एक बड़ी राष्ट्रीय उपलब्धि हासिल हुई है। भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत वैधानिक निकाय, जिसे प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वैरायटीज़ एंड फार्मर्स राइट्स अथॉरिटी यानी पीपीवीएफआरए के नाम से जाना जाता है, उसने इस विशेष कचालू को स्वाद कचालू के तौर पर राष्ट्रीय पंजीकरण प्रदान किया है। इस बड़ी सफलता के पीछे एफपीओ यानी फार्मर प्रोडूसर ऑर्गनाइज़ेशन धर्मपुर की कड़ी मेहनत और प्रयास शामिल हैं।

साढ़े तीन साल पहले शुरू हुआ था सफर

एफपीओ धर्मपुर के सचिव भूपेंद्र सिंह के अनुसार, बिंगा गांव का यह कचालू, जिसे स्थानीय भाषा में अरबी भी कहा जाता है, यहां की बहुत पुरानी और पारंपरिक फसल है। इसकी गुणवत्ता के कारण न केवल हिमाचल प्रदेश के भीतर, बल्कि अन्य राज्यों में भी इसकी भारी मांग बनी रहती है। इस मांग और उत्पाद की महत्ता को देखते हुए, करीब डेढ़ वर्ष पूर्व कृषि विज्ञान केंद्र सुंदरनगर के सहयोग से इसके पंजीकरण की प्रक्रिया आरंभ की गई थी। आज इस पूरी मेहनत का परिणाम यह है कि इसे राष्ट्रीय स्तर पर एक ब्रांड के रूप में मान्यता मिल गई है। भविष्य में इस फसल के उत्पादन को धर्मपुर उपमंडल के अन्य हिस्सों तक विस्तार देने की योजना है, जिससे अधिक पैदावार और बेहतर मार्केटिंग के जरिए स्थानीय किसानों की आय में इजाफा किया जा सके।

क्यों खास है बिंगा गांव का स्वाद कचालू

सामान्य तौर पर कचालू या अरबी का इस्तेमाल मंडी और आसपास के जिलों के हर घर में प्रमुखता से होता है। स्थानीय शादी-समारोहों में इसका दम बनाया जाता है, जिसे लोग बेहद चाव से खाते हैं। हालांकि, बिंगा गांव में पैदा होने वाले कचालू की अपनी अलग विशेषता है। इस गांव के किसान विद्या सागर ठाकुर का कहना है कि उनकी पारंपरिक फसल में रेशा नहीं होता, जबकि सामान्य बाजारों में मिलने वाली अरबी में अक्सर रेशा पाया जाता है। यही मुख्य कारण है कि बाजार में इस कचालू की मांग हमेशा बनी रहती है और अब राष्ट्रीय स्तर पर इसे एक अलग पहचान मिल गई है।

अब बीज के इस्तेमाल पर मिलेगी रॉयल्टी

कृषि विज्ञान केंद्र सुंदरनगर के वैज्ञानिक डा. पंकज सूद ने इस पंजीकरण के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार ने वर्ष 2001 में पीपीवीएफआरए का गठन ही इसलिए किया था ताकि ऐसी अनूठी किस्मों और पारंपरिक फसलों का संरक्षण किया जा सके। अब जब यह स्वाद कचालू पंजीकृत हो चुका है, तो इसके बीज के व्यावसायिक इस्तेमाल के नियम कड़े हो गए हैं। कोई भी व्यक्ति अब बिना अनुमति के इस किस्म के बीज का उपयोग नहीं कर सकेगा। यदि कोई अन्य पक्ष इसका उत्पादन करना चाहता है, तो उसे एफपीओ से अनुमति प्राप्त करनी होगी या फिर निर्धारित रॉयल्टी का भुगतान करना होगा। केंद्र सरकार की इस पहल का मुख्य उद्देश्य ऐसी दुर्लभ फसलों को विलुप्त होने से बचाना और उन्हें संरक्षण प्रदान करना है, ताकि इन फसलों से जुड़े किसानों को उनकी मेहनत का उचित और निरंतर लाभ मिल सके।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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