लीची की मिठास ने बदली किसान राजकुमार की तकदीर, लाखों की कमाई और हॉलैंड-ओमान तक पहुंच बिहार एक घंटा पहले 2
शिवहर के कुअमा गांव के किसान राज कुमार राम ने धान-गेहूं की पारंपरिक खेती छोड़कर शाही और चाइना लीची की बागवानी अपनाई, जिससे उन्हें सालाना लाखों रुपये का शुद्ध मुनाफा हो रहा है। उनकी रसीली लीची की मांग अब हॉलैंड और ओमान जैसे देशों तक फैल चुकी है।

शिवहर जिला अब महज अपनी भौगोलिक पहचान तक सीमित नहीं रह गया है। यहां उगने वाली रसीली चाइना और शाही लीची की मिठास अब सात समंदर पार तक अपनी पहचान बना रही है। जिले के पिपराही प्रखंड के कुअमा गांव के किसानों ने खेती के क्षेत्र में एक नई मिसाल कायम की है। यहां के किसानों ने धान और गेहूं जैसी परंपरागत फसलों का मोह त्यागकर लीची के बागानों को अपनाया और इसी फैसले ने आज उन्हें आर्थिक रूप से समृद्ध बना दिया है।

कुअमा पंचायत में करीब दो एकड़ में फैले विशाल बगीचों में सैकड़ों पेड़ फलों से लदे हुए हैं। इनकी खुशबू और स्वाद न सिर्फ आसपास के ग्रामीणों को आकर्षित कर रहा है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी इनकी जबरदस्त मांग बनी हुई है।

कितना खर्च और कितनी कमाई

इस बदलाव की एक कामयाब कहानी हैं लीची बागान के मालिक और कारोबारी राज कुमार राम। बीते 15-20 वर्षों से लीची की खेती कर रहे राज कुमार बताते हैं कि पहले वे पारंपरिक खेती पर ही निर्भर थे, मगर उससे मुनाफा बेहद कम मिलता था। दूसरे सफल किसानों से प्रेरणा लेकर उन्होंने लीची की खेती की शुरुआत की। फिलहाल कुअमा गांव में उनके पास करीब 150 पेड़ हैं।

अपनी खेती का हिसाब साझा करते हुए वे बताते हैं कि डेढ़ से दो एकड़ की बागवानी में खाद और कीटनाशकों के छिड़काव पर सालाना 50 से 60 हजार रुपये तक का खर्च आता है, जबकि इसके बदले उन्हें 4 लाख से 5 लाख रुपये तक की शुद्ध आमदनी हासिल हो रही है।

16 एकड़ में फैली बागवानी

राज कुमार बताते हैं कि इस बार लीची का उत्पादन कम रहने के कारण यह महंगी बिक रही है और मांग को देखते हुए मुनाफे के पुराने तमाम रिकॉर्ड टूटने की उम्मीद है। उन्होंने बताया कि कुल मिलाकर 16 एकड़ में लीची की बागवानी होती है, जिसमें कुछ जमीन लीज पर ली गई है तो कुछ उनकी अपनी है। कई जगहों पर मौसम के अनुसार बागान खरीदकर भी काम किया जाता है।

उनके साथ ऐसे 10 किसान जुड़े हुए हैं, जिनकी लीची की बिक्री वे स्वयं करते हैं। इसके अलावा वे इन बागानों की देखभाल का जिम्मा भी संभालते हैं।

हॉलैंड और ओमान तक पहुंची लीची

बाजार में मुख्य रूप से दो किस्म की लीची—शाही और चाइना—की खेती होती है। शाही लीची का स्वाद हल्का खट्टा-मीठा होता है और इसे तैयार होने में अपेक्षाकृत अधिक समय लगता है। इसके उलट चाइना लीची, जिसे लाल लीची भी कहा जाता है, कम समय में तैयार हो जाती है और स्वाद में बेहद मीठी होती है।

हालांकि चाइना लीची को पानी की अधिक आवश्यकता होती है और समय-समय पर कीटनाशकों का प्रबंधन भी जरूरी रहता है, लेकिन इसकी वैश्विक मांग लागत की तुलना में कहीं ज्यादा फायदा देती है। बेहतरीन स्वाद और गुणवत्ता की बदौलत ही कुअमा की यह लीची आज कुरियर के जरिए हॉलैंड और ओमान जैसे देशों तक भेजी जा रही है।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

आपकी प्रतिक्रिया?


आपको यह भी पसंद आ सकता हैं

Comments

https://pabna.in/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!